'रेडियो बेगम': अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए एक दुर्लभ सार्वजनिक मंच
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हर सुबह कई कारें शहर के अलग-अलग इलाक़ों में जाकर, 'रेडियो बेगम' में काम करने वाली महिला पत्रकारों को स्टूडियो तक लेकर आती हैं. ये युवा महिलाएँ अब अपने आप ऑफ़िस नहीं आ पाती हैं, चूँकि शहर में अब उनके लिए कहीं अकेले आना-जाना अब बहुत जटिल हो गया है.
रेडियो स्टेशन की संस्थापक हमीदा अनन ने यूएन न्यूज़ को बताया कि, “वे बस या टैक्सी से अपने-आप नहीं आतीं, क्योंकि किसी महिला के लिए, विशेषकर युवा महिलाओं के लिए, शहर में आना-जाना अब कठिन हो गया है.” उन्होंने कहा कि इसका कारण, महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही पर थोपी गई पाबन्दियाँ हैं.
स्टूडियो में पहुँचने के बाद महिला पत्रकार पहले सम्पादकीय बैठक करती हैं, फिर अपने कार्यक्रम तैयार करने में जुटती हैं और उसके बाद प्रसारण के लिए 'लाइव' हो जाती हैं.
‘अँधेरे में उम्मीद की किरण’
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के समर्थन से संचालित इस रेडियो स्टेशन में लगभग 30 महिलाएँ काम करती हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रान्तों में से लगभग 12 प्रान्त ऐसे हैं, जहाँ तालेबान अधिकारियों ने मीडिया में महिलाओं की आवाज़ प्रसारित करने तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. इन प्रान्तों के अलावा रेडियो बेगम, देश के अधिकांश हिस्सों में प्रसारण करता है.
हमीदा अनन कहती हैं, “आज अगर आप अफ़ग़ानिस्तान में टेलीविज़न चैनल बदलें या अलग-अलग रेडियो स्टेशन सुनें, तो आपको सिर्फ़ पुरुषों की ही आवाज़ें सुनाई देंगी या पुरुषों की ही तस्वीरें दिखाई देंगी.”
पुरुष आवाज़ों से भरे इस माहौल में रेडियो बेगम अलग पहचान रखता है.
वह कहती हैं, “पूरी तरह से इस पुरुष-प्रधान दुनिया में किसी महिला की आवाज़ सुनना एक छोटी सी रौशनी जैसा है, अँधेरे के विशाल समुद्र में उम्मीद की एक किरण.”
महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा संचालित
रेडियो बेगम की शुरुआत मार्च 2021 में हुई थी, यानि तालेबान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता को फिर से हथिया लिए जाने के कुछ ही महीने पहले.
इसकी संस्थापक हमीदा अनन का जन्म काबुल में हुआ था. लेकिन जब वह आठ वर्ष की थीं, तो युद्ध के कारण उन्हें अपने परिवार के साथ देश छोड़ना पड़ा. हमीदा स्विट्ज़रलैंड में पली-बढ़ीं और उन्होंने वहीं पत्रकारिता की पढ़ाई की.
उन्होंने वर्ष 2001 में तालेबान शासन के पतन के बाद अफ़ग़ानिस्तान का रुख़ किया, ताकि देश में मीडिया के विकास में योगदान दे सकें.
शुरुआत में रेडियो बेगम पर संगीत, मनोरंजन कार्यक्रम और महिलाओं के साक्षात्कार प्रसारित होते थे. इन कार्यक्रमों में पिछले 20 वर्षों में अफ़ग़ान महिलाओं की उपलब्धियों को उजागर किया जाता था.
हमीदा अनन कहती हैं, “रेडियो बेगम महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा बनाया गया एक रेडियो स्टेशन है.” लेकिन अगस्त 2021 में तालेबान के सत्ता में आने के बाद मीडिया संस्थानों को बहुत जल्दी अपनी सामग्री बदलनी पड़ी.
“एक ही रात में हमें संगीत प्रसारण बंद करना पड़ा. एक ही रात में हमें अपने मनोरंजन कार्यक्रमों को कम करना पड़ा.”
पाबन्दियों के बावजूद काम जारी
समय बीतने के साथ महिलाओं और मीडिया पर पाबन्दियाँ लगातार बढ़ती गईं. महिलाओं को धीरे-धीरे सरकारी कामकाज से बाहर कर दिया गया. महिला पत्रकारों को भी कड़े नियमों के तहत काम करना पड़ता है.
वे केवल महिलाओं का ही साक्षात्कार ले सकती हैं और किसी पुरुष के साथ स्टूडियो में अकेले नहीं रह सकतीं.
हमीदा अनन याद करती हैं कि, “चेतावनियाँ और धमकियाँ लगातार मिलती रहती थीं.” प्रसारण जारी रखने के लिए रेडियो स्टेशन ने किसी भी राजनैतिक टकराव से दूर रहने का फ़ैसला किया.
“हमने तय किया कि हम राजनैतिक मुद्दों पर बात नहीं करेंगे. यही एक कारण है कि हम अब भी काम जारी रख पा रहे हैं.”
2024 के अन्त में तालेबान अधिकारियों द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाज़ सुनाई देना “अनुचित” है. इस फ़ैसले के बाद कई प्रांतों में रेडियो और टेलीविज़न प्रसारण में महिलाओं की आवाज़ पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
हमीदा अनन कहती हैं, “हम महिलाओं की सेवा करने वाले रेडियो स्टेशन हैं. हम अब एक सामान्य मीडिया संस्थान नहीं रहे.”
शिक्षा, एक मिशन
ऐसे माहौल में रेडियो बेगम ने धीरे-धीरे अपने कार्यक्रमों में बदलाव किया और शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया. “हम शिक्षा के लिए प्रसारण माध्यमों का उपयोग करने वालों में अग्रणी रहे हैं.”
2021 की शरद ऋतु से ही स्टेशन ने पाठ्यक्रम प्रसारित करना शुरू कर दिया था. उस समय लड़कियों के स्कूल जाने पर व्यापक प्रतिबन्ध अभी लागू नहीं हुआ था. बाद में जब किशोरियों के लिए स्कूल बन्द कर दिए गए, तो यही रेडियो बेगम के काम का मुख्य हिस्सा, एक मिशन सा बन गया.
“उन्होंने स्कूल बन्द कर दिए. हाँ, स्कूल जाना मना है, लेकिन शिक्षा नहीं. इसलिए हम जितना सम्भव हो सके, शिक्षा को घर-घर तक पहुँचाने की कोशिश करेंगे.”
आज रेडियो स्टेशन हर दिन अफ़ग़ानिस्तान में स्कूली पाठ्यक्रम पर आधारित छह घंटे के शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित करता है. इनमें तीन घंटे डारी भाषा में और तीन घंटे पश्तो भाषा में होते हैं.
रेडियो स्टेशन द्वारा स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक सहयोग, चिकित्सकीय सलाह, आध्यात्मिकता, महिलाओं की उद्यमिता और नशे की लत जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं. इनमें से अधिकतर कार्यक्रम लाइव होते हैं, जिनमें श्रोता फ़ोन करके अपने सवाल पूछ सकते हैं.
इस्लाम के ज़रिए महिला अधिकारों को बढ़ावा
महिलाओं के अधिकारों पर बात करने के लिए रेडियो बेगम ने एक अनूठा रास्ता चुना है: धार्मिक ग्रंथों का सहारा.
हमीदा अनन बताती हैं, “हम महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देते हैं और इसके लिए इस्लाम का सहारा लेते हैं, क्योंकि यही एक रास्ता है.”
उनका कहना है कि स्टेशन का धार्मिक कार्यक्रम क़ुरआन की आयतों, सूरह और हदीसों पर आधारित होता है, जिन्हें महिला धर्मविद प्रसारित करती हैं.
“समाज में महिलाओं की जगह को लेकर इस्लाम का नज़रिया बहुत स्पष्ट है.” विरासत, तलाक, विधवाओं की स्थिति और शिक्षा से जुड़े नियमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “हम आयतों और सूरह का उल्लेख करके समझाते हैं… ताकि इन पर किसी आपत्ति की गुंजाइश न बचे.”
शुरुआत में अधिकारियों ने कड़ाई से कार्यक्रम की पड़ताल की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रस्तुतकर्ता धार्मिक ग्रंथों को सही तरह समझती हैं. लेकिन उनकी प्रतिक्रिया सम्पादकीय टीम के लिए हैरान करने वाली थी.
“उन्होंने हमसे कहा कि यह उनका पसन्दीदा कार्यक्रम है.” आज यह इस रेडियो स्टेशन के सबसे अधिक सुने जाने वाले कार्यक्रमों में शामिल है.
‘अब मेरे पति का व्यवहार बेहतर हो गया है’
देश भर से हर कार्यक्रम में श्रोताओं के अनेक फ़ोन आते हैं. हमीदा अनन कहती हैं, “हमारे कार्यक्रमों के असर को समझने का एक बहुत अच्छा ज़रिया होते हैं, श्रोताओं के फ़ोन.”
मांग बढ़ने के कारण कुछ कार्यक्रमों, विशेषकर मनोवैज्ञानिक सहयोग से जुड़े कार्यक्रमों की अवधि भी बढ़ा दी गई है.
बामियान प्रान्त की एक श्रोता ने बताया कि उन्होंने एक कार्यक्रम के ज़रिए अपने विरासत के अधिकारों के बारे में जाना और बाद में अपने परिवार में उन अधिकारों को हासिल भी किया.
एक अन्यमहिला ने बताया कि एक कार्यक्रम सुनने के बाद उनके पति के व्यवहार में बदलाव आ गया. “मेरे पति ने कार्यक्रम सुना और उसके बाद से उनका व्यवहार बहुत बेहतर हो गया है और वे पहले से ज़्यादा सहृदय हो गए हैं.”
हमीदा अनन कहती हैं कि ऐसे अनुभव “हमें प्रेरित करते हैं और थोड़ा सुक़ून भी देते हैं.”
‘हमें आगे आना पड़ता है’
इन छोटी-छोटी प्रगतियों के बावजूद, वास्तविकता अब भी कठिन है. हमीदा अनन कहती हैं, “अफ़ग़ान महिला होने का मतलब है कई पाबंदियों और चिन्ताओं के बीच जीवन जीना.”
ऐसे माहौल में रेडियो बेगम अभिव्यक्ति और संवाद के लिए एक दुर्लभ मंच प्रदान करता है.
वे कहती हैं, “हम उन ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें असल में सरकार को महिलाओं के लिए सुनिश्चित करना चाहिए. लेकिन जब सरकार ने अपनी आबादी के 50 प्रतिशत हिस्से को नज़रअन्दाज़ करने का निर्णय कर लिया है, तो हमें आगे आना पड़ता है.”
एक ऐसे देश में जहाँ महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से लगातार दूर किया जा रहा है, रेडियो बेगम ने अपना प्रसारण जारी रखा है और यह एक ऐसा दुर्लभ मंच बना हुआ है जहाँ महिलाओं की आवाज़ अब भी सुनी जा सकती है.