भारत-यूएन कोष: काबो वर्दे में मातृत्व देखभाल व नवजात स्वास्थ्य के लिए नई पहल
अटलांटिक महासागर में स्थित द्वीपीय देश काबो वर्दे में, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सेहत को मज़बूती देने के इरादे से एक नई शुरुआत होने जा रही है. भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष के समर्थन से, काबो वर्दे के 9 आबाद द्वीपों में मातृत्व, नवजात और बाल स्वास्थ्य सेवाओं को समर्थन देने के लिए 7.49 लाख अमेरिकी डॉलर की एक पहल लागू की जाएगी.
हाल के दशकों में, काबो वर्दे ने बच्चों के जीवन की रक्षा करने और टीकाकरण कवरेज के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है.
मगर, गर्भावस्था और नवजात शिशु के स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं में अब भी असमानताएँ बनी हुई हैं, विशेषकर प्रसव से पहले और उसके बाद की देखभाल में ऐसी अनेक समस्याएँ हैं. इनकी रोकथाम सम्भव है, फिर भी ये नवजात शिशुओं की मृत्यु का एक बड़ा कारण हैं.
इस पृष्ठभूमि में यह पहल, इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए एक समग्र और प्रणाली-आधारित दृष्टिकोण अपनाएगी, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और ज़रूरतमन्द आबादी तक उसकी पहुँच, दोनों को टिकाऊ रूप से बेहतर बनाया जा सके.
क्या है परियोजना?
“सर्वप्रथम भविष्य: काबो वर्दे में मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना (2026–2027),” नामक इस दो-वर्षीय परियोजना का उद्देश्य, काबो वर्दे में गुणवत्तापूर्ण मातृ और नवजात स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता में भौगोलिक व सामाजिक असमानताओं में कमी लाना है.
भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष द्वारा 7.49 लाख डॉलर के वित्तीय समर्थन से यह परियोजना, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) और काबो वर्दे के स्वास्थ्य मंत्रालय की साझेदारी में लागू की जाएगी. इसका समन्वय, दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए यूएन कार्यालय (UNOSSC) द्वारा किया जाएगा.
इस पहल के ज़रिए, सतत विकास लक्ष्यों, SDG-3 (सर्वजन के लिए स्वस्थ जीवन व कल्याण), SDG-5 (लैंगिक समानता), SDG-10 (असमानताओं में कमी) और SDG-17 (लक्ष्यों के लिए साझेदारी) में प्रगति की आशा है.
इस पहल के तहत मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य से जुड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था के ढाँचे को सशक्त किया जाएगा. साथ ही, देश भर में आपात प्रसूति एवं नवजात देखभाल सेवाओं में सुधार लाने, स्वास्थ्य डेटा प्रणालियों को मज़बूत बनाने और सेवाकालीन प्रशिक्षण के माध्यम से स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता बढ़ाने की योजना है.
इसके अलावा, गुणवत्तापूर्ण और मानकीकृत सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य केन्द्रों को मातृ और नवजात स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपकरण भी मुहैया कराए जाएँगे.
बेहतर भविष्य की ओर
यह पहल, माँ से बच्चे में एचआईवी, सिफ़लिस और हेपेटाइटिस-बी के संक्रमण के जोखिम का अन्त करने पर भी लक्षित है, जिसके लिए त्वरित जाँच सेवाओं का दायरा बढ़ाया जाएगा, लैब प्रणालियों को सुदृढ़ किया जाएगा और निगरानी तंत्र को और मज़बूत किया जाएगा.
एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2027 तक यह पहल, काबो वर्दे में लगभग 14 हज़ार गर्भवती महिलाओं, 14 हज़ार नवजात शिशुओं एवं 1 वर्ष से कम आयु के बच्चों, तथा 5 वर्ष से कम उम्र के क़रीब 35 हज़ार बच्चों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचाएगी.
इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रशासन को मज़बूती देने और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की सुलभता में व्याप्त असमानताओं में कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है.
दक्षिण–दक्षिण सहयोग
इस परियोजना का एक प्रमुख स्तम्भ, भारत और काबो वर्दे के बीच दक्षिण–दक्षिण सहयोग है. इसके तहत तकनीकी आदान-प्रदान, सहकर्मी शिक्षण कार्यशालाओं और ज्ञान-साझाकरण मंचों के माध्यम से, स्वास्थ्यकर्मियों को भारत के कम लागत वाले मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य देखभाल मॉडल और डिजिटल स्वास्थ्य नवाचारों से सीखने का अवसर मिलेगा.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग, विकासशील देशों के बीच विकास साझेदारी को कहा जाता है, जिसमें ये देश, आपसी सम्मान व लाभ के सिद्धान्तों पर आधारित, साझा विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करते हैं.
भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष, इसी भावना के तहत, अनेक देशों में विकास परियोजनाएँ चला रहा है. यह कोष 2017 में, 15 करोड़ डॉलर मुहैया कराने के संकल्प के साथ आरम्भ किया गया था, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के सहयोग से चलाया जा रहा है, और इसका प्रबन्धन यूएन दक्षिण-दक्षिण सहयोग कार्यालय (UNOSSC) करता है.