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विश्व के किसी भी देश में, महिलाओं के लिए पूर्ण क़ानूनी समानता नहीं - UN Women

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© UN Women/Sultan Mahmud Mukut
बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार में महिलाएँ, लिंग-आधारित हिंसा के विरोध में प्रदर्शन कर रही हैं. (फ़ाइल)

विश्व के किसी भी देश में, महिलाओं के लिए पूर्ण क़ानूनी समानता नहीं - UN Women

महिलाएँ

8 मार्च को 'अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस' से पहले, महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) ने एक नया ऐलर्ट जारी किया है: अधिकारों और क़ानून के शासन को बनाए रखने के लिए स्थापित न्याय प्रणालियाँ, महिलाओं व लड़कियों के लिए हर जगह विफल साबित हो रही हैं. विश्व भर में, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को केवल 64 प्रतिशत क़ानूनी अधिकार ही हासिल हैं, जिसकी वजह से उन्हें भेदभाव, हिंसा और जीवन के हर चरण में बहिष्करण का सामना करना पड़ता है.

महिलाओं और लड़कियों के लिए न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने पर केन्द्रित, संयुक्त राष्ट्र महासचिव की एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि दुनिया भर में महिलाएँ और लड़कियाँ अब भी क़ानूनी रूप से असमानताओं का सामना कर रही हैं.

प्रमुख निष्कर्ष

  • 54 प्रतिशत देशों में, बलात्कार को अब भी सहमति के आधार पर परिभाषित नहीं किया गया है. इसका अर्थ यह है कि किसी महिला के साथ बलात्कार होने पर भी क़ानून इसे अपराध के रूप में मान्यता नहीं दे सकता है.
     
  • राष्ट्रीय क़ानून के तहत लगभग तीन-चौथाई देशों में, लड़कियों को अब भी शादी के लिए मजबूर किया जा सकता है.
     
  • 44 प्रतिशत देशों में, समान मूल्य के कार्य के लिए समान वेतन का कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है. यानि, महिलाएँ समान कार्य करने पर भी पुरुषों की तुलना में, कम वेतन पाने की स्थिति में हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, यह क़ानूनी असमानता महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, अवसर और सामाजिक न्याय तक पहुँच को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है.

कॉक्स बाज़ार में रोहिंग्या महिलाओं का एक समूह, पेंट ब्रश पकड़ते हुए और मुस्कुराते हुए, कला के माध्यम से अपनी लचीलापन और रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
© UN Women/Sanjida Rahman
कॉक्सेस बाज़ार के बहुउद्देश्यीय महिला केन्द्र में रोहिंग्या किशोरियाँ, भित्ति-चित्र बनाने की गतिविधि में भाग लेती हुई.

हिंसा के मामलों में उछाल

यूएन वीमैन की कार्यकारी निदेशक सीमा बहाउस ने कहा कि “जब महिलाओं और लड़कियों को न्याय से वंचित किया जाता है, तो नुक़सान केवल एक ही मामले तक सीमित नहीं रहता."

"इससे जनता का विश्वास कमज़ोर होता है, संस्थाओं की वैधता खोती है और क़ानून का शासन कमज़ोर पड़ता है. ऐसी न्याय प्रणाली जो आधी आबादी के लिए असफल है, वह न्याय बनाए रखने का दावा नहीं कर सकती.”

मगर, लैंगिक समानता के लिए लम्बे समय से व्यक्त किए जा रहे संकल्पों के विरोध में प्रतिक्रियाएँ भी तेज़ हो रही है, जिससे महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के उल्लंघन में मामलों में उछाल आ रहा है. 

अपराधियों को सज़ा नहीं मिलने (दंडहीनता) के चलन से यह समस्या और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है, जोकि सिर्फ़ अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑनलाइन प्लैटफ़ॉर्म और युद्धग्रस्त क्षेत्रों तक फैली हुई है.

रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में कानूनों को फिर से लिखा जा रहा है ताकि महिलाओं और लड़कियों की स्वतंत्रता सीमित हो, उनकी आवाज़ दबाई जा सके और हिंसा करने वालों को सज़ा नहीं मिले.

इसके अलावा, टैक्नॉलॉजी के तेज़ी से विस्तार और उस पर क़ानून और नियामन की कमी के कारण, महिलाओं और लड़कियों के विरूद्ध डिजिटल हिंसा बढ़ती जा रही है.रिपोर्ट के अनुसार, सज़ा से बच निकलने की प्रवृत्ति के कारण, ऑनलाइन उत्पीड़न और हमलों के मामलों में अपराधियों को बहुत कम ही जवाबदेह ठहराया जाता है.

युद्ध और हिंसक संघर्ष वाले क्षेत्रों में, बलात्कार को अब भी युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. केवल दो वर्षों के भीतर यौन हिंसा के दर्ज मामलों में 87 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

यूएन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएँ अपनी गिरफ़्तारी के डर का सामना कर रही हैं.
UNAMA
यूएन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएँ अपनी गिरफ़्तारी के डर का सामना कर रही हैं.

बदलाव सम्भव, लेकिन...

यूएन महासचिव की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बदलाव अब भी सम्भव है. संयुक्त राष्ट्र के आकलन में, दुनिया के 87 प्रतिशत देशों में घरेलू हिंसा के विरुद्ध क़ानून हैं. 

साथ ही, पिछले एक दशक में 40 से अधिक देशों ने, महिलाओं और लड़कियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा को मज़बूत किया है. हालाँकि, रिपोर्ट स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि केवल क़ानून बना देना पर्याप्त नहीं है. 

आज भी भुक्तभोगी महिलाओं को, भेदभावपूर्ण सामाजिक मान्यताएँ चुप रहने के लिए मजबूर करती हैं और न्याय की राह में बड़ी बाधा बनती हैं. 

इन मान्यताओं में भुक्तभोगी महिला को ही दोषी ठहराना, सामाजिक कलंक, डर और समुदाय का दबाव जैसी परिस्थितियाँ शामिल हैं. नतीजतन, बेहद गम्भीर हिंसा से लेकर महिलाओं की लक्षित हत्याओं जैसे अपराध भी, अक्सर बिना सज़ा के रह जाते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की न्याय तक पहुँच केवल क़ानूनी ख़ामियों से ही नहीं रुकती, बल्कि रोज़मर्रा की व्यावहारिक बाधाएँ भी उन्हें न्याय से दूर कर देती हैं. इनमें मुक़दमे का ख़र्च, लम्बी प्रक्रिया में लगने वाला समय, भाषा की समस्या और उन संस्थाओं पर गहरा अविश्वास शामिल है.

'अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस' 2026 की थीम है: अधिकार. न्याय. कार्रवाई: सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए. यूएन वीमैन ने इसके तहत, सभी देशों से तात्कालिक और निर्णायक कार्रवाई की अपील की है.

संगठन ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं और लड़कियों के लिए न्याय और समान अधिकार तब तक अधूरे रहेंगे, जब तक उनके विरूद्ध होने वाले उल्लंघनों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी और उनके लिए हर स्तर पर सुरक्षित, समान और सम्मानजनक जीवन की सुनिश्चित नहीं किया जाता.