विकासशील देशों के लिए सस्ती दरों पर कर्ज़, 'क्रेडिट रेटिंग' व्यवस्था में सुधार का आग्रह
सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त मात्रा में और समय पर वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बहुत आवश्यक है, लेकिन विकासशील देश इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं और उन्हें ऊँची ब्याज़ दरों पर ही कर्ज़ मिल पाता है. संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि ऋण लेने के लिए मौजूदा ‘रेटिंग’ व्यवस्था में अक्सर जोखिमों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है जबकि आर्थिक सम्भावनाओं की उपेक्षा कर दी जाती है. इस वजह से विकासशील देशों के पास धन की कमी है और विकास प्रयासों पर असर हो रहा है.
‘क्रेडिट रेटिंग’ से तात्पर्य किसी देश की सरकार द्वारा समय पर, अपने ऋण को पूर्ण रूप से चुकाने की क्षमता का आकलन है. यह ‘रेटिंग’ या आकलन तय करता है कि किसी सम्प्रभु देश को अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में उधार लेने के लिए कितनी क़ीमत चुकानी होगी.
यदि ‘क्रेडिट रेटिंग’ कम होती है, तो जोखिम को अधिक माना जाता है और उसी वजह से ब्याज़ दर भी बढ़ जाती है.
आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के लिए यूएन परिषद (ECOSOC) की सोमवार को क्रेडिट रेटिंग के विषय में एक विशेष बैठक हुई, जिसे उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने यूएन प्रमुख की ओर से सम्बोधित किया.
उन्होंने सचेत किया कि वर्तमान व्यवस्था, पुरानी हो चुकी और अधूरी जानकारी पर निर्भर करती है, जोकि वैश्विक पूँजी बाज़ारों में अनेक देशों के लिए न्यायसंगत नहीं है और उन्हें इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है.
उन्होंने कहा कि “पर्याप्त मात्रा में व समय पर प्राप्त हुए वित्तीय संसाधन, सतत विकास को आगे बढ़ाते हैं,” मगर यह ईंधन ख़तरनाक ढंग से कम हो रहा है और महँगा होता जा रहा है.
यूएन उप महासचिव ने ध्यान दिलाया कि विकासशील देशों को, अपने ऋण की अदायगी के लिए हर वर्ष 1,400 अरब डॉलर का भुगतान करना पड़ता है. 3.4 अरब लोग ऐसे देशों में रह रहे हैं, जो स्वास्थ्य या शिक्षा की तुलना में अपना कर्ज़ चुकाने में कहीं अधिक ख़र्च करते हैं.
वैश्विक उथलपुथल के प्रभाव
आमिना मोहम्मद के अनुसार, वैश्विक अस्थिरता से यह संकट और गहरा रहा है. हिंसक टकराव और आर्थिक उथलपुथल की वजह से ईंधन और कच्चे माल की क़ीमतों में उछाल आया है, राजकोषीय दबाव बढ़े हैं और प्रगति सुस्त हो रही है.
वहीं, जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से सम्वेदनशील देशों को चरम मौसम घटनाओं व आपदाओं में जान-माल की हानि उठानी पड़ रही है, जबकि उससे उबरने के लिए किफ़ायती दरों पर संसाधन उपलब्ध नहीं हैं.
उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने ‘क्रेडिट रेटिंग’ पर चर्चा को, वैश्विक स्तर पर मौजूदा ऋण व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता से भी जोड़ा और कहा कि विकासशील देशों की भागेदारी को मज़बूती देने के लए नए सुधार लागू किए जाने होंगे.
इनमें उधार लेने वाले देशों के लिए एक मंच, देशों की सरकारों द्वारा ज़िम्मेदारी से ऋण लेने और देने के लिए सिद्धान्त तैयार करने के अलावा यूएन की अगुवाई में एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कर्ज़ लेने और उधार देने वाले देश, निजी कर्ज़दाता, अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान, शिक्षाविद और नागरिक समाज एक साथ आएं.
उन्होंने डेटा, पारदर्शिता और जोखिम आकलन में बेहतरी लाने के प्रयासों के तहत, ‘अफ़्रीकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी’ की योजना का उदाहरण दिया.
नई रेटिंग व्यवस्था की परिकल्पना
उप महासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा कि जिस तरह से देशों की सम्प्रभु रेटिंग तय की जाती है, उसमें व्यापक परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है. एक ऐसी नई व्यवस्था, जिसमें कमज़ोरियों के साथ-साथ अवसरों का भी ध्यान रखा जाए.
उन्होंने कहा कि हमें मानसिकता में भी बदलाव लाने की आवश्यकता है, और दीर्घकालिक क़यासबाज़ी से दीर्घकालिक निवेश की ओर बढ़ना होगा. ऐसे भविष्योन्मुख व पारदर्शी तौर-तरीक़े अपनाने होंगे, जिनमें देशों की वास्तविक सम्भावनाएँ परिलक्षित हो सकें.
यूएन उप प्रमुख के अनुसार, विकास कार्यों के लिए किफ़ायती दरों पर उधार लेने की व्यवस्था से देशों को मदद मिलेगी, और स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे, जलवायु सहनसक्षमता व नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को प्रोत्साहन हासिल होगा.
समय बीतने के साथ यह देशों की समृद्धि को बढ़ावा देगा, जोखिमों में कमी लाने में सहायक होगा और आर्थिक स्थिरता भी बेहतर होगी.