इस्लामोफ़ोबिया विरोधी दिवस: बढ़ती नफ़रत से निपटने के लिए शिक्षा व जागरुकता का आग्रह
मुस्लिम विरोधी कट्टरता व नफ़रत (Islamophobia) के विरुद्ध लड़ाई के विषय पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मीगेल ऐंगेल मोरातीनॉस ने आगाह किया है कि धर्म, कुछ राजनैतिक दलों और आन्दोलनों के हाथों में एक ऐसा औज़ार बन गया है, जिसका इस्तेमाल, लोगों में ध्रुवीकरण बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने विश्व भर में 'इस्लामोफ़ोबिया' के बढ़ते मामलों पर आगाह करते हुए, इस प्रवृत्ति के उन्मूलन के लिए शिक्षा व जागरुकता प्रयासों में संसाधन निवेश किए जाने पर बल दिया है.
यूएन के विशेष दूत ने रविवार, 15 मार्च, को 'इस्लामोफ़ोबिया का मुक़ाबला करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस' से ठीक पहले, यूएन न्यूज़ के साथ एक बातचीत के दौरान, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मुस्लिम विरोधी कट्टरता व नफ़रत के बढ़ते मामलों की ओर ध्यान आकर्षित किया.
मीगेल ऐंगेल मोरातीनॉस ने चिन्ता जताई कि योरोप में मुसलमान-विरोधी घटनाओं में वृद्धि “बहुत गम्भीर” हैं. पश्चिमी देशों, एशिया, अफ़्रीका और सहेल क्षेत्र में ऐसे मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है, और इसलिए दुनिया के बाक़ी हिस्सों को भी इस चलन के प्रति सतर्क रहना चाहिए.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि अच्छी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस्लामोफ़ोबिया का मुक़ाबला करने के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय दिवस के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया था.
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 में, मुस्लिम विरोधी भावना का विरोध करने के अन्तरराष्ट्रीय दिवस की स्थापना की थी, जिसके लिए यूएन महासभा में, सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया था.
प्रस्ताव में, मानवाधिकारों व धर्मों और आस्थाओं की विविधता का सम्मान किए जाने के आधार पर, सभी स्तरों पर सहिष्णुता और शान्ति की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए, मजबूत अन्तरराष्ट्रीय प्रयास किए जाने का आहवान किया गया था.
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मई 2025 में, मीगेल ऐंगेल मोरातीनॉस को इस्लामोफ़ोबिया का मुक़ाबला करने के इरादे से विशेष दूत नियुक्त किया था. वह वर्तमान में, सभ्यताओं के गठबन्धन के उच्च प्रतिनिधि (UNAOC) के रूप में भी सेवारत हैं.
आपसी सम्मान ज़रूरी
विशेष दूत ने ऐसे शान्तिपूर्ण और समावेशी समाजों के निर्माण पर बल दिया, जहाँ आपसी सम्मान सर्वोपरि हो और धर्म या आस्था की परवाह किए बिना, सभी नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ.
मोरातीनॉस ने कहा कि, “यदि हम व्यक्तियों और सह-अस्तित्व वाले समुदायों के बीच सामाजिक एकीकरण स्थापित करने के लिए अपनी क्षमताओं का उपयोग नहीं करते हैं, तो हम विफल हो जाएंगे.”
उन्होंने चेतावनी दी कि आस्थाओं और धार्मिक भिन्नताओं का इस्तेमाल “एक-दूसरे के विरुद्ध हथियार” के रूप में किया जा रहा है, जबकि घृणास्पद भाषणों का आज के समाजों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है. "शान्तिपूर्ण, लोकतांत्रिक समाजों का निर्माण करना हमारा सामूहिक दायित्व है.
इस क्रम में, विशेष दूत ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 18 व 19 का उल्लेख किया, जोकि विचारों, चेतना, धर्म की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति व अपना मत रखने की आज़ादी से जुड़ा हुआ है.
मीगेल ऐंगेल मोरातीनॉस ने इन दोनों अनुच्छेदों के क्रियान्वयन को सकारात्मक ढंग से एकीकृत करने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया.
दोहरी चुनौती का दौर
विशेष दूत ने बताया कि दुनिया के अनेक क्षेत्रों में ध्रुवीकरण में उछाल आ रहा है, जिसका कुछ राजनैतिक दलों और समूहों द्वारा अपने हितों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इसीलिए आस्था की आज़ादी व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच सन्तुलन साधना अहम है, ताकि वास्तव में आपसी समझ व पारस्परिक सम्मान का माहौल सृजित किया जा सके.
मीगेल ऐंगेल मोरातीनॉस ने कहा कि फ़िलहाल हमारे सामने एक “दोहरी चुनौती” है, जिसका एक पहलू कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल मंचों के प्रभाव में तेज़ी से हुई वृद्धि है. इन मंचों पर नियामन व्यवस्था की रफ़्तार धीमी है, जबकि आर्थिक मुनाफ़े को प्राथमिकता दी जा रही है.
मोरातीनॉस ने कहा कि इस चुनौती का दूसरा पहलू “सबसे ख़तरनाक” है, और वो है राजनैतिक मंच. जहाँ नेता सामाजिक नैटवर्क का इस्तेमाल करके अपने समर्थकों व जनता को घृणा और भेदभाव फैलाने के लिए उकसाते हैं.
कोई भी व्यक्ति "किसी राजनैतिक दल यह नहीं कहता है कि इन मंचो का इस्तेमाल मत करो, मुस्लिम समुदायों के विरुद्ध आक्रामक मत बनो… नहीं, वे कहते हैं कि उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है.”
"और अपनी बात कहने की आज़ादी क्या है? उसकी सीमा रेखा किस तरह से तय होगी?"
शिक्षा व जागरूकता की अहमियत
यूएन के वरिष्ठ अधिकारी ने इस्लाम की सही मायनों में समझ विकसित करने के लिए शिक्षा, सह-अस्तित्व, मेल-मिलाप, दूसरों का सम्मान करने के तौर-तरीक़ों, विवादित मुद्दों को सही सन्दर्भ में समझाने जैसे उपायों में निवेश की अहमियत पर बल दिया.
विशेष दूत मोरातीनॉस ने कहा कि उन्हें इस्लामोफ़ोबिया के विरुद्ध विशेष दूत के रूप में काम करने के दौरान, यह और अधिक स्पष्ट रूप से समझ में आया है कि पश्चिमी दुनिया में इस्लाम के प्रति कितनी बड़ी अज्ञानता फैली हुई है.
“लोग नहीं जानते कि इस्लाम क्या है और उन्होंने कु़रआन को नहीं पढ़ा और समझा है. इसके बजाय, वे ऐसे विशेषज्ञों से प्रभावित होते हैं, जो आयतों और सूराह को उनके सही सन्दर्भ से हटाकर राजनैतिक ध्रुवीकरण के मक़सद से इस्तेमाल करते हैं.”
उन्होंने कहा कि, “हमें स्कूलों में शिक्षा प्रसार की ज़रूरत है, मीडिया और आम जनता को शिक्षित करने की ज़रूरत है, क्योंकि इस्लाम की सच्चाई के बारे में बहुत ग़लतफहमियाँ और भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं.
संयुक्त राष्ट्र योजना
विशेष यूएन दूत ने बताया कि इस्लामोफ़ोबिया के विरुद्ध लड़ाई के विषय में, संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर एक योजना बनाई जा रही है, जोकि इस वर्ष तैयार हो जाएगी.
इस योजना में मुख्य रूप से निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाएगा:
- यह समझना कि इस्लामोफ़ोबिया क्या है और किन मानदंडों के आधार पर किसी कृत्य को इस्लामोफ़ोबिया माना जा सकता है.
- शिक्षा व जागरूकता प्रसार के लिए कौन से क़दम उठाए जाने चाहिए ताकि इस्लाम को सही ढंग से समझाया जा सके.
- किस तरह से देशों में इस विषय पर क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों और क़ानूनी उपाय तैयार किए जाने चाहिए.
- निगरानी तंत्रों में सुधार के लिए उपाय.
बहुआयामी मानवता
विशेष दूत मोरातीनॉस ने कहा कि हम एक बहुत जटिल व अनिश्चित दुनिया में रहते हैं, मगर सभी मनुष्यों और मानवता का सह-अस्तित्व होना चाहिए.
उनके अनुसार, मानवता, बहुआयामी व विविधतापूर्ण है, और इसमें विभिन्न धर्म, संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ शामिल हैं, जिनमें इस्लामी सभ्यता भी है. “इसे नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता.”
“हमें साथ में रहना होगा और किसी भी प्रकार के भेदभाव का मुक़ाबला करना होगा. इस सन्दर्भ में, किसी भी कार्रवाई का उद्देश्य, इस्लाम या मुसलमानों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए.”