‘व्यापक पैमाने पर सैन्य कार्रवाई और सरकारी दमन में फँसे हैं ईरानी नागरिक’
ईरान की जनता एक ओर बड़े पैमाने पर शुरू हुए सैन्य अभियान और दूसरी ओर अपने ही देश में एक ऐसी सरकार के बीच पिस रही है, जिसका दमन का एक लम्बा रिकॉर्ड रहा है. ईरान पर स्वतंत्र, अन्तरराष्ट्रीय तथ्य-खोजी मिशन ने यूएन मानवाधिकार परिषद में मध्य पूर्व संकट पर चर्चा के दौरान सभी युद्धरत पक्षों से अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का पालन किए जाने का आग्रह किया है.
इसराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ईरान पर बमबारी किए जाने, उसके बाद ईरान के जवाबी ड्रोन व मिसाइल हमलों, लेबनान में हिज़बुल्लाह के रॉकेट हमलों और फिर इसराइल की भीषण सैन्य कार्रवाई से मध्य पूर्व एक गहरे संकट की चपेट में है. बड़ी संख्या में आम नागरिक हताहत हुए हैं, लाखों लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर हैं और विशाल मानवीय सहायता आवश्यकताएँ उपजी हैं.
ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति पर स्वतंत्र, अन्तरराष्ट्रीय तथ्य-खोजी मिशन की प्रमुख सारा हुसैन ने परिषद को बताया कि 28 फ़रवरी को, संयुक्त राज्य अमेरिका और इसराइल ने ईरान के विरुद्ध एक भयावह हवाई कार्रवाई शुरू की थी. ऐसा प्रतीत होता है कि इसका मक़सद सैन्य ठिकानों और परमामु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना था.
“लगभग तीन सप्ताह में, इन हमलों की वजह से हताहत होने वाले आम नागरिकों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनमें बच्चे भी हैं.”
स्वतंत्र तथ्य-खोजी मिशन ने सोमवार को अपनी नवीनतम रिपोर्ट मानवाधिकार परिषद के समक्ष प्रस्तुत की है. मिशन प्रमुख सारा हुसैन ने ईरान के आम नागरिकों की व्यथा को बयाँ करते हुए कहा कि वे दो देशों, अमेरिका व इसराइल, द्वारा शुरू की गई व्यापक सैन्य कार्रवाई के बीच में फँसे हुए हैं.
साथ ही, ईरान में उनकी अपनी ही सरकार द्वारा लोगों का दमन किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह टकराव एक ऐसे समय में भड़का है, जब ईरान के आम नागरिक विरोध प्रदर्शनों के बाद अपनी सरकार द्वारा अंजाम दी गई अभूतपूर्व हिंसा को झेलने के बाद उबर रहे थे.
आम नागरिकों के लिए पीड़ा
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने बताया कि इस सैन्य कार्रवाई में रिहायशी इलाक़ों, अनेक तेल भंडारों और जल शोधन संयंत्रों को निशाना बनाया गया है, जिनमें उन्हें क्षति पहुँची है या फिर वे पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं. वहीं, आम नागरिकों को गम्भीर नुक़सान पहुँचा है.
मानवाधिकार विशेषज्ञ ने ध्यान दिलाया कि युद्ध के पहले ही दिन, दक्षिणी ईरान के मिनाब में हवाई हमलों की वजह से एक स्कूल ध्वस्त हो गया था, जिसमें 168 से अधिक लोगों की जान गई, जिनमें अधिकाँश छात्राएँ थी. “उनमें से कुछ की उम्र तो 7 साल जितनी थी.”
तथ्य-खोजी मिशन प्रमुख ने अमेरिकी अधिकारियों के उन वक्तव्यों पर भी चिन्ता जताई है, जिनमें कहा गया है कि लम्बे समय से स्थापित ‘युद्ध में कार्रवाई के नियम’, इस हिंसक टकराव में लागू नहीं होते हैं.
सारा हुसैन ने बताया कि सभी युद्धरत पक्षों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मानव कल्याण क़ानून के अनुपालन की निगरानी की जा रही है और साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं.
अस्पतालों, धरोहर स्थलों को क्षति
वहीं, ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति पर विशेष रैपोर्टेयर माई साटो ने बताया कि मिनाब के स्कूल पर हुए हमले के अलावा, लड़ाई में 1 हज़ार से अधिक आम नागरिकों के मारे जाने की जानकारी है, अस्पताल और विश्व धरोहर स्थल भी बर्बाद हो गए हैं.
उन्होंने कहा कि तेल प्रतिष्ठानों पर हमले की वजह से पर्यावरण के लिए विषैले दुष्परिणाम हो सकते हैं...एक ऐसे देश में जोकि पहले से ही जल की क़िल्लत से जूझ रहा था.
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने ईरान में मानवीय संकट पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से ही मानवीय स्थिति निरन्तर बिगड़ती जा रही है.
ईरान में फ़िलहाल 30 लाख लोग विस्थापित हैं, अनेक शहरी इलाक़ों में हवाई हमलों के सायरन व पूर्व चेतावनी नदारद है और अनेक शहरी इलाक़ों में बमबारी से बचने के लिए आश्रय व्यवस्था नहीं है, जिससे हिंसक टकराव के दौरान आम नागरिकों की सुरक्षा एक चुनौती बनी हुई है.
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, यूएन के कर्मचारी नहीं होते हैं, उन्हें अपने काम के लिए वेतन नहीं मिलता है और वे किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होकर काम करते हैं.