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दक्षिण-दक्षिण सहयोग: महिलाओं की अगुवाई में विकास परियोजनाओं से बदलती है तस्वीर

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में सम्मेलन कक्ष का एक विस्तृत दृश्य, महिला-नेतृत्व विकास और दक्षिण-दक्षिण सहयोगः आईबीएसए फंड से सफलता की कहानियां कार्यक्रम में उपस्थित लोगों से भरा हुआ। सामने बड़ी स्क्रीन एक पैनल चर्चा दिखाती है, और हैशटैग #CSW70 नेमप्लेट और एक फ्रंटग्राउंड डिस्प्ले पर दिखाई देता है।
UN News/Sachin Gaur
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन ने 'महिलाओं की अगुवाई में विकास और दक्षिण-दक्षिण सहयोग' के विषय पर न्यूयॉर्क मुख्यालय में एक कार्यक्रम को आयोजित किया.

दक्षिण-दक्षिण सहयोग: महिलाओं की अगुवाई में विकास परियोजनाओं से बदलती है तस्वीर

महिलाएँ

महिलाओं को जब विकास परियोजनाओं में वास्तविक साझेदार के रूप में शामिल किया जाता है, तो उनके न केवल सफल होने की सम्भावना बढ़ती है, बल्कि स्थानीय समुदायों तक भी व्यापक लाभ पहुँचते हैं. यूएन विकास कार्यक्रम (UNDP) के प्रशासक ऐलेक्ज़ेंडर डे क्रू ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारत के स्थाई मिशन द्वारा 'महिलाओं के नेतृत्व में विकास और दक्षिण-दक्षिण सहयोग' के विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान विकास प्रक्रिया में लैंगिक आयामों की अहमियत पर बल दिया.

दक्षिण-दक्षिण सहयोग, विकासशील देशों के बीच उस विकास साझेदारी को कहा जाता है, जिसमें ये देश, साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ज्ञान, कौशल व संसाधनों का आदान-प्रदान करते हैं. 

दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत विकास परियोजनाओं को समर्थन देने के इरादे से, ‘ब्रिक्स’ देशों के समूह में शामिल तीन देशों – भारत (India), ब्राज़ील (Brazil), दक्षिण अफ़्रीका (South Africa) – ने वर्ष 2004 में निर्धनता व भूख उन्मूलन के उद्देश्य से ‘इब्सा कोष’ (IBSA Fund) को स्थापित किया था. यह कोष यूएन एजेंसियों के साथ मिलकर विकास परियोजनाओं को वित्तीय समर्थन मुहैया कराता है.

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यूएन विकास कार्यक्रम के प्रशासक ऐलेक्ज़ेंडर डे क्रू ने गुरूवार को हुए कार्यक्रम में कहा कि विकास जगत में अक्सर उन बातों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है, जोकि कारगर नहीं हैं. मगर, उनका संगठन बेहतरी लाने के समाधानों पर निरन्तर नज़र रखता है और उनका दायरा बढ़ाने के लिए प्रयासरत है.

उनके अनुसार, दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तंत्र में विविधता है. विश्व के अलग-अलग हिस्सों में स्थित, विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों ने ‘इब्सा कोष’ को स्थापित किया है, जिसका उद्देश्य सबसे पीछे छूट गए लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है, और इसकी बुनियाद में लैंगिक विविधता व लैंगिक समानता है.

उन्होंने बताया कि अब तक 10 परियोजनाओं को साकार किया जा चुका है, जिनमें प्रतिभागियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया, टैक्नॉलॉजी तक पहुँच सुनिश्चित की गई और विश्व के अनेक देशों में हज़ारों महिलाओं के जीवन में बेहतरी आई है.

“हम यह जानते हैं कि जब महिलाओं के लिए अवसर बेहतर होते हैं, तो उनके इर्दगिर्द 10 गुना अधिक लोगों के लिए अवसर बढ़ते हैं. जब महिलाओं को [परियोजनाओं में] शामिल किया जाता है तो उसका समाज पर कहीं अधिक गहरा व व्यापक प्रभाव होता है.”

यूएन कार्यक्रम के प्रमुख के अनुसार, ‘इब्सा’ कोष द्वारा समर्थित परियोजनाओं के तहत जिन समाधानों को लागू किया जा रहा है, वे बेहद व्यावहारिक उपाय हैं. ये ऐसे समाधान हैं, जोकि विकासशील देशों से आते हैं और जिन्हें वैश्विक दक्षिण में स्थित देशों में ही अपनाया जा रहा है.

'एकजुटता का मॉडल'

भारत की महिला एवँ बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने अपने सम्बोधन में बताया कि वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व में बहुपक्षीय सहयोग, विकास सम्बन्धी चुनौतियों से निपटने में दक्षिण-दक्षिण सहयोग की मज़बूती को दर्शाता है.

उन्होंने कहा कि ‘इब्सा’ कोष, महिलाओं की क्षमताओं और नेतृत्व को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं पर ख़ास तौर से बल देता है, जोकि भारत के महिला-नेतृत्व वाले विकास के व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है.

‘इब्सा’ कोष के समर्थन से अब तक लगभग 40 देशों में, 5.4 करोड़ डॉलर की धनराशि से क़रीब 50 परियोजनाओं को समर्थन दिया गया है, विशेष रूप से महिलाओं के नेतृत्व, शिक्षा व कौशल प्रशिक्षण अवसरों के विस्तार, और बेहतर स्वास्थ्य पर केन्द्रित परियोजनाओं के लिए.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने कहा कि एक ऐसी दुनिया में जहाँ सहायता के पारम्परिक तौर-तरीक़े दबाव में हैं, और जहाँ विकास सम्बन्धी सहायता टुकड़ों में बँटती जा रही है, ‘इब्सा’ कोष एक भरोसेमन्द और दक्षिण-दक्षिण एकजुटता का कारगर मॉडल प्रस्तुत करता है.

उन्होंने इसे एक ऐसा मॉडल बताया जोकि अन्तरराष्ट्रीय विकास में दानदाताओं द्वारा निर्देशित तंत्र को चुनौती देता है, और ‘परम्परागत’ तौर-तरीक़ों के बजाय, देशों की आवश्यकताओं व मांग पर ध्यान केन्द्रित करता है.

साझेदार देश अपनी आवश्यकताओं को तय करते हैं और फिर उन्हें परियोजनाओं के लिए वित्तीय समर्थन, ज्ञान व सफल समाधानों को मुहैया कराया जाता है.

चँद परियोजनाओं पर एक नज़र

  • बेनिन में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए, नमक का उत्पादन करने वाली 4 हज़ार से अधिक महिलाओं को अपने पारम्परिक तौर-तरीक़ों का आधुनिकीकरण करने के लिए 10 लाख डॉलर की मदद दी गई है.
     
  • लाइबेरिया में महिला सांसदों की राजनैतिक भागीदारी, नेतृत्व और लैंगिक आवश्यकताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था को मज़बूती देने के इरादे से एक नई परियोजना शुरू की गई है. इससे देश में विधायी प्रक्रिया (legislative process) में महिलाओं की भूमिका और टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलने की आशा है.
     
  • गिनी बिसाउ के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं ने भारत के राजस्थान राज्य के तिलोनिया में ‘बेयरफ़ुट कॉलेज’ में सौर ऊर्जा पर प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जिससे उन्होंने अपने गाँवों में सौर ऊर्जा की व्यवस्था की है.
     
  • फ़िजी में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन मुहैया कराने के इरादे से ‘रॉकेट स्टोव’ परियोजना लागू की गई है. जिसमें खाना पकाने के लिए कम ईंधन लकड़ी का इस्तेमाल होता है और महिलाओं में श्वसन तंत्र बीमारियों की रोकथाम में मदद मिलती है. साथ ही, स्टोव के स्थानीय उत्पादन की क्षमता भी विकसित की जा रही है.
     
  • युगांडा में बड़े पैमाने पर अनाज़, तेल के बीज, फलियों की खेती के लिए महिलाओं को समर्थन दिया जा रहा है. 
     
  • गाम्बिया में ग्रामीण इलाक़ों में युवाओं व महिलाओं के फ़सल उत्पादन के बाद होने वाली बर्बादी को रोकने और लघु-स्तर पर कृषि व्यवसाय शुरू करने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है.

न्यूयॉर्क में ‘महिलाओं की स्थिति पर आयोग’ के 70वें सत्र के दौरान भारतीय मिशन ने इस कार्यक्रम को आयोजित किया, जिसमें ब्राज़ील की महिला मामलों की उप मंत्री यूटालिया बारबोसा रोड्रिग्स नावेस, दक्षिण अफ़्रीका में महिला, युवा व विकलांग जन के मामलों की मंत्री सिंदिसिवे चिकुंगा समेत अन्य प्रतिनिधि व यूएन के वरिष्ठ अधिकारियों ने शिरकत की.