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दासता के 'ऐतिहासिक अन्यायों' की भरपाई व मुआवज़े की पुकार

ज़ंजीबार के स्टोन टाउन में दासता स्मारक में अपनी गर्दन में जंजीरों से बंधी एक महिला की पत्थर की मूर्ति।
UN News/Elizabeth Scaffidi संयुक्त तंज़ानिया गणराज्य के ज़ंज़ीबार में दासता का एक स्मारक. क़रीब 400 वर्षों तक जारी रही दास प्रथा ने लाखों लोगों की इनसानी पहचान छीन ली थी. यूएन महासभा में पारित प्रस्ताव में, दास प्रथा को मानवता के विरुद्ध गम्भीर अपराध क़रार दिया गया है.

दासता के 'ऐतिहासिक अन्यायों' की भरपाई व मुआवज़े की पुकार

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र महासभा में सदस्य देशों ने, पार-अटलांटिक दास व्यापार (transatlantic slave trade) को मानवता के विरुद्ध सबसे गम्भीर अपराध घोषित करने वाला एक प्रस्ताव पारित किया है जिसकी अहमियत को पहचान देने के लिए, हॉल तालियों से गूँज उठा. प्रस्ताव में ग़लती सुधार और मुआवज़े का रास्ता अपनाए जाने की पुकार लगाई गई है.

घाना के नेतृत्व वाले इस प्रस्ताव के पक्ष में 123 वोट पड़े. तीन देशों - अर्जेंटीना, इसराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया, जबकि 52 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जिनमें फ़्रांस और ब्रिटेन सहित लगभग सभी योरोपीय देश शामिल हैं.

घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने, प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले, 54 सदस्यीय अफ़्रीकी समूह की ओर से कहा, "आज, हम सत्य की पुष्टि करने और ज़ख़्मों को भरने व सुधारात्मक न्याय (reparative justice) का मार्ग प्रशस्त करने के लिए एकजुट हुए हैं."

घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर बोलते हुए।
UN Photo/Manuel Elias

इनसानों की चोरी, बेड़ियों की जकड़न और ग़ुलाम समुद्री यात्रा

400 से अधिक वर्षों तक, अफ़्रीका से लाखों लोगों को चोरी किया गया, उन्हें बेड़ियों में जकड़ा गया और 'नई दुनिया' (New World) भेजा गया. वहाँ उन्हें तपती गर्मी और कोड़ों की मार के बीच, कपास के खेतों और चीनी व कॉफ़ी के बागानों में कड़ी मेहनत करने के लिए विवश किया गया.

उनकी बुनियादी इनसानी पहचान और यहाँ तक कि उनके नाम भी छीन लिए गए. उन्हें पीढ़ियों तक शोषण सहने के लिए मजबूर किया गया, जिसके परिणाम आज भी काले लोगों के विरुद्ध  नस्लवाद और भेदभाव के रूप में दिखाई देते हैं.

प्रस्ताव में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि अफ़्रीकी लोगों की ग़ुलामी और उनके साथ बेजान वस्तुओं जैसा व्यवहार करना मानवता के ख़िलाफ़ सबसे गम्भीर अपराध है. 

संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान बोर्ड ने अटलांटिक दास व्यापार पर एक प्रस्ताव के परिणाम प्रदर्शित किए हैं, जिसमें 123 वोटों के पक्ष में, 52 वोटों के साथ, और 3 के खिलाफ (अर्जेंटीना, इजरायल, संयुक्त राज्य अमेरिका) दिखाया गया है।
UN Photo/Manuel Elias

इसका कारण विश्व इतिहास में आया बड़ा बदलाव, इसकी व्यापकता, अवधि, क्रूरता और वे स्थाई परिणाम हैं जो आज भी श्रम, सम्पत्ति और पूंजी की व्यवस्था को प्रभावित करते हैं.

ग़लती सुधार और मुआवज़े का समर्थन

प्रस्ताव में अफ़्रीकी मूल के लोगों के प्रति हुए ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने के महत्व को स्वीकार किया गया, ताकि न्याय, मानवाधिकार और गरिमा को बढ़ावा मिल सके. 

इसमें स्पष्ट किया गया कि मुआवज़े (reparations) की मांग सुधार की दिशा में एक ठोस क़दम है.

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) में अमेरिकी प्रतिनिधि राजदूत डैन नेग्रेआ ने, इस प्रस्ताव पर मतदान से पहले कहा कि यह प्रारूप "कई मायनों में अत्यधिक समस्याग्रस्त" था. 

उन्होंने खेद व्यक्त किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका को "एक बार फिर इस संस्था को याद दिलाना पड़ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व अन्तरराष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए है" न कि "विशिष्ट एजेंडे को आगे बढ़ाने या नए ख़र्चीले जनादेश बनाने के लिए."

इसके अलावा, अमेरिका ने कहा कि वह उन ऐतिहासिक अन्यायों के लिए मुआवज़े के क़ानूनी अधिकार को मान्यता नहीं देता है जो उस समय के अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध नहीं थे.

मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन

दासता के पीड़ितों की याद में अन्तरराष्ट्रीय दिवस के आयोजन के दौरान, यूएन महासभागार में भयावह स्मृतियों की गूंज सुनाई दी.

महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा, "दास व्यापार और ग़ुलामी, मानव इतिहास में मानवाधिकारों के सबसे गम्भीर उल्लंघनों में से हैं, ये हमारे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के सिद्धान्तों का अपमान है."

उन्होंने कहा कि जिन देशों से अफ़्रीकी लोगों को दास बनाकर अन्यत्र ले जाया गया, उन्हें भी भारी नुक़सान हुआ, क्योंकि उन्होंने अपनी उन पीढ़ियों को खो दिया जो देश को समृद्ध बना सकती थीं. उन्होंने इसे "संसाधनों की सामूहिक बेदख़ली" क़रार दिया.

स्थाई बाधाओं को दूर करना

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ग़ुलामी की विरासत - असमानता और नस्लवाद - का सामना करने की पुकार लगाते हुए कहा, "अब हमें उन स्थाई बाधाओं को हटाना होगा जो अफ़्रीकी मूल के लोगों को, उनके अधिकारों का उपयोग करने और उनकी क्षमता को पहचानने से रोकती हैं."

इस सम्बन्ध में, 'अफ़्रीकी मूल के लोगों के लिए दूसरा अन्तरराष्ट्रीय दशक' और 'अफ़्रीकी संघ का मुआवज़ा दशक' महत्वपूर्ण हैं.

अफ़्रीकी देशों के प्रति सम्मान

महासचिव ने देशों से व्यवस्थित नस्लवाद को ख़त्म करने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया. इसमें अफ़्रीकी देशों के अपने प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व के सम्मान और वैश्विक वित्तीय ढाँचे व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उनकी समान भागेदारी सुनिश्चित करने जैसे साहसी क़दम शामिल होने चाहिए.

मुआवज़े के बिना शान्ति नहीं

बारबाडोस की राजकवि एस्थेर फ़िलिप्स ने अपनी कविताओं के कुछ अंश पढ़ते हुआ कहा, "ग़ुलामी के पीड़ितों की आत्माएँ, इस क्षण इस सभागार में मौजूद हैं, और वे केवल एक शब्द सुनने के लिए प्रतीक्षारत हैं: न्याय."

उन्होंने निष्कर्षतः कहा, "उनके लिए और दुनिया के लिए, न्याय के बिना कोई शान्ति नहीं हो सकती, और यह पुकार तभी पूरी होती है जब कथनी को करनी का रूप दिया जाता है. सवाल यह है कि आप क्या करेंगे?"

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