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दो-तिहाई बच्चों पर, ऑनलाइन डराए-धमकाए जाने, 'साइबर बुलीइंग' का साया

बहुत से बच्चे ऑनलाइन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के भी शिकार होते हैं.
© UNICEF
बहुत से बच्चे ऑनलाइन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के भी शिकार होते हैं.

दो-तिहाई बच्चों पर, ऑनलाइन डराए-धमकाए जाने, 'साइबर बुलीइंग' का साया

संस्कृति और शिक्षा

एक सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया भर में लगभग दो-तिहाई बच्चों के साथ ऑनलाइन डराए-धमकाए जाने (cyberbullying) की घटनाएँ हुई हैं और ये मामले बढ़ते जा रहे हैं. हर दो में से एक बच्चे के अनुसार, उन्हें यह नहीं पता है कि सही सहायता किस तरह से प्राप्त की जा सकती है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा कराए गए एक हालिया सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष साझा किया गया है.

यूएन प्रवक्ता स्तेफ़ान दुजैरिक ने बताया कि रिपोर्ट में “चिन्ताजनक रुझान” सामने आए हैं, जिसके अनुसार बच्चों की सुरक्षा के लिए पूरे ऑनलाइन तंत्र को तेज़ी से एक साथ मिलकर कार्रवाई करने की आवश्यकता है.

ये निष्कर्ष ऐसे समय सामने आए हैं जब बढ़ते युद्ध, विस्थापन, निर्धनता और हिंसा के स्तर में वृद्धि के कारण, बच्चे बढ़ते जोखिमों का सामना कर रहे हैं. 

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बच्चों के विरुद्ध हिंसा पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि डॉक्टर नजात माल्ला मजिद ने जिनीवा में मंगलवार को मानवाधिकार परिषद में यह रिपोर्ट पेश की. 

उन्होंने कहा कि “हम आज एक बार फिर ऐसी चुनौतीपूर्ण दुनिया में मिल रहे हैं, जहाँ बच्चे इसकी सबसे बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं.”

एआई से बढ़ा ख़तरा

रिपोर्ट में कहा गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने बच्चों के सामने ऑनलाइन प्लैटफ़ॉर्म पर मौजूद ख़तरों की प्रकृति को मूल रूप से बदलकर उन पर व्यापक प्रभाव डाला है.

इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए दुनिया के हर क्षेत्र से 30 हज़ार से अधिक बच्चों की राय ली गई है.

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 'जनरेटिव एआई' का तेज़ी से होता विकास और उसकी आसान उपलब्धता 'साइबर बुलीइंग', या ऑनलाइन जगत में डराए धमकाए जाने के स्वरूप को बदल रही है. 

जनरेटिव एआई की मदद से टैक्स्ट, तस्वीरें, संगीत और कम्प्यूटर कोड जैसी सामग्री बनाई जा सकती है, जिनमें ChatGPT, गूगल जैमिनाई समेत अन्य चैट बॉट्स भी शामिल हैं.

इससे ऑनलाइन उत्पीड़न पहले की तुलना में अधिक तेज़ी से फैल सकता है, अधिक लक्षित हो गया है, इसे पहचानना कठिन हो गया है और यह अनेक मंचों पर बड़े पैमाने पर फैलने में सक्षम हो गया है.

वर्तमान माहौल में, एआई से तैयार झूठी तस्वीरें व वीडियो (डीपफ़ेक) तथा चैटबॉट और अन्य टूल्स के माध्यम से बच्चों को प्रभावित करने के तरीके़ मौजूद है. इन पर बच्चे अक्सर अत्यधिक भरोसा कर लेते हैं और वास्तविक मानवीय बातचीत और नक़ली सामग्री में अन्तर नहीं कर पाते.

डॉक्टर मजिद के कार्यालय द्वारा चेतावनी दी गई कि एआई डीपफेक़ का इस्तेमाल “बच्चों को ऑनलाइन अपमानित, धमकाने और शोषित करने के लिए लगातार किया जा रहा है.”

शिकायत क्यों नहीं कर पा रहे बच्चे?

रिपोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार, बच्चे, ऑनलाइन डराए-धमकाए जाने की घटनाओं की शिकायत करने में कठिनाई महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें कथित सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है. साथ ही, उन्हें अपने साथियों द्वारा अस्वीकार किए जाने या वयस्कों द्वारा न्यायसंगत आकलन नहीं किए जाने का डर होता है.

शिकायत नहीं करने का प्रभाव तुरन्त और हानिकारक हो सकता है. यह सिर्फ़ कुछ ही सेकेंड में मानसिक तनाव और सम्मान को नुक़सान पहुँचाने का कारण बन सकता है. सबसे दुखद मामलों में, यह बच्चों को आत्महत्या की ओर भी धकेल सकता है.

डॉक्टर मजिद ने बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा तंत्र में जुड़े सभी हितधारकों को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिनमें देशों की सरकारें, उद्योग, शिक्षक, परिवार, बच्चे और युवा शामिल हैं.

उनके अनुसार, यही एकमात्र तरीक़ा है जिससे बच्चों को ऑनलाइन हानि से सुरक्षित रखा जा सके और उन्हें सुरक्षित डिजिटल भागेदारी का अवसर मिल सके.

डॉक्टर मजिद की टीम से परामर्श लेने वाले एक बच्चे ने कहा, “डिजिटल स्थान ऐसे नहीं होने चाहिए, जहाँ नुक़सान की शिकायत की जाए लेकिन कभी समाधान न निकले...ये ऐसे स्थान होने चाहिए जहाँ मदद जल्दी, सुरक्षित और मानवीय तरीके़ से मिले.”