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नेपाल के जाजरकोट जिले के नागलाद में तीन महिलाओं ने UNFPA की भूकंप के प्रति प्रतिक्रिया के हिस्से के रूप में बातचीत में भाग लिया, प्रभावित क्षेत्र में महिलाओं और लड़कियों का समर्थन करने के प्रयासों पर प्रकाश डाला।

डिजिटल युग में बाल विवाह: टैक्नॉलॉजी के इस्तेमाल में जोखिम, मगर समाधान भी

© UNFPA 2023 के भूकम्प के बाद नेपाल में लड़कियाँ. यूएनएफ़पीए ने पाया कि 2015 के भूकम्प के बाद नेपाल में बाल विवाह के मामलों में वृद्धि हुई थी, और इसमें सोशल मीडिया की पहुँच ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

डिजिटल युग में बाल विवाह: टैक्नॉलॉजी के इस्तेमाल में जोखिम, मगर समाधान भी

महिलाएँ

डिजिटल माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल के इस दौर ने रिश्तों और समाज, दोनों को बदल कर रख दिया है. सोशल मीडिया ने युवाओं को नए अवसर और आवाज़ दी हैलेकिन इसी के साथ बाल विवाह जैसी पुरानी समस्या भी एक नए रूप में सामने आ रही है. टैक्नॉलॉजी कभी जोखिम बढ़ाती हैतो कभी बचाव की शक्ति भी देती है. सही जानकारीडिजिटल समझ के विकास और सहयोग के ज़रिए, यही साधन इस प्रथा का अन्त करने में सहायक भी साबित हो सकते हैं.

दुनिया के डिजिटल होने के साथ बाल विवाह जैसी पुरानी प्रथा भी नया रूप ले रही है. इंटरनेट जहाँ लोगों तक मानवाधिकारों की जानकारी पहुँचा रहा है और कई देश इसे रोकने के लिए क़ानून बना रहे हैं, वहीं, विश्व के कुछ हिस्सों में यह प्रथा अब भी जारी है.

वर्तमान में, 50 करोड़ से अधिक महिलाएँ और लड़कियाँ या तो अपने जीवन में बाल वधू हैं या फिर अतीत में रह चुकी हैं. 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग में, हर 5 में से 1 युवती की शादी 18 साल की उम्र से पहले हुई थी.

फिर भी, इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है. लगभग 10 साल पहले हर 4 में से 1 लड़की की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती थी. अब इसमें धीरे-धीरे कमी आई है. 

टैक्नॉलॉजी की भूमिका भी बढ़ रही है. कभी यह लड़कियों को “हाँ” कहने की ओर ले जाती है, तो कभी “ना” कहने की ताकत देती है.

एक नज़र उन 5 उदाहरणों पर जोकि यह दर्शाते हैं कि टैक्नॉलॉजी ने बाल विवाह के रूप को किस तरह से बदला है. और यह भी कि इन डिजिटल साधनों के उपयोग से इस प्रथा का स्थाई रूप से किस तरह अन्त किया जा सकता है.

1. अब ऑनलाइन माध्यम बाल विवाहों का माध्यम बन रहे हैं और अक्सर इनकी शुरुआत सोशल मीडिया पर होती है.

इस विषय पर आँकड़े सीमित हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी यही रुझान दिखाती है. वर्ष 2020 में, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने मानवीय संकट वाले क्षेत्रों में बाल विवाह पर एक अध्ययन शुरू किया. निर्धनता और उत्पीड़न के अलावा, ऐसे हालात बाल विवाह के बड़े कारणों में गिने जाते हैं.

नेपाल में वर्ष 2015 में आए भूकम्प से प्रभावित दो ज़िलों के लगभग 1,400 किशोर इस अध्ययन में शामिल थे, जिनकी शादी बचपन में हुई थी. उनमें से क़रीब एक-तिहाई ने बताया कि वे अपने जीवनसाथी से सोशल मीडिया पर मिले थे. यह मिलने का सबसे आम तरीक़ा था.

नेपाल के सिंधुपालचौक ज़िले की एक माँ ने शोधकर्ताओं को बताया कि, “हमारे समय में लड़की का हाथ माँगा जाता था. आजकल वे फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं.” ऐसे मामलों में शादी अक्सर कम उम्र में हो जाती है.

कुछ अन्य अध्ययनों में भी एशिया और लातिन अमेरिका क्षेत्र की लड़कियों ने बताया कि वे अपने भावी पति से सोशल मीडिया पर मिलीं. 

मध्य अफ़्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई में महिलाएँ और लड़कियाँ, यूएनएफ़पीए के सहयोग से डिजिटल साक्षरता पाठ्यक्रम में भाग ले रही हैं.
© UNFPA/Karel Prinsloo मध्य अफ़्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई में महिलाएँ और लड़कियाँ, यूएनएफ़पीए के सहयोग से डिजिटल साक्षरता पाठ्यक्रम में भाग ले रही हैं.

2. माता-पिता और स्थानीय समुदाय, युवाओं द्वारा टैक्नॉलॉजी के इस्तेमाल में उसी रफ़्तार के साथ नहीं चल पा रहे हैं.

वयस्कों की नज़र में ऑनलाइन और ऑफ़लाइन, दोनों ही अलग-अलग दुनिया हैं. लेकिन युवाओं के लिए दोनों एक ही हैं. वे दोस्ती, विचार और अपनी पहचान तक ऑनलाइन माध्यमों पर बना रहे हैं. फिर भी बड़े लोग इस बदलाव को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं.

बांगई की एक युवती ने कहा कि “डिजिटल दुनिया ने रिश्तों को देखने का तरीक़ा बदल दिया है. कभी-कभी हमें सिर्फ़ ऑनलाइन बातचीत से ही नज़दीकी महसूस होती है, जबकि रिश्ता उतना मज़बूत नहीं होता.”

“हमें रोकने या डाँटने से बेहतर है कि बड़े लोग हमारे मंच को समझें, हमसे बात करें और हमें आज़ादी और सुरक्षा के साथ सन्तुलन बनाना सिखाएँ.”

अक्सर वयस्क टैक्नॉलॉजी को ही दोष देते हैं. बांग्लादेश के रोहिंग्या शिविरों में कुछ माता-पिता बच्चों के मोबाइल पर विपरीत लिंग से बात करने को शादी की तैयारी का संकेत मानते हैं. 

नेपाल के एक अधिकारी ने चिन्ता जताई कि “बच्चे ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं. वो टैक्नॉलॉजी का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं.”

3. जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता पहले से अधिक है, लेकिन 'सामाजिक कलंक' और लैंगिक असमानता अब भी निर्णयों कोप्रभावित करते हैं.

टैक्नॉलॉजी के कारण कुछ सामाजिक मानदंड बदल रहे हैं. कुछ समुदायों में ऑनलाइन माध्यमों पर मिलने वाले किशोर अक्सर स्वयं ही विवाह का प्रस्ताव रखते हैं. ऐसे मामलों में, परिवारों द्वारा तय किए जाने वाले विवाह की बजाय प्रेम विवाह अधिक होते हैं. कुछ युवा दहेज जैसी परम्पराओं को भी ठुकरा रहे हैं.

फिर भी ये बदलाव पूरी तरह, परम्पराओं से दूरी नहीं दिखाते हैं. कम उम्र की लड़कियों को “ज़्यादा विवाह योग्य” मानना या विवाह से पहले के रिश्तों को बदनामी से जोड़ना, ऐसी धारणाएँ अब भी मौजूद हैं.

टैक्नॉलॉजी ने लड़कियों की असुरक्षा समाप्त नहीं की है. 'प्लान इंटरनेशनल' नामक संगठन की हाल ही प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, कई लड़कियाँ ऑनलाइन, बड़े उम्र के लोगों द्वारा दिखाए गए प्रेम और सुरक्षा के भ्रम में विवाह का “चयन” करती हैं. यूएन पर्यावरण एजेंसी (UNFP) का एक शोध दर्शाता है कि बहुत से किशोर घर में होने वाली हिंसा या असुरक्षा से बचने के लिए भी कम उम्र में शादी कर लेते हैं.

ऐसे विवाह अक्सर वह आज़ादी नहीं देते जिसकी उम्मीद की जाती है. बाल वधुएँ, हिंसा, स्कूल छूटने, जल्दी गर्भधारण और निर्धनता के ज़्यादा जोखिम में रहती हैं. कम उम्र में शादी करने वाले लड़कों को भी भारी आर्थिक ज़िम्मेदारियों जैसे असर झेलने पड़ते हैं.

दो महिलाओं के हाथों में नाजुक सफेद फूल हैं, जो ग्रामीण सीरिया में यूएनएफपीए द्वारा समर्थित सशक्तिकरण सभा के दौरान आशा और लचीलापन का प्रतीक हैं।
© UNFPA Syria/Alaa AlGhorra सीरिया के होम्स शहर में एक सुरक्षित स्थान पर महिलाएँ बाल विवाह के दौरान झेली गई पीड़ा के बारे में बात करती हैं. एक महिला ने बताया, “मैंने जितनी हिंसा झेली, उसके बाद मुझे लगता था कि मेरी क़िस्मत में ख़ुशी है ही नहीं.”

4. टैक्नॉलॉजी से शर्मिन्दा करने और शोषण के नए रूप उभरेहैं. कई स्थानों पर ज़बरन विवाह को अभी भी “सम्मान बचाने” का उपाय माना जाता है.

नई टैक्नॉलॉजी जहाँ नए रिश्ते बनाने के रास्ते खोलती है, वहीं उत्पीड़न और धोखे के ख़तरे भी बढ़ाती है. सीरिया की एक 18 वर्षीय युवती ने बताया कि “इंस्टाग्राम पर एक 40 साल के आदमी ने मुझे मनाने की कोशिश की. मैंने उसे ब्लॉक कर दिया, लेकिन वह अलग-अलग अकाउंट से मुझे परेशान करता रहा.”

यमन की एक युवती ने कहा कि “मैं ऑनलाइन किसी से प्यार करने लगी थी. बाद में पता चला कि वह नक़ली था और असल में मौजूद ही नहीं था.”

कई युवाओं को अपनी निजी तस्वीरें भेजने के लिए फुसलाया जाता है. साधारण तस्वीरों को भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से नक़ली अश्लील सामग्री में बदला जा सकता है. ऐसे मामलों में अक्सर कार्रवाई नहीं होती और नतीजे पीड़ितों को झेलने पड़ते हैं. इनमें बाल विवाह भी हो सकता है.

सीरिया के एक 22 वर्षीय युवक ने बताया कि, “मैंने अपने समुदाय में सोशल मीडिया की वजह से परेशान करने वाली घटनाएँ देखी हैं. लड़की किसी युवक पर भरोसा कर तस्वीरें भेजती है. फिर वह उन्हें उजागर कर देता है. इसके बाद परिवार ‘इज़्ज़त’ के नाम पर उसे कम उम्र में शादी के लिए मजबूर कर देता है.”

पराग्वे में यूएनएफ़पीए के सहयोग से एक सहकर्मी समूह ‘EIS De Par a Par’ हेल्पलाइन चलाता है, जो कॉल करने वाले किशोरों को निष्पक्ष जानकारी प्रदान करता है.
© UNFPA/Mario Achucarro पराग्वे में यूएनएफ़पीए के सहयोग से एक सहकर्मी समूह ‘EIS De Par a Par’ हेल्पलाइन चलाता है, जो कॉल करने वाले किशोरों को निष्पक्ष जानकारी प्रदान करता है.

5. टैक्नॉलॉजी बाल विवाह को रोकने में भी अहम भूमिका निभा सकती है.

जब अभिभावक, शिक्षक, पुलिस और नीति-निर्माता, डिजिटल ख़तरों से चिन्तित होते हैं, तो वे अक्सर युवाओं की ऑनलाइन पहुँच सीमित कर देते हैं. लेकिन किशोरों के लिए इसके मायने, उन अवसरों और जुड़ावों से दूर होना है जो उनके लिए उपयोगी हैं. 

उज़्बेकिस्तान के ताशकंद की एक युवती ने कहा, “मेरे माता-पिता मुझे सुरक्षित रखने के लिए स्क्रीन टाइम कम करने और 'ट्रोल्स' को अनदेखा करने को कहते थे. काश, वे समझ पाते कि इंटरनेट कोई अलग या काल्पनिक दुनिया नहीं है. ‘अनप्लग’ होना विकल्प नहीं है, क्योंकि डिजिटल स्थान ही हैं जहाँ हम मिलते हैं, सीखते हैं और संगठित होते हैं.”

असल में डिजिटल दुनिया, एक शक्तिशाली समाधान भी देती है: ज्ञान

बांग्लादेश में प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य के लिए यूएन एजेंसी (UNFPA) के एक अध्ययन के अनुसार, 30 प्रतिशत से अधिक रोहिंग्या किशोरों ने सोशल मीडिया माध्यमों पर बाल विवाह से होने वाले नुक़सान के बारे में जानकारी हासिल की.

इंडोनेशिया में हुए अध्ययन बताते हैं कि इंटरनेट तब सुरक्षा देता है जब परिवार और स्कूल एक साथ जुड़ें. केवल पहुँच होना काफ़ी नही. सही मार्गदर्शन होने पर शादी की आयु में देरी होते देखी गई है.

कई किशोर कहते हैं कि उन्हें सबसे ज़्यादा सहारा एक-दूसरे से मिलता है. ताशकंद की युवती ने कहा. “हम एक-दूसरे को याद दिलाते हैं कि यह हमारी ग़लती नहीं है.” 

“स्कूलों में डिजिटल साक्षरता सिखाई जानी चाहिए, ताकि हम सुरक्षित और ज़िम्मेदार ऑनलाइन नागरिक बन सकें.”

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.