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पूर्वी योरोप व मध्य एशिया में, 70% महिलाओं ने प्रसव के दौरान झेला दुर्व्यवहार - UNFPA

मंगोलिया के उलानबाटर के एक स्वास्थ्य केन्द्र में एक माँ अपने नवजात शिशु के साथ. (4 सितम्बर 2015)
UNICEF/Jan Zammit
मंगोलिया के उलानबाटर के एक स्वास्थ्य केन्द्र में एक माँ अपने नवजात शिशु के साथ. (4 सितम्बर 2015)

पूर्वी योरोप व मध्य एशिया में, 70% महिलाओं ने प्रसव के दौरान झेला दुर्व्यवहार - UNFPA

महिलाएँ

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNFPA) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी योरोप और मध्य एशिया में कराए गए एक सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाली लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं ने, प्रसव के दौरान किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार या अनुचित व्यवहार का सामना करने की बात कही है. इनमें बिना सहमति के चिकित्सा प्रक्रिया से गुज़रने, शाब्दिक व शारीरिक दुर्व्यवहार और निजता उल्लंघन समेत अन्य मामले हैं.

यूएन एजेंसी द्वारा शुक्रवार को जारी की गई इस रिपोर्ट में, प्रसूति के दौरान होने वाली हिंसा के एक व्यापक लेकिन अक्सर छिपे हुए संकट को उजागर किया गया है, जो महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है.

पूर्वी योरोप और मध्य एशिया के लिए UNFPA की क्षेत्रीय निदेशक फ़्लोरेंस बाउर ने कहा, “ये निष्कर्ष एक गम्भीर चेतावनी हैं. हर महिला को स्वास्थ्य के सर्वोच्च सम्भव मानक पाने का अधिकार है, जिसमें प्रसव के दौरान गरिमापूर्ण और सम्मानजनक देखभाल शामिल होनी चाहिए.”

सर्वेक्षण में पाया गया कि हर 3 में से 2 महिलाओं ने किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का अनुभव किया, जिसमें बिना सहमति के की गई चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ, मौखिक व शारीरिक दुर्व्यवहार, तथा निजता के गम्भीर उल्लंघन जैसे मामले शामिल हैं.

मानसिक रूप से आहत

उन्होंने कहा, “प्रसव के दौरान दुर्व्यवहार या हिंसा (Obstetric violence) केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जिससे महिलाएँ असहाय और मानसिक रूप से आहत महसूस करती हैं.”

“इसका उनके स्वास्थ्य और कल्याण पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है. हमें मिलकर मातृत्व देखभाल व्यवस्था को वास्तव में महिला-केन्द्रित, सम्मानजनक और सकारात्मक अनुभव में बदलने की ज़रूरत है.”

यूक्रेन की एक गर्भवती महिला को अपनी माँ और छोटे बच्चे के साथ, अपना स्थान सुरक्षा की तलाश में छोड़कर, मोल्दोवा पहुँचना पड़ा है.
© UNFPA Moldova/Adriana Bîzgu
यूक्रेन की एक गर्भवती महिला को अपनी माँ और छोटे बच्चे के साथ, अपना स्थान सुरक्षा की तलाश में छोड़कर, मोल्दोवा पहुँचना पड़ा है.

प्रमुख निष्कर्ष

रिपोर्ट के निष्कर्ष, हाल ही में 2,600 से अधिक बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं पर किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण पर आधारित हैं.

UNFPA द्वारा यह सर्वेक्षण इस क्षेत्र में स्थित 16 देशों में, गर्भावस्था के दौरान इस्तेमाल लाई जाने वाली ऐप 'अम्मा' और मोलदोवा स्थित विकास के लिए साझेदारी केन्द्र के साथ साझीदारी में किया गया.

अहम बिन्दु:

  • व्यापक दुर्व्यवहार: सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि प्रसव पीड़ा या बच्चे के जन्म के दौरान उन्हें कम से कम एक प्रकार के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा.
     
  • बिना सहमति चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ: लगभग 48 प्रतिशत महिलाओं पर एपिसियोटॉमी, सिज़ेरियन ऑपरेशन या ऑक्सीटोसिन देने जैसी प्रसूति सम्बन्धी चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ उन्हें सूचित किए बिना, उनकी सहमति के बग़ैर की गईं.
     
  • दुर्व्यवहार के मामले: क़रीब 24 प्रतिशत महिलाओं ने, चिल्लाए या अपमानित किए जाने जैसे मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करने की बात कही, जबकि हर 10 में से 1 महिला को प्रसव या स्त्रीरोग सम्बन्धी जाँच के दौरान शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा.
     
  • जागरूकता और शिकायत: 53 प्रतिशत महिलाएँ “प्रसूति हिंसा” शब्द से परिचित नहीं थीं, और जिनके साथ दुर्व्यवहार हुआ उनमें से केवल 2 प्रतिशत ने ही आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई. इसके पीछे जवाबदेही तंत्र पर भरोसे की कमी या प्रतिशोध का डर प्रमुख कारण बताए गए.
     
  • अधिक जोखिम वाले समूह: 18–24 वर्ष की युवा महिलाएँ तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर या कम शिक्षित महिलाएँ दुर्व्यवहार का सामना करने की अधिक सम्भावना रखती थीं.

कुछ सुझाव

UNFPA और योरोपीय प्रसूति एवं स्त्रीरोग बोर्ड और कॉलेज (EBCOG) ने, देशों की सरकारों और चिकित्सा समुदायों से प्रसूति के दौरान होने वाली हिंसा को समाप्त करने के लिए व्यापक रणनीतियाँ लागू करने का आग्रह किया है.

इस पहल में अनेक महत्वपूर्ण क़दम सुझाए गए हैं, जिनमें शामिल है:

  • सम्मानजनक मातृत्व देखभाल को मान्यता देने और प्रसूति हिंसा से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क़ानूनी ढाँचा बनाना.
     

  • स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मानवाधिकार-आधारित और बहु-विषयक प्रशिक्षण को अनिवार्य करना.
     

  • महिलाओं और परिवारों को प्रसव-पूर्व शिक्षा व अपने अधिकारों की जानकारी देकर सशक्त बनाना.
     

  • मरीज़ों की नियमित प्रतिक्रिया के आधार पर जवाबदेही और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की व्यवस्था स्थापित करना.
     

  • जागरूकता अभियानों के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने से जुड़े कथित सामाजिक कलंक को दूर करके, सम्मान की संस्कृति को बढ़ावा देना.