सामाजिक परिवर्तन में प्रेरक भूमिका: डॉक्टर हंसा मेहता स्मृति व्याख्यान 2026
भारत की प्रसिद्ध महिला अधिकार पैरोकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक और लेखिका डॉक्टर हंसा मेहता की स्मृति में, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में शुक्रवार, 6 मार्च को वार्षिक व्याख्यान का आयोजन किया गया. यूएन में भारत के स्थाई मिशन द्वारा आयोजित इस सम्वाद की थीम में, समाज की कायापलट करने और अवरोधों को तोड़ने में, डॉक्टर हंसा मेहता की प्रेरणादायक भूमिका पर ध्यान केन्द्रित किया गया. इस कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग यहाँ उपलब्ध है.
यूएन महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने अपने मुख्य अतिथि सम्बोधन में कहा कि डॉक्टर हँसा मेहता द्वारा सुझाए गए सिद्धाँत, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के पारित होने के 77 वर्ष और यूएन चार्टर के पारित होने के 80 वर्ष बाद भी बहुपक्षवाद आधारित कामकाज को दिशा दिखा रहे हैं.
डॉक्टर हंसा मेहता का जन्म 3 जुलाई 1897 को भारत की तत्कालीन बड़ौदा रियासत (वर्तमान में गुजरात) में हुआ था, और वह आगे चलकर महिला अधिकारों की मुखर पैरोकार बनीं.
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के गठन के शुरुआती दिनों में तैयार किए गए – मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र (UDHR) के प्रारूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. डॉक्टर हँसा मेहता, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग में, अमेरिका की ऐलीनॉर रूज़वेल्ट के अलावा एक मात्र अन्य महिला सदस्य थीं.
मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र के अनुच्छेद - 1 में, मूल रूप में, सम्पूर्ण मानवता का प्रतिनिधित्व करने के लिये पुरुषों का नाम दिया गया था, जिसमें लिखा गया था – “सभी पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं.”
डॉक्टर हंसा मेहता ने इस वाक्यांश को बदलकर यह लिखे जाने का प्रस्ताव दिया: “सभी व्यक्ति स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं.” उनके द्वारा प्रस्तावित इस समावेशी भाषा को ना केवल स्वीकार किया गया, बल्कि इस बदलाव को लैंगिक समानता व महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है.
भाषा में बदलाव की अहमियत
महासभा प्रमुख ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि भाषा, तटस्थ नहीं है, बल्कि यह क़ानून, नीतियों और सामाजिक अपेक्षाओं को आकार देती है.
"इस व्याख्यान में डॉक्टर हँसा मेहता की विरासत को सम्मान देना, हमें ध्यान दिलाता है कि किस तरह से भाषा में एकमात्र बदलाव से, यह सुनिश्चित करने में मदद मिली कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा से सभी मनुष्यों की गरिमा व अधिकारों को पुष्ट किया जाए."
जनरल असेम्बली अध्यक्ष ने अपने सम्बोधन में सचेत किया कि डॉक्टर हँसा मेहता, महिला सशक्तिकरण के लिए एक शक्तिशाली आवाज़ के रूप में उभरीं, विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में.
इस क्रम में, ऐनालेना बेयरबॉक ने उनके जीवन से तीन अहम सबक़ साझा किए गए.
पहला, यह बहुत ज़रूरी है कि अपने सिद्धान्तों के पक्ष में मज़बूती से खड़ा हुआ जाए.
दूसरा, समानता की प्राप्ति के लिए प्रयास, सम्पूर्ण समाज के लिए निरन्तर जारी रहते हैं, और केवल आधी आबादी के लिए नहीं.
तीसरा, यदि कोई एक व्यक्ति ही इतने विशाल बदलावों को आकार दे सकता है, तो यह कल्पना कीजिए कि यदि ऐसे अवसर पूरी मानवता को उपलब्ध कराए जाएं, तो कितनी गहराई तक समाज में परिवर्तन लाना सम्भव है.
समानता की पैरोकार
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने कहा कि डॉक्टर मेहता ने आजीवन, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए क़ानूनी सुधारों की अगुवाई की और शिक्षा, वेतन और महिलाओं व पुरुषों में सम्पत्ति वितरण समेत अन्य क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाई.
उन्होंने कहा कि एक ऐसे दौर में जब विश्व के अधिकाँश हिस्सों में ऐसी मांग कर पाना कठिन था, जब भारतीय संविधान के मसौदे को तैयार किया जा रहा था, डॉक्टर मेहता संविधान सभा के 15 महिला सदस्यों में से थीं.
राजदूत पी, हरीश के अनुसार, डॉक्टर मेहता ने महिलाओं के लिए सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय की मांग की, और यह स्पष्ट किया कि महिलाओं के सहयोग के बिना, यह प्राचीन भूमि अपने सही स्थान नहीं ले सकती है.
इस कार्यक्रम में, कोस्टारिका, ग्रीस, किर्गिज़ गणराज्य, ब्रुनेई दारुस्सलाम के राजनयिकों ने हिस्सा लिया और अपने अनुभवों व निजी पड़ावों के ज़रिए बताया कि किस तरह से उन्होंने अपने जीवन व देश में महिला सशक्तिकरण के लिए बदलाव आते देखा है.