म्याँमार: 'सैन्य नेतृत्व पर दबाव घटने से, आम नागरिकों के लिए बिगड़ेगी स्थिति'
म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर स्वतंत्र विशेषज्ञ टॉम ऐंड्रयूज़ ने आगाह किया है कि यदि सैन्य नेतृत्व की क्षमता को कमज़ोर करने के बजाय अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने अपने क़दम पीछे हटाए तो उसके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि सैन्य नेतृत्व के विरुद्ध प्रतिबन्ध कमज़ोर हो रहे हैं और विदेशी सहायता में कटौती से मानवीय स्थिति पर गहरा असर हो रहा है.
विशेष रैपोर्टेयर टॉम ऐंड्रयूज़ ने इस भूमिका में जिनीवा स्थित मानवाधिकार परिषद को अन्तिम बार सम्बोधित किया. उनके अनुसार, मानवाधिकारों के लिए बढ़ते जोखिमों के इस दौर में, मानवाधिकार परिषद ही इनके पक्ष में मज़बूती से खड़े होने के लिए सर्वोत्तम स्थान है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने सैन्य नेतृत्व की क्षमता को कमज़ोर करने और आम नागरिकों पर हमले रोकने के लिए जो क़दम उठाए हैं, उससे उम्मीद बंधी है.
“सैन्य-नियंत्रण वाली संस्थाओं व हथियारों की आपूर्ति के लिए नैटवर्क पर प्रतिबन्ध से, सैन्य नेतृत्व की हथियार व हथियार सामग्री ख़रीदने की क्षमता प्रभावित हुई है. जिस अन्तरराष्ट्रीय मान्यता की कोशिशें की जा रही थीं, सैन्य नेतृत्व को वह नहीं मिल पाई हैं.”
विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि चुनाव के ज़रिए अन्तरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का प्रयास किया गया था, लेकिन उसे व्यापक तौर पर अवैध मानकर ख़ारिज कर दिया गया. यह दर्शाता है कि अन्तरराष्ट्रीय दबाव का असर हो रहा है.
उन्होंने बताया कि म्याँमार, दोराहे पर खड़ा है. सैन्य नेतृत्व को उम्मीद है कि चुनाव से उसे मान्यता मिलेगी. लेकिन अन्तरराष्ट्रीय समुदाय भी एक दोराहे पर है.
उसे तय करना है कि असाधारण साहस दर्शाने वाली म्याँमार की जनता को समर्थन देने के लिए क़दमों का स्तर बढ़ाना है या फिर उन्हें वापिस खींचना है और म्याँमार के लोगों को उनके हाल पर छोड़ देना है.
टॉम ऐंड्रयूज़ ने कहा कि ऐसे संकेत नज़र आ रहे हैं कि इस विषय में सरकारों का संकल्प कमज़ोर पड़ रहा है.
उनके अनुसार, सैन्य नेतृत्व और उसे समर्थन देने वालों के विरुद्ध प्रतिबन्ध की व्यवस्था को बरक़रार नहीं रखा गया है और विदेशी सहायता में वैश्विक कटौती से मानवीय सहायता पर गहरा असर हो रहा है.
लम्बे समय से जारी संकट
1 फ़रवरी 2021 को, म्याँमार की सेना ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था और राष्ट्रपति, स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची समेत सैकड़ों अधिकारियों, राजनैतिक नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था.
इसके बाद से ही देश, मानवीय व मानवाधिकारों के संकट से जूझ रहा है, जोकि समय बीतने के साथ और अधिक गहरा हुआ है.
सैन्य तख़्तापलट के बाद के 5 वर्षों में, 30 हज़ार से अधिक लोगों को राजनैतिक कारणों से गिरफ़्तार किया गया है. सैन्य बलों द्वारा म्याँमार के लोगों पर हमले किए गए हैं.
विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि “2021 में तख़्तापलट होने पर 9 नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया था. 2025 में यह संख्या 1,140 थी. 1 लाख से अधिक घरों को जलाया जा चुका है और बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल किया गया है.”
म्याँमार, फ़िलहाल एक मानवीय संकट की चपेट में है, 1.2 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे हैं, और लोगों को वंचित रखने को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल में लाया जा रहा है. देश की क़रीब एक तिहाई आबादी को मानवीय सहायता की आवश्यकता है.
मानवाधिकारों के लिए चुनौतियाँ
टॉम ऐंड्रयूज़ ने कहा कि रोहिंग्या जातीय अल्पसंख्यक, म्याँमार के राख़ीन प्रान्त में पीड़ा झेल रहे हैं, जबकि 13 लाख लोगों ने बांग्लादेश में शरण ली है. पिछले वर्ष 6,500 लोगों ने राख़ीन छोड़ा और 900 के समुद्री यात्राओं के दौरान डूबने से मौत हो गई.
उन्होंने सचेत किया कि वर्तमान भूराजनैतिक माहौल, म्याँमार में मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं है.
उनके अनुसार, 8 दशक पहले, जिन सिद्धान्तों पर यूएन को स्थापित किया गया था, उन पर भारी दबाव है और मानवाधिकारों व अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के लिए सम्मान कम होता जा रहा है.
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने विश्व भर में मानवाधिकारों और लोकतंत्र के लिए समर्पित सरकारों को आगे क़दम बढ़ाने का आग्रह किया, और म्याँमार समेत उन सभी स्थानों पर लोगों के पक्ष में खड़े होने का आहवान किया, जहाँ मानवाधिकारों पर चोट की जा रही है.
स्वतंत्र विशेषज्ञ
म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर नियुक्त विशेष रैपोर्टेयर को यूएन मानवाधिकार परिषद से अधिदेश प्राप्त है. उनका दायित्व देश में दुर्व्यवहार, मानवाधिकार उल्लंघन मामलों की पड़ताल और जवाबदेही तय करना है.
विशेष रैपोर्टेयर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं. वे यूएन के कर्मचारी नहीं होते हैं, उन्हें अपने काम के लिए वेतन नहीं मिलता है और वे किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होकर काम करते हैं.