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राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में जल और जलवायु सहनसक्षमता के लिए एक समन्वित यात्रा.

भारत: जल ने बदला जीवन, आदिवासी महिलाओं की अगुवाई में बदलाव

© UNICEF/Vineeta Misra
राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में जल और जलवायु सहनसक्षमता के लिए एक समन्वित यात्रा.

भारत: जल ने बदला जीवन, आदिवासी महिलाओं की अगुवाई में बदलाव

एसडीजी

भारत के राजस्थान राज्य के उदयपुर ज़िले के ब्रह्मानगर और नज़दीकी गाँव आदोल में कभी पानी की कमी रोज़मर्रा के जीवन का सबसे बड़ा संकट थी. इसका सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता थाक्योंकि पानी लाने की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से उन्हीं पर थी. लेकिन अब यही इलाक़ा जलआजीविका और जलवायु सहनसक्षमता के एक ऐसे उदाहरण के रूप में उभर रहा हैजहाँ महिलाएँ इस बदलाव की अगुआ बनकर सामने आई हैं.

उदयपुर की पहाड़ियों में रहने वाली आदिवासी महिलाओं के लिए लम्बे समय तक पानी की कमी एक कठिन सच्चाई रही है. उनकी दिनचर्या लगभग हर दिन एक जैसी होती थी. 

वे सबसे पहले उठती और सबसे अन्त में सोने के लिए जाती थी. परिवार की रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए उन्हें दूर-दराज़ के इलाक़ों से जल भरकर लाना पड़ता था. घर में पानी की कमी का सबसे बड़ा बोझ उन्ही के कंधों पर था.

राजस्थान एक शुष्क और कम वर्षा वाला राज्य है, जहाँ पानी की कमी लम्बे समय से बड़ी चुनौती रही है. उदयपुर ज़िले के ब्रह्मानगर और पास के आदोल गाँव में भूजल स्तर लगातार गिर रहा था. चारागाह सिमटते जा रहे थे और वर्षा भी कम होती थी. इसका सीधा असर लोगों की आजीविका पर पड़ रहा था. 

जल की कमी, घटती खेती और बढ़ती महँगाई के बीच परिवारों का जीवन कठिन होता गया. सबसे अधिक प्रभावित महिलाएँ और बच्चे थे, क्योंकि पानी जुटाने में उनका बहुत समय और मेहनत लगती थी.

आठ वर्षीय महेश राजस्थान के आदोल गाँव में रहता है.
© UNICEF/Vineeta Misra
आठ वर्षीय महेश राजस्थान के आदोल गाँव में रहता है.

परियोजना से बदलाव 

इस स्थिति में बदलाव आना तब शुरू हुआ, जब सरकार की कई योजनाओं को एक साथ जोड़कर काम किया गया. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के साथ मिलाकर एक समग्र जल संचय मॉडल अपनाया गया. 

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा समर्थित इन प्रयासों का उद्देश्य पर्यावरण को फिर से मज़बूती देना और समुदायों को जल क़िल्लत से बेहतर ढंग से निपटने के लिए तैयार करना था.

आदोल गाँव में कुल 39 जलसंचय कार्य किए गए. इनमें छोटे बाँधनुमा ढाँचे (anicuts), पानी सोखने वाले छोटे टैंक (mini-percolation tanks), छतों के ज़रिए वर्षा के जल को जमा करने की व्यवस्था (rooftop rainwater-harvesting structures), और खेतों में ढलान के अनुसार बनाई गई खाइयाँ (contour trenches) जैसी संरचनाएँ शामिल थीं. 

इसके साथ पौधारोपण किया गया, जिससे चरागाह एक बार फिर से जीवित होने लगे. 

परकोलेशन टैंकों में संचित पानी को सौर ऊर्जा चालित पम्पों के माध्यम से सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है.
© UNICEF/Vineeta Misra
परकोलेशन टैंकों में संचित पानी को सौर ऊर्जा चालित पम्पों के माध्यम से सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है.

सोलर पम्प और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों ने पानी के बेहतर उपयोग का रास्ता खोला और पशुओं के लिए चारा भी बढ़ा. इन जलवायु-अनुकूल उपायों से लम्बे समय से सूखे पड़े जल स्रोत फिर भरने लगे, बंजर ज़मीन दोबारा उपजाऊ होने लगी और खेती में सुधार आया.

राज्य जलग्रहण विकास और मृदा संरक्षण विभाग के अनुसार, 2021–22 में ये काम शुरू होने के बाद इस इलाक़े में भूजल स्तर में औसतन लगभग 19 मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अब गाँव के लोगों को पानी के लिए केवल मानसून पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. 

पहले ज़मीन सूखी रहती थी और खेती करना मुश्किल होता था. लेकिन अब पानी उपलब्ध होने के बाद लोगों ने खेती का दायरा बढ़ा लिया है.

अब गाँव के हर घर में घरेलू इस्तेमाल के लिए पूरे साल, हफ़्ते के सातों दिन पानी उपलब्ध रहता है. जो पानी पहले कभी-कभार ही मिल पाता था, अब वह यहाँ स्थाई सुविधा बन चुका है. 

परकोलेशन टैंकों में जमा पानी का उपयोग, सोलर पम्पों की मदद से सिंचाई के लिए किया जाता है.
© UNICEF/Vineeta Misra
परकोलेशन टैंकों में जमा पानी का उपयोग, सोलर पम्पों की मदद से सिंचाई के लिए किया जाता है.

महिलाओं का नेतृत्व

बंजर ज़मीन के हरा-भरा होने के साथ महिलाओं के जीवन में भी बड़ा बदलाव आया. उन्होंने अपने खेतों में नई फ़सलें उगानी शुरू कीं और फिर से खेती की ओर रुख़ किया.

लाली कहती हैं, “जब वॉटरशेड का काम पूरा हुआ, तो हम सातों बहनें एकसाथ खेतों में काम करने आईं. हमने सोलर पम्प की मदद से बंजर ज़मीन तक पानी पहुँचाया और वहाँ फ़सलें उगाईं." 

"अब हम कई तरह की सब्जियाँ उगाते हैं. इससे हमें आमदनी होती है और हम अपने बच्चों के लिए घर पर पौष्टिक खाना भी ले जा पाते हैं.”

जैसे-जैसे ज़मीन पर पानी लौटा, वैसे-वैसे महिलाएँ भी नए उत्साह और उद्देश्य के साथ अपने खेतों की ओर लौटीं.
© UNICEF/Vineeta Misra
जैसे-जैसे ज़मीन पर पानी लौटा, वैसे-वैसे महिलाएँ भी नए उत्साह और उद्देश्य के साथ अपने खेतों की ओर लौटीं.

इस पहल ने ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा किए. महिलाओं ने बंजर ज़मीन पर खेती कर उसे फिर से उपजाऊ बनाया. इससे पशुपालन मज़बूत हुआ और परिवारों के पोषण में भी सुधार आया. 

यहाँ पानी सिर्फ़ जीवन का सहारा नहीं रहा, बल्कि रोज़गार और आजीविका का साधन भी बन गया.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) के सहयोग से राज्य सरकार इस सफल पहल को आगे बढ़ा रही है. आम लोगों, समुदायों और निजी साझेदारों के साथ मिलकर, राजस्थान में महिलाओं को सशक्त बनाने वाले, जलवायु-अनुकूल मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है.

जलग्रहण परियोजना की लाभार्थी लाली, अब बच्चों के लिए पोषक सब्ज़ियाँ घर लाती हैं.
© UNICEF/Vineeta Misra
जलग्रहण परियोजना की लाभार्थी लाली, अब बच्चों के लिए पोषक सब्ज़ियाँ घर लाती हैं.

ब्रह्मानगर की यह कहानी एक स्पष्ट सन्देश देती है. जब समुदाय, सरकार और साझेदार मिलकर काम करते हैं, तो पानी केवल एक संसाधन नहीं रहता. वह सम्मान, आजीविका और बेहतर भविष्य का आधार बन जाता है.

आज ब्रह्मानगर की महिलाएँ पानी के लिए तय की गई लम्बी दूरियों से नहीं पहचानी जातीं. उनकी पहचान अब उन हरे-भरे खेतों और लहलहाती फ़सलों से है, जिन्हें वे अपनी मेहनत से उगा रही हैं. उनकी पहचान उस बेहतर भविष्य से भी है, जिसे वे अपने बच्चों के लिए संजो रही हैं.

यह कहानी वहाँ से शुरू होती है, जहाँ महिलाएँ बंजर ज़मीन में फिर से जीवन लाती हैं. और वहाँ तक पहुँचती है, जहाँ पानी सिर्फ़ खेतों और घरों तक नहीं, बल्कि हर बच्चे के भविष्य तक भी पहुँचता है. 

जब महिलाएँ जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन समाधानों में आगे बढ़कर काम करती हैं, तो उसका लाभ हर बच्चे तक पहुँचता है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

राजस्थान के आदोल गाँव में अपने स्कूल के बाहर पानी पीती, सारा.
© UNICEF/Vineeta Misra
राजस्थान के आदोल गाँव में अपने स्कूल के बाहर पानी पीती, सारा.