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सावित्री पिंगवा अपनी मातृभाषा में तैयार की गई शिक्षण सामग्री से पढ़ाई करती हैं.

भारत - ओडिशा में मातृभाषा में शिक्षा से बदल रही है सीखने की दुनिया

© UNICEF India
सावित्री पिंगवा अपनी मातृभाषा में तैयार की गई शिक्षण सामग्री से पढ़ाई करती हैं.

भारत - ओडिशा में मातृभाषा में शिक्षा से बदल रही है सीखने की दुनिया

एसडीजी

भारत में यूनीसेफ़ और ओडिशा सरकार की साझेदारी से शुरू हुई मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा पहल, आदिवासी समुदाय के बच्चों को उसी भाषा में सीखने का अवसर दे रही हैजिसमें वे सोचते और दुनिया को समझते हैं. इससे बच्चों के सीखने के अनुभव और बुनियादी शिक्षा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है.

ओडिशा के केओंझर ज़िले के घने जंगलों के बीच बसे कुंभितांगरी गाँव में सात वर्ष की सावित्री पिंगवा को एक दिन, पहली बार यह अनुभव हुआ कि स्कूली कक्षा किस तरह की हो सकती है. उलझन और चुप्पी से भरी जगह नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह जहाँ शब्द उसके अपने हों और वह उन्हें पहचान भी सके.

गाँव में अधिकतर बच्चे हो भाषा बोलते हैं. यही भाषा उनके घरों, कहानियों और त्यौहारों की भाषा है. लेकिन लम्बे समय तक स्कूल की किताबें ओडिया भाषा में थीं, जिसे बहुत से बच्चे समझ ही नहीं पाते थे.

सावित्री की माँ आरती ने बताया कि पहले स्कूल उसके लिए डर की जगह था. आरती, अकेले ही अपनी बेटी - सावित्री का पालन-पोषण कर रही हैं.

वह याद करती हैं, “हर सुबह मैं उसे स्कूल जाते देखती थी. उसके चेहरे पर उत्साह नहीं, डर होता था.” 

ओडिशा के कई आदिवासी इलाक़ों में यही स्थिति रही है. बच्चे हो, कुई, डिडायी, जुआंग, साओरा, गोंडी और कई अन्य भाषाएँ बोलते हुए स्कूल पहुँचते हैं, लेकिन शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई अक्सर ओडिया भाषा में होती है.

कुंभितांगरी के सरकारी प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक पदमलोचन सहाय बताते हैं कि इससे बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर पड़ता था.

वो कहते हैं, “बच्चे स्कूल आने से डरते थे. वे किताबों में लिखी हुई बातें, समझ नहीं पाते थे, कक्षा में हिस्सा नहीं ले पाते थे. धीरे-धीरे उन्होंने कोशिश करना भी छोड़ दिया. कई बच्चों ने स्कूल आना ही बन्द कर दिया.”

ओडिशा के केओंझर में बहुभाषी शिक्षा (एमएलई) कक्षा सत्र के दौरान बच्चों की मातृभाषा में स्थानीय रूप से विकसित शिक्षण सामग्री के साथ पढ़ाई.
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मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा

इसी चुनौती को देखते हुए ओडिशा सरकार ने यूनीसेफ़  के सहयोग से, ज़िला समग्र शिक्षा कार्यक्रम के साथ मिलकर मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा को मज़बूत करने की पहल शुरू की. 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति  के तहत इस पहला उद्देश्य था कि बच्चे उसी भाषा में सीखना शुरू करें जिसमें वे सोचते और समझते हैं.

इस पहल की शुरुआत दो भाषाओं वाली किताबों से हुई. एक ही पृष्ठ पर बच्चों को उनकी मातृभाषा और उसके साथ ओडिया शब्द दिखाई देते हैं. उदाहरण के लिए, पेड़ के लिए “दारु” और “गछा” दोनों शब्द साथ लिखे होते हैं.

इससे बच्चे लिखित रूप पहचानते हुए अपनी भाषा में अर्थ समझ पाते हैं.

पाठ्यसामग्री भी बदली. अब कहानियाँ उन गाँवों, जंगलों और त्यौहारों से जुड़ी हैं जिन्हें बच्चे अपने आसपास देखते हैं. पढ़ाई बच्चों के जीवन का आईना बन गई है.

यूनीसेफ़ के सहयोग से शिक्षकों को बहुभाषी शिक्षण पद्धति का प्रशिक्षण दिया गया. साथ ही, आंगनवाड़ी केन्द्रों के लिए तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए 21 जनजातीय भाषाओं में “नुआ अरुणिमा” पुस्तिकाएँ तैयार की गईं. 

समुदाय के लोगों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया, ताकि स्थानीय ज्ञान और संस्कृति को पढ़ाई का हिस्सा बनाया जा सके.

कक्षाओं में इस्तेमाल की जाने वाली ओडिया भाषा की पाठ्यपुस्तकें.
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निश्चित बदलाव

सावित्री के लिए बदलाव तुरन्त नज़र आया. उसने पहली बार एक ऐसी किताब उठाई जिसमें शब्द वही थे जो वह घर पर बोलती थी.

उसकी माँ आरती भावुक होकर कहती हैं, “अब सावित्री ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल जाती है. वह घर आकर मुझे भी सिखाती है. वह बताती है कि थाली गोल क्यों होती है और किसान बैलों के गले में घंटियाँ क्यों बाँधते हैं. अपनी ही बेटी से सीखना बहुत अच्छा लगता है.”

स्कूल में भी बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा. प्रधानाध्यापक पदमलोचन सहाय बताते हैं कि अब बच्चे समय से पहले स्कूल पहुँचते हैं और पढ़ाई में सक्रिय भाग लेते हैं.

उन्होंने बताया, “पहले बच्चे चुप रहते थे. अब वे सवाल पूछते हैं, जवाब देते हैं और किताबों में रुचि दिखाते हैं.”

इस कार्यक्रम ने स्कूल और समुदाय के रिश्ते को भी मज़बूत किया है. हर महीने माता-पिता की बैठकों में उन्हें बच्चों की किताबें और मातृभाषा आधारित सामग्री दिखाई जाती है. जब वे अपनी ही भाषा को किताबों में देखते हैं, तो गर्व की भावना पैदा होती है.

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती वर्षों में मातृभाषा में पढ़ाई बच्चों की समझ, पढ़ने-लिखने की क्षमता और आगे दूसरी भाषाएँ सीखने की नींव को मज़बूत करती है.

अभिभावक-शिक्षक बैठक के दौरान मातृभाषा में तैयार शिक्षण सामग्री अभिभावकों को वितरित की जाती है.
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ताकि कोई भी पीछे न छूट जाए

ओडिशा सरकार का मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और निपुण ओडिशा बुनियादी शिक्षा मिशन के अनुरूप है. इसका उद्देश्य बच्चों को हमेशा मातृभाषा तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसी आधार पर ओडिया, अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं की ओर आगे बढ़ाना है.

आज कुंभितांगरी में सावित्री आत्मविश्वास के साथ पढ़ रही है. अब किताबें उसके लिए डर नहीं, अवसर का दरवाज़ा हैं.

उसकी कहानी अब ओडिशा के कई गाँवों में दोहराई जा रही है, जहाँ बच्चे यह समझ रहे हैं कि उनकी अपनी भाषा कोई बाधा नहीं, बल्कि उनकी ताक़त है.

क्योंकि जब शिक्षा बच्चे की भाषा में होती है, तो चुप्पी भागेदारी में बदल जाती है और डर आत्मविश्वास में.

और शायद सबसे अहम बात यह है कि बच्चे यह मानने लगते हैं कि वे भी उतना ही आगे बढ़ सकते हैं जितना कि दुनिया का कोई भी अन्य बच्चा.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.