1 अरब से अधिक लोग मोटापे की चपेट में, समाधान की सख़्त आवश्यकता
दुनिया भर में, एक अरब से अधिक लोग मोटापे की अवस्था में जीवन गुज़ार रहे हैं, जिससे उनके हृदयवाहिनी रोग, डायबिटीज़, कैंसर, श्वसन व पाचन तंत्र समेत अन्य बीमारियों की चपेट में आने का जोखिम बढ़ जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि अगर कड़े क़दम नहीं उठाए गए, तो मोटापे से प्रभावित लोगों की संख्या, 2030 तक दोगुनी हो सकती है, जिससे स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा, और प्रति वर्ष 3 हज़ार अरब डॉलर का आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ सकता है.
हर वर्ष, 4 मार्च को 'विश्व मोटापा दिवस' मनाया जाता है, ताकि लोगों में मोटापे (obesity) और इसके स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 1990 के बाद वयस्कों में मोटापे की दर दोगुनी से अधिक हो गई है, जबकि किशोरों में यह 4 गुना बढ़ चुका है.
इसके अलावा, मोटापा अब केवल विकसित देशों की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि कम और मध्य आय वाले देशों में भी यह यह तेज़ी से बढ़ रहा है.
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2021 में, 37 लाख लोग मोटापे से जुड़ी बीमारियों के कारण, मौत के शिकार हो गए थे.
मोटापा और अधिक वजन क्या हैं?
दरअसल, अधिक वजन और मोटापा तब होता है जब शरीर में अतिरिक्त वसा (fat) जमा हो जाए और ऊर्जा का सन्तुलन बिगड़ जाए. यानि, जितनी कैलोरी हम भोजन से लेते हैं, उसकी तुलना में कम ऊर्जा शारीरिक गतिविधियों में ख़र्च हो.
WHO के अनुसार, मोटापा एक दीर्घकालिक बीमारी है जो बार-बार लौट सकती है. यह, केवल जीवनशैली का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक जटिल, दीर्घकालिक स्वास्थ्य स्थिति की वजह से भी होता है, जिसमें आनुवांशिक बनावट, पर्यावरणीय कारक, जैविकी और सामाजिक परिस्थितियाँ शामिल हैं.
पिछले दशकों में, भोजन की उपलब्धता, आर्थिक विकास, खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में बदलाव, वैश्वीकरण और औद्योगिक खाद्य प्रणालियों के असर ने मोटापे को बढ़ावा दिया है.
कुछ लोगों में मोटापे के स्पष्ट कारण भी पाए जाते हैं, जैसे कुछ दवाइयाँ, बीमारियाँ, कम शारीरिक गतिविधियों की जीवनशैली या चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ.
ये सभी कारक ऐसा माहौल बना रहे हैं जो लोगों को मोटापे की ओर ले जाता है, जिससे यह अब एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन चुका है, जिसमें 1 अरब से अधिक लोग मोटापे की चपेट में हैं.
स्वास्थ्य पर प्रभाव
अब, अधिक वजन और मोटापा अब केवल दिखने की समस्या नहीं रहे, बल्कि यह गम्भीर स्वास्थ्य जोखिम भी उत्पन्न कर रहा है.
बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य पर अधिक वजन गम्भीर असर डालता है. इससे टाइप-2 डायबिटीज़ और हृदय रोग जैसी गम्भीर बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है और ये रोग अपेक्षाकृत जल्दी शुरू हो सकते हैं.
2024 तक, 5 वर्ष से कम उम्र के 3.5 करोड़ बच्चे अधिक वजन वाले पाए गए. वहीं, 5 से 19 वर्ष की आयु के 39 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर अधिक वजन वाले थे, जिनमें 16 करोड़ मोटापे से प्रभावित थे.
मोटापा, बच्चों और किशोरों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है. यह उनके स्कूल प्रदर्शन और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में मोटापे का शिकार होने वाले बच्चे, वयस्क अवस्था में भी मोटापे से ग्रसित हो सकते हैं और उनमें गम्भीर गै़र-संचारी रोग विकसित होने का जोखिम अधिक होता है.
कुपोषण और मोटापे का दोहरा संकट
यूएन एजेंसी के अनुसार, कई कम और मध्यम आय वाले देशों को, अब कुपोषण और मोटापे का एक साथ सामना करना पड़ रहा है. ये देश अब भी संक्रामक रोगों और पोषण की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. यहाँ गै़र-संचारी रोगों के जोखिम, जैसे मोटापा और अधिक वजन, भी तेजी से बढ़ रहे हैं.
इन देशों के बच्चे गर्भावस्था, शिशुकाल और बचपन में पर्याप्त पोषण नहीं मिलने के ख़तरे से अधिक प्रभावित होते हैं.
साथ ही, ये बच्चे अक्सर सस्ते और कम पोषण वाले, उच्च वसा, अधिक चीनी और उच्च नमक वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं. और, कम शारीरिक गतिविधि के साथ यह भोजन प्रवृत्ति बच्चों में मोटापे को बढ़ावा देता है, जबकि कुपोषण की समस्या बनी रहती है.
रोकथाम सम्भव
विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा और उससे जुड़े अधिकतर रोगों की रोकथाम और प्रबन्धन किया जा सकता है. इसके लिए, व्यक्तिगत स्तर पर सही खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और बच्चों में स्वास्थ्यवर्धक आदतें विकसित करना महत्वपूर्ण है.
इसके अलावा, समाज और पर्यावरण भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.
खाद्य उद्योग को फ़ास्ट फू़ड और उच्च शर्करा वाले उत्पादों में वसा, चीनी और नमक कम करना चाहिए, स्वस्थ विकल्प उपलब्ध और सुलभ बनाने चाहिए, और बच्चों व किशोरों को लक्षित उत्पादों के विज्ञापन पर रोक लगानी चाहिए.
इसी तरह, नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाद्य वातावरण, शारीरिक गतिविधि के लिए स्थान और व्यापक स्वास्थ्य नीतियाँ बनाना आवश्यक है.
विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापे को रोकने और नियंत्रित करने के लिए बहु-क्षेत्रीय कार्रवाई ज़रूरी है.
WHO की पहल
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सदस्य देशों ने, 2012 में वैश्विक पोषण लक्ष्यों को अपनाया था, जिसका उद्देश्य बच्चों में अधिक वजन बढ़ने और 2025 तक डायबिटीज़ व मोटापे में वृद्धि को रोकना था.
यूएन स्वास्थ्य संगठन ने, 2025 में इन लक्ष्यों को 2030 तक के लिए बढ़ा दिया और स्वीकार किया कि कुपोषण और मोटापे के “दोहरे बोझ” जैसी समस्याओं से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर तेज़ कार्रवाई की आवश्यकता है.
2022 में आयोजित 75वीं विश्व स्वास्थ्य सभा में, सदस्य देशों ने मोटापे की रोकथाम और प्रबन्धन के लिए नए सुझाव अपनाए और WHO के “WHO Acceleration plan to stop obesity” को स्वीकृति दी, जिसका उद्देश्य मोटापे के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण पाना और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना है.
इसके अलावा, पिछले साल दिसम्बर में, WHO ने वज़न घटाने वाली नई दवाओं के उपयोग के बारे में, अपने पहले दिशा-निर्देश जारी किए, जो GLP-1 therapies नामक उपचार श्रृंखला पर केन्द्रित है, जिसमें लिराग्लूटाइड, सेमाग्लूटाइड और टिरज़ेपाटाइड (liraglutide, semaglutide and tirzepatide) जैसी दवाएँ शामिल हैं.
इनमें, सशर्त सलाह समेत इन दवाओं के लम्बे समय तक सुरक्षित रूप से, प्रयोग के बारे में बताया गया है. GLP-1 थैरेपीज़, एक प्राकृतिक हार्मोन की नक़ल करके भूख, ब्लड शुगर और पाचन को नियंत्रित करती हैं.
हालांकि, WHO ने इस बात पर बल दिया कि केवल इन दवाओं के इस्तेमाल से वज़न नहीं घटेगा, क्योंकि सबसे प्रभावी उपचार में दवा के साथ सन्तुलित आहार, शारीरिक व्यायाम और स्वास्थ्य पेशेवरों से दीर्घकालिक सलाह शामिल होती है.
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने यह भी कहा कि मोटापा केवल व्यक्तिगत प्रयास से हल नहीं हो सकता और इसके लिए देशों की सरकारों और उद्योग जगत की ओर से व्यापक क़दम उठाए जाने होंगे.