महिलाओं की स्थिति पर आयोग का 70वाँ सत्र: न्याय, समानता व कार्रवाई की पुकार
कमज़ोर व भेदभावपूर्ण क़ानूनों, हिंसक टकराव सम्बन्धी हिंसा, न्याय तक पहुँच में मौजूद अनगिनत अवरोधों समेत अन्य चुनौतियों की वजह से विश्व भर में महिलाओं व लड़कियों को समान क़ानूनी संरक्षण व उपाय उपलब्ध नहीं हैं, जिससे मानवाधिकारों व सतत विकास की दिशा में प्रगति पर जोखिम है. संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों ने यूएन मुख्यालय में सोमवार को महिलाओं की स्थिति पर आयोग (CSW) के 70वें सत्र के उदघाटन कार्यक्रम में न्याय के लिए ठोस कार्रवाई का आहवान किया है.
महिलाओं की स्थिति पर आयोग (CSW), लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों व सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित, यूएन का मुख्य वैश्विक निकाय है. यूएन आर्थिक एवं सामाजिक परिषद द्वारा इसे वर्ष 1946 में स्थापित किया गया था.
महिला अधिकारों पर वैश्विक मानकों को स्थापित करने और लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति का आकलन करने के विषय में, इस आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
हर वर्ष, देशों की सरकारों, यूएन एजेंसियों, और नागरिक समाज के प्रतिनिधि न्यूयॉर्क में यूएन मुख्यालय में दो सप्ताह तक चलने वाले CSW सत्र में हिस्सा लेने के लिए जुटे हैं, जिसमें बीजिंग घोषणापत्र व कार्रवाई प्लैटफ़ॉर्म पर प्रगति की समीक्षा के साथ-साथ कार्रवाई के लिए प्राथमिकताएँ तय की जाती हैं.
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संकल्पों को कार्रवाई में बदलना होगा
यूएन आयोग के 70वें सत्र के लिए अध्यक्ष, कोस्टा रीका की राजदूत मारित्ज़ा चैन वैलवर्दे ने सोमवार को इस सत्र का उदघाटन करते हुए कहा कि अतीत में जिन महिलाओं ने हमारे लिए रास्ता बनाया है, जो महिलाएँ भविष्य में हमारे रास्ते पर चलेंगी...उन सभी के लिए यह हमारा दायित्व है.
“न्याय तक पहुँच, केवल एक अधिकार भर नहीं है. यह गरिमा, सशक्तिकरण, और व्यक्तियों व समाजों के लिए प्रगति की आधारशिला भी है. और यह सभी महिलाओं व लड़कियों के लिए लैंगिक समानता व सशक्तिकरण को प्राप्त करने के लिए अति-आवश्यक भी है.”
उन्होंने बताया कि इस सत्र से पहले, सदस्य देशों के साथ पिछले कुछ महीनो में ठोस कार्रवाई के लिए विचार-विमर्श किया गया, ताकि इस विषय में नए मानकों को आकार दिया जा सके.
इसके तहत, सामुदायिक न्याय के लिए प्रयासरत कार्यकर्ताओं को औपचारिक पहचान देने, विभिन्न सैक्टर में, लैंगिक आवश्यकताओं के अनुरूप न्याय तक पहुँच को सुनिश्चित करने और डिजिटल न्याय व कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) संचालन व्यवस्था में नई भाषा को शामिल किया गया है.
साथ ही, लिंग-आधारित हिंसा से सम्बन्धित डेटा के लिए मानकीकृत प्रणाली तैयार किए जाने और जवाबदेही प्रयासों में नागरिक समाज की भूमिका को मान्यता दिए जाने पर भी बल दिया गया है.
“आइए, हम इस रोडमैप को पारित करके दुनिया को एक स्पष्ट व एकजुट सन्देश दें, ताकि सभी महिलाओं व लड़कियों के लिए न्याय की सुलभता सुनिश्चित हो और उसे मज़बूती मिले.”
लड़कियों व महिलाओं के लिए न्याय
संयुक्त राष्ट्र के शीर्षतम अधिकारी एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि महिला अधिकारों के लिए, एक भी क़दम आसानी से नहीं उठ पाया. उसके लिए जीत हासिल की गई.
“इसे महिलाओं व लड़कियों की पीढ़ियों ने, पैरोकारों व कार्यकर्ताओं ने, सामुदायिक नेताओं व न्याय की तलाश कर रहे लोगों ने जीता है. आपने जीता है.”
महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाया कि विश्व भर में, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को केवल 64 प्रतिशत अधिकार ही हासिल हैं. उनके अनुसार, हिंसक टकराव, जलवायु उथल-पुथल, बढ़ती असमानताओं और नई टैक्नॉलॉजी से पनपी चुनौतियों के बीच, महिला अधिकारों का विरोध भी तेज़ हुआ है.
“कड़ी मेहनत से जिन क़ानूनी रक्षा उपायों को हासिल किया गया था, उन्हें चोट पहुँचाई जा रही है.”
मगर, 40 से अधिक देशों में महिला अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए संविधान में बदलाव किए गए हैं. 90 प्रतिशत देशों में हिंसा के विरुद्ध क़ानूनों को मज़बूती दी गई है.
उन्होंने कहा कि दुनिया बदल रही है, चूँकि महिलाएँ इसे बदल रही हैं. लेकिन हमारे सामने अवरोध हैं, जिन्हें पार किया जाना है. अवसरों, नीतियों को लागू करने और न्याय तक पहुँच के रास्ते में खाइयाँ हैं, जिन्हें भरा जाना है.
यूएन प्रमुख ने एक नए विश्व को आकार देते समय, महिलाओं व लड़कियों के लिए न्याय को सुलभ बनाने के इरादे से चार अहम क्षेत्रों का उल्लेख किया: न्याय, सतत विकास का इंजन है. न्याय, शान्ति व सुरक्षा की नींव है. न्याय, मानवाधिकारों और मानव गरिमा का संरक्षक है. न्याय, एक सुरक्षित व समावेशी डिजिटल भविष्य के लिए अति-आवश्यक है.
वादे अब भी साकार नहीं हो पा रहे हैं
यूएन महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने अपने सम्बोधन में कहा कि अब इस विषय में और अधिक बहस की आवश्यकता नहीं है कि महिला अधिकार क्यों मायने रखते हैं. तथ्य स्पष्ट हैं और ऐसा भी नहीं है कि हमें यह बात पता नहीं है.
उन्होंने कहा कि विश्व भर में, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में केवल दो-तिहाई क़ानूनी अधिकार ही प्राप्त हैं. 54 प्रतिशत देशों में सहमति के आधार पर बलात्कार की परिभाषा नहीं है, 72 प्रतिशत देशों में बाल विवाह, मोटे तौर पर कन्या विवाह की अनुमति है, और 44 फ़ीसदी देशों में समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था अनिवार्य नहीं है.
ऐनालेना बेयरबॉक के अनुसार, ये सोच-समझ कर लिए गए निर्णय हैं, जो यूएन चार्टर, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा और इस आयोग (CSW) के पिछले 70 वर्षों के संकल्पों का उल्लंघन हैं.
इनमें सबसे चरम उदाहरण अफ़ग़ानिस्तान का है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति को सामान्य मानकर चलना, सक्रियता के साथ लिया गया एक ऐसा फ़ैसला होगा, जिसमें महिला अधिकारों के गम्भीर उल्लंघन को स्वीकार कर लिया जाए.
ऐनालेना बेयरबॉक ने ध्यान दिलाया कि वह यूएन महासभा की केवल पाँचवीं महिला अध्यक्ष हैं. पिछले 80 वर्षों में, एक महिला कभी भी यूएन महासचिव नहीं बनी है.
“सवाल यह नहीं है कि एक महिला को महासचिव क्यों बनना चाहिए, बल्कि यह कि क्यों नहीं...असल मायनों में न्याय तब तक नहीं दिया जाएगा, जब तक सत्ता में इसे न साकार किया जाए.”
हिंसक टकरावों से बिगड़ते हालात
महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) की कार्यकारी निदेशक सीमा बहाउस ने अपने सम्बोधन में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान से हेती, ईरान, म्याँमार, फ़लस्तीन, दक्षिण सूडान, सूडान, यूक्रेन, यमन समेत अन्य देशों में जारी हिंसक टकरावों व उसके प्रभावों से लैंगिक असमानता और गहरी होती जा रही है.
उन्होंने बताया कि पुरुषों के क़ानूनी अधिकारों की तुलना में महिलाओं को केवल 64 फ़ीसदी अधिकार ही हासिल हैं.
सीमा बहाउस के अनुसार, यदि वर्तमान रफ़्तार से ही क़दम बढ़ाए जाते रहे, तो महिलाओं व लड़कियों के लिए इस क़ानूनी खाई को पूरी तरह से पाटने में 286 वर्ष का समय लग सकता है.
एक सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 70 प्रतिशत देशों में, न्याय की तलाश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कहीं अधिक अवरोधों का सामना करना पड़ता है. 54 प्रतिशत देशों में बलात्कार की परिभाषा की व्याख्या अब भी सहमति के आधार पर नहीं की गई है.
UN Women की शीर्ष अधिकारी ने बताया कि जिन निष्कर्षों पर इस सत्र से पहले सहमति बनी है, उनका उद्देश्य, दंडहीनता की स्थिति का अन्त करना, और उन न्याय व्यवस्थाओं को स्थापित करना है, जोकि सभी के लिए काम करें.