अति-महत्वपूर्ण खनिजों के लिए होड़ में, न्यायपूर्ण उपायों व सन्तुलन साधने पर बल
कार्बन रहित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने के लिए लिथियम और कोबाल्ट समेत अन्य अति-महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता अहम हो जाती है. गुरूवार को ऊर्जा, अहम खनिजों व सुरक्षा के मुद्दे पर सुरक्षा परिषद की एक अहम बैठक हो रही है. एक नज़र, परिवर्तन की इस प्रक्रिया को न्यायपूर्ण व समानता आधारित बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर.
भूराजनैतिक उथलपुथल के बावजूद, जीवाश्म-ईंधन आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था से स्वच्छ ऊर्जा, बिजली स्रोतों की ओर बढ़ने की प्रक्रिया अपने रास्ते पर आगे बढ़ रही है.
अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2024 में लिथियम की मांग में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी, और निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफ़ाइट व दुर्लभ खनिजों (rare earth) के लिए यह आँकड़ा 6 से 8 प्रतिशत है.
बिजली चालित वाहनों, बैटरियों, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि हो रही है, और उसके साथ ही अति-महत्वपूर्ण खनिजों की मांग में उछाल आ रहा है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव, एजेंसियों व संस्थाओं द्वारा इस विषय में दिशानिर्देश जारी किए जा रहे हैं, बैठकों का आयोजन हो रहा है और खनन व इन खनिज पदार्थों के दोहन पर रिपोर्ट तैयार की जा रही हैं.
इन प्रयासों का उद्देश्य है कि स्वच्छ, कम कार्बन आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था का लाभ ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में लोगों तक पहुँचाया जाए.
अति-महत्वपूर्ण खनिज पर पैनल
- यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अप्रैल 2024 में, ऊर्जा स्रोतों में बदलाव के लिए अति-महत्वपूर्ण खनिजों पर एक पैनल को गठित किया था, ताकि परिवर्तन की इस प्रक्रिया को न्यायपूर्ण, निष्पक्ष व सतत बनाया जा सके.
- इसका लाभ हर उस देश व समुदाय तक पहुँचाना होगा, जोकि इस सम्पदा से धनी हैं.
- पिछले वर्ष, इस पैनल ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसे महासचिव गुटेरेश ने स्वच्छ ऊर्जा के साथ-साथ, समृद्धि व समानता को प्रोत्साहन देने के लिए एक दिशानिर्देशिका क़रार दिया था.
- रिपोर्ट में उन रास्तों की पड़ताल की गई है, जिनसे नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन ऊर्जा इत्यादि) के क्षेत्र में हो रही प्रगति को न्याय व समता की बुनियाद पर तैयार किया जाए.
- साथ ही, इससे टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलेगा, आम लोगों का सम्मान होगा, पर्यावरण की रक्षा होगी और प्रचुर संसाधनों वाले विकासशील देशों में समृद्धि आएगी.
ठोस कार्रवाई के लिए यूएन दिशानिर्देश
जून 2025 में प्रकाशित गाइडलाइन्स में, उन क़दमों को साझा किया गया है, जिनसे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि खनिज पदार्थों का दोहन करते समय मानवाधिकारों, पर्यावरणीय संरक्षण और समतापूर्ण विकास का ध्यान रखा जाए. यह तीन बुनियादी सिद्धान्तों पर विकसित किया गया है:
- मानवाधिकारों को इन गतिविधियों के केन्द्र में रखा जाना होगा. समुचित प्रक्रिया अपनानी होगी, प्रभावों का आकलन करना होगा, निष्पक्ष ढंग से पहले से पूरी जानकारी के साथ सहमति ली जानी होगी, और कष्ट-निवारण के लिए व्यवस्था भी ज़रूरी है.
- पर्यावरण व ग्रह का पूर्णतया ध्यान रखना होगा. पर्यावरणीय व सामाजिक प्रभावों का आकलन, जैवविविधता का संरक्षण, प्रवेश-निषिद्ध इलाक़ों का चिन्हिकरण, चक्रीय अर्थव्यवस्था के उपायों को अपनाया जाना और खनन स्थलों में पुनर्वास भी ज़रूरी है.
- पूरी प्रणाली में न्याय व समता को सुनिश्चित करना होगा. इसके तहत, समुदायों की अर्थपूर्ण भागेदारी, लैंगिक समानता, आदिवासी लोगों को शामिल करने और लाभ के न्यायसंगत वितरण पर ज़ोर देना होगा.
विकास के लिए विशाल अवसर: UNCTAD
व्यापार एवं विकास के लिए यूएन संगठन (UNCTAD) के अनुसार, अति-महत्वपूर्ण खनिजों के लिए मांग में उछाल आ रहा है, जिससे भूराजनैतिक व औद्योगिक समीकरणों को नया आकार मिल रहा है. प्रचुर संसाधनों वाले विकासशील देश, नई उभरती वैल्यू चेन के केन्द्र में हैं.
ऐसे देशों के लिए अति-महत्वपूर्ण खनिजों पर बढ़ती निर्भरता, उनके विकास के लिए विशाल अवसर प्रदान करती है.
यूएन एजेंसी का कहना है कि कच्चे खनिज के निर्यात के बजाय, ये देश स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण (processing) और उसकी अहमियत में वृद्धि (value addition) पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं, ताकि उसका आर्थिक लाभ हासिल हो सके.
उदाहरण के लिए, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में कोबाल्ट के स्थानीय तौर पर प्रसंस्करण के निर्यात मूल्य में वृद्धि हुई है. 2022 में यह 16.7 करोड़ डॉलर से बढ़कर 6 अरब डॉलर तक पहुँच गया है.
पर्यावरण के लिए गम्भीर जोखिम: UNEP
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने चिन्ता जताई है कि खनिज उत्पादन में विस्तार होने से गम्भीर पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और भूराजनैतिक जोखिम उपज सकते हैं.
खनन और प्रसंस्करण से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा बढ़ेगी, जैवविविधता की हानि होगी और मानवाधिकारों को ठेस पहुँचने की भी आशंका है, विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के लिए.
वहीं, आपूर्ति में क़िल्लत और बाज़ारों में प्रतिस्पर्धा से क़ीमतों में उतार-चढ़ाव, भूराजनैतिक तनाव और सम्वेदनशील इलाक़ों में खनन के लिए दबाव बढ़ेगा.
इसके मद्देनज़र, यूएन एजेंसी ने खनन स्थलों पर संचालन व्यवस्था का विस्तार करने और उसे सम्पूर्ण वैल्यू चेन तक बढ़ाने का आग्रह किया है, जिसके लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग, पारदर्शी व्यवस्था, और देशों की सरकारों, उद्योग जगत व समुदायों में तालमेल ज़रूरी है.