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डब्ल्यूएचओ द्वारा आयोजित भारत में पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन में विभिन्न सूखी जड़ी-बूटियों से युक्त लकड़ी के ढक्कन वाले कांच के जारों की एक पंक्ति प्रदर्शित की गई।

विश्व वन्यजीव दिवस पर औषधीय पौधों का महत्व

© UN News/Anshu Sharma
कई पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों में जड़ी-बूटियों का उपयोग किया जाता है.

विश्व वन्यजीव दिवस पर औषधीय पौधों का महत्व

जलवायु और पर्यावरण

प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों से लेकर आधुनिक दवाओं और सौन्दर्य उत्पादों में औषधीय पौधों का उपयोग किया जाता है. विश्व भर में, इन पौधों की मांग में वृद्धि हो रही है, जिससे उनका महत्व और भी बढ़ गया है.

हर वर्ष, 3 मार्च को मनाए जाने वाले विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर, हमने औषधीय पौधों के महत्व को समझने के लिए जानकारी जुटाई है.

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के प्रजाति अस्तित्व आयोग में औषधीय पौधा विशेषज्ञ समूह की निवर्तमान सह-अध्यक्ष डैना जे लीमेन कहती हैं कि ये पौधे, पारिस्थितिकी तंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बेहद अहम हैं.

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि, “पिछले 15 वर्षों में ध्यान, कुछ गिनी-चुनी प्रजातियों से हटकर उन कई जीवों की ओर गया है, जिन पर मानव स्वास्थ्य, आजीविका और पूरी जैवविविधता निर्भर करती है.”

उनका कहना है कि इस वर्ष औषधीय और सुगन्धित पौधों पर ज़ोर यह दर्शाता है कि संरक्षण में अब पौधों की भूमिका को भी बराबर महत्व दिया जा रहा है.

औषधीय पौधा क्या है?

औषधीय पौधे की कोई एक तय परिभाषा नहीं है. फिर भी दुनिया भर में लोग सदियों से उपचार के लिए अलग-अलग पौधों का उपयोग करते आए हैं.

आज इनका उपयोग केवल पारम्परिक चिकित्सा तक सीमित नहीं है. ये आधुनिक दवाइयों, खाद्य पदार्थों, इत्र, सौन्दर्य उत्पादों और घरेलू सामान का भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं.

प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के साथ इनके सही उपयोग और संरक्षण पर ध्यान देना और भी ज़रूरी हो गया है.

संरक्षण पर बदलती सोच

डैना जे लीमेन कहती हैं कि लम्बे समय तक वन्यजीव संरक्षण का ध्यान मुख्य रूप से जानवरों पर रहा, लेकिन अब इस सोच का दायरा व्यापक हो रहा है.

उन्होंने कहा, “यह आश्चर्य की बात है कि न केवल ग्रामीण लोग, बल्कि औषधि उद्योग सहित कितने समुदाय ऐसी दवाइयों पर निर्भर हैं, जो किसी न किसी रूप में पौधों से प्राप्त होती हैं.”

विश्व वन्यजीव दिवस का इस वर्ष का विषय भी, लुप्तप्राय वन्य जीवों और वनस्पतियों के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के तहत संरक्षण प्राथमिकताओं में आए महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है. यह अन्तरराष्ट्रीय समझौता वैश्विक स्तर पर वन्यजीव व्यापार को नियंत्रित करता है.

डैना जे लीमेन ने कहा. “कई मायनों में यह स्पष्ट सन्देश है कि संरक्षण केवल जानवरों तक सीमित नहीं है. CITES भी मान रहा है कि अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में शामिल कई प्रजातियाँ पौधे हैं.”

30,000 पौधे: उपयोग और जोखिम

औषधीय पौधा विशेषज्ञ समूह और लंदन के रॉयल बॉटैनिक गार्डन्स के विशेषज्ञों ने दुनिया भर में पौधों की प्रजातियों और उनके उपयोग का व्यापक दस्तावेज़ तैयार किया है.

प्रकाशित साक्ष्यों और व्यापारिक आँकड़ों के आधार पर पौधों की लगभग 30 हज़ार प्रजातियों को औषधीय या सुगन्धित पौधों के रूप में पहचाना गया है.

लेकिन जैव विविधता की तरह ये पौधे भी बढ़ते ख़तरे झेल रहे हैं. योरोप में किए गए हाल के आकलनों से पता चलता है कि कृषि विस्तार, भूमि उपयोग में बदलाव और जंगली पौधों की ताबड़तोड़ कटाई से कई प्रजातियाँ जोखिम में हैं.

जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा ख़तरा बनता जा रहा है, ख़ासतौर पर उन पौधों के लिए जो आर्द्रभूमि और पहाड़ी क्षेत्रों जैसे सम्वेदनशील इलाक़ों में उगते हैं.

पारम्परिक चीनी औषधीय उपचार के लिए सामग्री तैयार की जा रही है.
© Unsplash/Kian Zhang
पारम्परिक चीनी औषधीय उपचार के लिए सामग्री तैयार की जा रही है.

संकटग्रस्त आयुर्वेदिक पौधा

एक ऐसा पौधा जो औषधीय प्रजातियों की अहमियत और उनकी नाज़ुक स्थिति दोनों दर्शाता है, वह है नर्दोस्टैकिस जटामांसी, जिसे स्पाइकनार्ड भी कहा जाता है. यह हिमालय की एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है और आयुर्वेद सहित कई पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों में लम्बे समय से उपयोग की जाती रही है.

नेपाल, भारत और चीन के ऊँचे इलाक़ों में उगने वाले इस पौधे की सुगन्धित जड़ों से दवाइयाँ और आवश्यक तेल बनाए जाते हैं. लेकिन जड़ निकालने से अक्सर पूरा पौधा नष्ट हो जाता है. इसलिए इसकी कटाई सावधानी और टिकाऊ तरीक़े से करना ज़रूरी है, ताकि इसकी संख्या बनी रहे.

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की ‘लाल सूची’ में इसे अत्यन्त संकटग्रस्त माना गया है. इसलिए नर्दोस्टैकिस जटामांसी की टिकाऊ कटाई सुनिश्चित करने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं, विशेषकर नेपाल में, जहाँ जंगली पौधों की सुरक्षा के लिए व्यापारिक प्रतिबंध भी लगाए गए हैं.

डैना जे लीमेन ने कहा कि कटाई के टिकाऊ तौर तरीक़ों को अपनाकर संरक्षण और आजीविका के बीच सन्तुलन बनाया जा सकता है.

उन्होंने कहा. “अगर कटाई और व्यापार टिकाऊ तरीक़े से हों, तो इससे स्थानीय लोगों को आय मिलेगी और उन इलाक़ों की रक्षा भी होगी, जहाँ ये पौधे उगते हैं.”

उपभोक्ता और कम्पनियाँ क्या कर सकते हैं?

औषधीय और सुगन्धित पौधों की वैश्विक मांग तेज़ी से बढ़ रही है.

कई समुदाय लम्बे समय से प्राकृतिक उत्पादों पर निर्भर हैं. लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे बाज़ारों में मांग और बढ़ी है, जहाँ लोग पौधों से बने उपचार, सप्लीमेंट्स व सौन्दर्य उत्पादों को अधिक पसन्द कर रहे हैं.

डैना जे लीमेन ने कहा. “यह ज़रूरी है कि लोग ध्यान दें कि ये उत्पाद कहाँ से आ रहे हैं.” 

उन्होंने कुछ सुझाव भी दिए:

• उपभोक्ता सिर्फ़ विज्ञापन पर भरोसा न करें. यह देखें कि उत्पाद टिकाऊ और नैतिक तरीक़े से प्राप्त किए गए हैं या नहीं.

• अब स्वतंत्र ऑनलाइन साधन उपलब्ध हैं. उदाहरण के लिए ‘WildCheck’ मंच, जिसे, अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के विशेषज्ञ समूह, वन्यजीव व्यापार निगरानी नैटवर्क TRAFFIC, और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने मिलकर तैयार किया है. यह कम्पनियों और उपभोक्ताओं को यह जाँचने में मदद करता है कि पौधों की कटाई टिकाऊ है या नहीं, पर्यावरण पर प्रभाव का सही प्रबन्धन हो रहा है या नहीं, तथा संग्रह में शामिल समुदायों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार हो रहा है या नहीं.

• संरक्षण विशेषज्ञों की मदद से विकसित ‘FairWild’ जैसे प्रमाणन कार्यक्रम यह सुनिश्चित करते हैं कि पौधों की कटाई से लेकर बिक्री तक पर्यावरण, समाज और व्यावसायिक ज़िम्मेदारी के मानकों का पालन हो.