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अफ़ग़ानिस्तान: मध्य पूर्व में धधकते युद्ध के बीच गहराता मानवीय संकट

23 फरवरी, 2026 को अफगानिस्तान के परवान प्रांत में 23 फरवरी, 2026 को नारंगी जैकेट पहने विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकर्ताओं ने स्थानीय समुदायों को गेहूं के आटे, दालों, तेल, नमक और एलएनएस सहित आवश्यक खाद्य वस्तुओं का वितरण किया।
© WFP/Danijela Milic अफ़ग़ानिस्तान के परवान प्रांत में संयुक्त राष्ट्र द्वारा खाद्य सहायता वितरित की जा रही है.

अफ़ग़ानिस्तान: मध्य पूर्व में धधकते युद्ध के बीच गहराता मानवीय संकट

शान्ति और सुरक्षा

संयुक्त राष्ट्र की एक वरिष्ठ अधिकारी ने सुरक्षा परिषद को आगाह किया है कि ईरान और पाकिस्तान की सीमा से लगे अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती इलाक़ों में हालात, देश की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं. पिछले कुछ हफ़्तों में पाकिस्तान के साथ सैन्य झड़पों में आम नागरिक हताहत हुए हैं और मध्य पूर्व में बढ़ते हिंसक टकराव से, अफ़ग़ानिस्तान में व्याप्त मानवीय संकट और अधिक गहराने की आशंका है.

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) की कार्यवाहक प्रमुख जॉर्जेट गैगनॉन ने कहा है कि मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थित देशों में हिंसक टकराव और उसके प्रभाव, अफ़ग़ानिस्तान पर अतिरिक्त दबाव और अस्थिरता बढ़ा रहा है. देश की “पहले से ही कमज़ोर अर्थव्यवस्था” में वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ रही हैं, जिससे हालात और कठिन हो रहे हैं.

जॉर्जेट गैगनॉन ने 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद को बताया कि ईरान के रास्ते जाने वाले व्यापार मार्ग पर, वहाँ हिंसक संघर्ष के कारण अब पहले से अधिक अनिश्चितता पैदा हो गई है. वहीं पाकिस्तान के साथ सीमा बन्द होने से दबाव और बढ़ा है.

उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से अफ़ग़ानिस्तान की बढ़ती दूरी के कारण देश के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता, सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रतिबद्धताओं, मानवाधिकार मुद्दों और मानवीय संकट से निपटना कठिन होता जा रहा है.

उन्होंने चेतावनी दी, “यदि इन मुद्दों का समाधान नहीं किया गया, तो अफ़ग़ानिस्तान फिर से क्षेत्रीय और वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है - जैसेकि बड़े पैमाने पर पलायन, आतंकवाद और मादक पदार्थों का व्यापार.”

पाकिस्तान के साथ सीमा पर झड़पें

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच अनसुलझे मुद्दों के कारण दोनों देशों की सीमा पर तनाव और टकराव की स्थिति बनी हुई है. इसमें अफ़ग़ान शहरों पर हवाई हमलों की घटनाएँ भी हुई हैं.

कार्यवाहक प्रमुख जॉर्जेट गैगनॉन ने इसकी “गम्भीर मानवीय और आर्थिक क़ीमत” के प्रति आगाह करते हुए तत्काल संघर्ष विराम की अपील की, ताकि मानवीय सहायता बिना किसी बाधा के लोगों तक पहुँच सके.

उन्होंने यह भी कहा कि सत्तारूढ़ तालेबान अधिकारियों को यह साबित के लिए अधिक प्रयास करने होंगे कि वे आतंकवाद-रोधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के प्रति गम्भीर हैं.

चुनौतीपूर्ण मानवीय स्थिति

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सितम्बर 2023 से अब तक अफ़ग़ानिस्तान ने पड़ोसी देशों से लौटे लगभग 55 लाख अफ़ग़ानों को अपने यहाँ समायोजित किया है. यह सब अन्तरराष्ट्रीय सहायता में गिरावट के बावजूद हुआ है, लेकिन समाज में अभी किसी बड़े स्तर के विघटन के संकेत नहीं दिखे हैं.

जॉर्जेट गैगनॉन ने कहा, “मानवीय संकट और गहरा हो रहा है. इसकी वजह अफ़ग़ान शरणार्थियों की बड़े पैमाने पर वापसी से बढ़ती ज़रूरतें, सहायता में भारी कटौती और सत्तारूढ़ अधिकारियों की ऐसी नीतियाँ हैं, जो अफ़ग़ान लोगों के कल्याण से अधिक वैचारिक कठोरता को प्राथमिकता देती हैं.”

उन्होंने बताया कि वर्षों से जारी आर्थिक बदहाली और बार-बार आने वाले जलवायु झटकों ने परिवारों की मुश्किलों से निपटने की क्षमता कम कर दी है. इसके कारण नए सिरे से पलायन और आंतरिक विस्थापन की स्थितियाँ पैदा हो रही हैं.

महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबन्ध इन चुनौतियों को और गम्भीर बना रहे हैं.

जॉर्जेट गैगनॉन ने कहा कि कार्यबल में महिलाओं की अनुपस्थिति से “मध्यम और दीर्घ अवधि में देश की महत्वपूर्ण मानव संसाधन क्षमता कमज़ोर हो रही है.”

सहायता में कमी

2026 में मानवीय सहायता साझेदारों ने 1.71 अरब डॉलर की अपील के ज़रिए, लगभग 1.75 करोड़ अफ़ग़ानों तक सहायता पहुँचाने की योजना बनाई है. ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या के आधार पर अफ़ग़ानिस्तान दुनिया में दूसरे स्थान पर है, जबकि कुल वित्तीय आवश्यकता के मामले में यह छठे स्थान पर है. हालाँकि, अब तक इस अपील की केवल 10 प्रतिशत धनराशि ही मिल पाई है.

संयुक्त राष्ट्र के लिए सहायता पहुँचाना और अफ़ग़ान महिलाओं तक सेवाएँ पहुँचाना भी कठिन हो गया है, क्योंकि पिछले छह महीनों से संयुक्त राष्ट्र की अफ़ग़ान महिला कर्मचारियों पर काम करने का प्रतिबन्ध लगा हुआ है.

“हम एक बार फिर सत्तारूढ़ अधिकारियों से आग्रह करते हैं कि वे इन प्रतिबन्धों को हटाएँ और संयुक्त राष्ट्र की महिला कर्मचारियों को अपने कार्यालयों में लौटने की अनुमति दें.”

वहीं, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने तालेबान प्रशासन के उन निर्णयों पर चिन्ता जताई है, जो देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रयासों को कमज़ोर कर सकते हैं.