भारत: महिला उत्पादकों के योगदान से, खाद्य प्रणालियों को मिल रही मज़बूती
भारत के महिला उत्पादक, उत्तर प्रदेश प्रान्त में जंगल से मिलने वाले फलों को छाँटने से लेकर असम में दूध की आपूर्ति का हिसाब रखने तक, स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मज़बूत बना रही हैं. वे ग्रामीण उद्यमों को आगे बढ़ा रही हैं और ऐसे काम को पहचान दिला रही हैं, जिसे अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है.
उत्तर प्रदेश के झाँसी ज़िले में महिलाएँ पेड़ों की छाया तले बेर की टोकरी लेकर जुटती हैं. आसपास के इलाक़ों से चुने गए इन फलों को सावधानी से छाँटा जाता है, उनकी गुणवत्ता जाँची जाती है और फिर उन्हें पैक करके बाज़ार के लिए तैयार किया जाता है.
हर फल को ध्यान से परखा जाता है और हाथ से पैक किया जाता है. इस काम में धैर्य, मेहनत और कौशल की ज़रूरत होती है.
ये महिलाएँ 'ऐब्रोसा प्राइवेट लिमिटेड' नामक एक कृषि-खाद्य उद्यम से जुड़ी हैं, जो वनों से मिलने वाले उत्पादों और ग्रामीण आपूर्तिकर्ताओं के साथ काम करता है. इनमें से कई महिलाओं के लिए यह काम केवल मौसमी आमदनी का ज़रिया नहीं है. यह उन्हें आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर और बढ़ते कृषि-खाद्य कारोबार का हिस्सा बनने का अवसर देता है.
सैकड़ों किलोमीटर दूर, असम के चिरांग ज़िले के उलुबारी गाँव में महिलाओं का एक और समूह अलग तरीक़े से अपने उद्यम को आगे बढ़ा रहा है. 'संघमित्रा महिला प्रोड्यूसर्स' नामक महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठन की सदस्य, एक साधारण से दफ़्तर में बैठकर रोज़मर्रा के कामकाज का लेखा-जोखा दर्ज करती हैं.
आसपास के गाँवों से जुटाए गए दूध को पनीर और घी जैसे मूल्य-वर्धित उत्पादों में बदला जाता है. कार्यालय में महिलाएँ बिल, आपूर्ति रजिस्टर और कामकाज के ब्यौरे को ध्यान से देखती हैं.
रजिस्टर की हर प्रविष्टि केवल उत्पादन का आँकड़ा नहीं होती, बल्कि यह उन महिलाओं के सामूहिक प्रयास को दर्शाती है, जिन्होंने अपनी आजीविका मज़बूत करने और स्थानीय फ़ैसलों में अपनी भागेदारी बढ़ाने के लिए स्वयं को संगठित किया है.
इन दोनों उद्यमों में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है.
महिलाएँ केवल उत्पादन और कारोबार ही नहीं सम्भाल रहीं, बल्कि यह भी दर्शा रही हैं कि खाद्य प्रणालियाँ सिर्फ़ उपज पर निर्भर नहीं होतीं. इनके पीछे श्रम, स्थानीय ज्ञान, समुदाय की भागेदारी और प्राकृतिक संसाधनों की भी अहम भूमिका होती है.
नवीन परियोजना
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), के नेतृत्व वाले 'TEEBAgriFood इंडिया' नामक कार्यक्रम से इन प्रयासों को सहारा मिल रहा है, जिसे IKEA फ़ाउंडेशन का समर्थन प्राप्त है. दिसम्बर 2023 में शुरू की गई ‘सही मूल्य लेखांकन' परियोजना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम राज्यों में लागू की जा रही है.
इस पहल का उद्देश्य यह समझना है कि खाद्य प्रणालियाँ चार तरह की पूँजी पर टिकी होती हैं: प्राकृतिक, उत्पादित, सामाजिक और मानवीय. यही चारों मिलकर किसी भी व्यवस्था के टिकाऊपन और उसकी लाभप्रदता को तय करते हैं.
हाल के विचार-विमर्श और प्रशिक्षणों के ज़रिए किसानों, उत्पादक समूहों और कारोबारों को केवल पैदावार तक सीमित न रहकर यह समझने के लिए प्रेरित किया गया कि खेती को असल में क्या सहारा देता है और मौजूदा तौर-तरीक़ों से कहाँ नुक़सान हो रहा है.
उत्तर प्रदेश के एक किसान समूह के प्रतिनिधि ने इस बदलाव को यूँ समझाया, “हमारे खेतों में रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल ने समय के साथ न केवल मिट्टी की गुणवत्ता और उपज को घटाया है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी असर डाला है."
"इस नई समझ ने हमें दिखाया कि अच्छी मिट्टी और अच्छा स्वास्थ्य उतने ही ज़रूरी हैं, जितनी उपज और फ़सल की क़ीमत.”
परियोजना के अनुसार, इन प्रयासों का उद्देश्य केवल प्रकृति की रक्षा करना नहीं है. इसका उद्देश्य किसानों, छोटे कारोबारों और उत्पादक समूहों को यह समझने में सक्षम बनाना भी है कि उनके उत्पादों की अहमियत कितनी व्यापक है.
इसमें बेहतर मिट्टी, कम दीर्घकालिक जोखिम, परागण को सहारा, स्थानीय बीज प्रणालियों का संरक्षण और मज़बूत सामुदायिक सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं.
झाँसी और असम की महिलाओं के लिए यह सोच अब ज़मीन पर दिखाई देने लगी है. उनका काम उस श्रम, देखभाल, ज्ञान और प्राकृतिक तंत्र को सामने ला रहा है, जो हर दिन खाद्य उत्पादन को सम्भव बनाते हैं.
जब इन योगदानों को सही पहचान मिलती है, तो महिला उत्पादक अपने उद्यमों को और मज़बूत कर सकती हैं, अपनी आजीविका बेहतर बना सकती हैं तथा भविष्य के लिए अधिक टिकाऊ एवं सशक्त खाद्य प्रणालियों के निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.