सूडान: सामूहिक हत्याएँ और जातीय सफ़ाया, जनसंहार के स्पष्ट चिन्ह
संयुक्त राष्ट्र के एक तथ्य-खोजी मिशन ने कहा है कि सूडान के दारफू़र क्षेत्र में, त्वरित समर्थन बल (RSF) द्वारा किए गए हमले, जनसंहार जैसे अपराधों के संकेत देते हैं और आगे भी बड़े अत्याचारों का गम्भीर ख़तरे की आशंका प्रस्तुत करते हैं.
मिशन के अनुसार, RSF ने, अल फ़शर शहर पर अक्टूबर (2025) में क़ब्ज़ा किए जाने के दौरान, जातीय आधार पर हत्याएँ कीं, व्यापक यौन हिंसा को अंजाम दिया और लोगों को जबरन ग़ायब किया.
ग़ौरतलब है कि सूडान की सशस्त्र सेना और RSF के बीच अप्रैल 2023 में, देश पर नियंत्रण के मुद्दे पर मतभेदों के बीच हिंसक टकराव भड़क उठा था.
RSF ने, उत्तर दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल फ़शर पर डेढ़ वर्ष की घेराबन्दी के बाद, 26 अक्टूबर 2025 को क़ब्ज़ा कर लिया था, जहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन और अत्याचार किए जाने के आरोप सामने आए.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये घटनाएँ ज़घावा और फ़ुर समुदायों के विरूद्ध किए गए ऐसे कृत्यों की ओर इशारा करती हैं, जिनमें जनसंहार के स्पष्ट चिन्ह नज़र आते हैं.
यूएन तथ्य‑खोजी मिशन ने चेतावनी दी है कि सूडान में स्थिति बेहद गम्भीर बनी हुई है और आम नागरिकों के ख़िलाफ़ आगे और भी बड़े पैमाने पर अत्याचार होने का ख़तरा है.
योजनाबद्ध और संगठित अभियान
सूडान के लिए स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय तथ्य-खोजी मिशन ने गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा कि उपलब्ध सबूत स्पष्ट करते हैं कि जनसंहार सम्बन्धी कम से कम तीन कृत्य किए गए हैं: सुरक्षित जातीय समूह के सदस्यों की हत्या, गम्भीर शारीरिक और मानसिक चोट पहुँचाना और जानबूझकर ऐसी जीवन परिस्थितियाँ उत्पन्न करना, जो उस समूह के पूरे या आंशिक रूप से, शारीरिक विनाश की कारण बनें.
मिशन के अध्यक्ष मोहमद चांदे ओथमान ने कहा, “अल फ़शर और उसके आसपास किए गए कृत्य, आकस्मिक या इक्का-दुक्का घटनाओं के परिणाम नहीं हैं. RSF के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा इस अभियान का पैमाना, समन्वय और सार्वजनिक समर्थन यह दर्शाता है कि यह योजनाबद्ध और संगठित अभियान था.”
उन्होंने कहा, “यह अभियान जनसंहार की पहचान करने वाले सभी लक्षणों को धारण करता है और इसके तहत किए गए अपराधों को भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है.”
घेराबन्दी के 500 दिन…
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये निष्कर्ष उत्तर दारफूर की राजधानी अल फ़शर और इसके आसपास के इलाक़ों, अक्टूबर 2025 के अन्त में, RSF के क़ब्ज़े के दौरान घटित हुई घटनाओं पर केन्द्रित हैं.
मिशन के अनुसार, इससे पहले 18 महीने तक चली घेराबन्दी ने, नागरिकों को धीरे-धीरे भोजन, पानी, दवाइयों और मानवीय सहायता से अलग कर दिया था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह घेराबन्दी “भूख, मानसिक आघात और बन्दी बनाए रखने के माध्यम से लक्षित जनसंख्या को, व्यवस्थित रूप से कमज़ोर करने” का कार्य कर रही थी, जिससे हमला होने पर अनेक लोग भागने में असमर्थ रहे.
तथ्य-खोजी मिशन ने कहा कि अल फ़शर में हुई घटनाएँ “सूडान के अन्य गै़र-अरब समुदायों पर पहले से जारी हमलों की प्रवृत्ति का तीव्र रूप” थीं, “लेकिन उससे कहीं अधिक घातक स्तर पर…”
जनसंहार की मंशा
तथ्य-खोजी मिशन ने कहा कि RSF द्वारा “जातीय आधार पर लक्षित हत्याओं, यौन हिंसा, विनाश और ग़ैर-अरब समुदायों का सफ़ाया करने की स्पष्ट मांग करने वाले सार्वजनिक बयानों की व्यवस्थित प्रवृत्ति” जैसे क़दमों से, जनसंहार की नीयत स्पष्ट रूप से ज़ाहिर होती है.
इन बर्बरताओं से बचने वाले लोगों ने बताया कि RSF के लड़ाके कहते थे: “क्या आपके बीच कोई ज़घावा है? अगर हमें कोई ज़घावा मिला तो हम उन सबको मार देंगे,” और “हम दारफ़ूर से किसी भी काले व्यक्ति को ख़त्म करना चाहते हैं.”
मिशन की सदस्य मोना रिशमावी ने कहा कि भूख, सहायता पर पाबन्दी, सामूहिक हत्याएँ, बलात्कार, यातना और जबरन ग़ायब करने जैसी सभी घटनाओं से केवल यही एक निष्कर्ष निकलता है कि ये जनसंहार के स्पष्ट लक्षण हैं.
उन्होंने कहा, “हमने जो सबूत एकत्र किए हैं जैसे - लम्बे समय तक घेराबन्दी, भूख, मानवीय सहायता सामग्री की रोकी गई आपूर्ति, सामूहिक हत्याएँ, बलात्कार, यातना और जबरन ग़ायब करना, व्यवस्थित अपमान…ये केवल एक ही तर्कसंगत निष्कर्ष निकालती हैं.”
उन्होंने स्पष्ट किया, “RSF ने अल फ़शर में ज़घावा और फ़ुर समुदायों को पूरे या आंशिक रूप से नष्ट करने का इरादा रखते हुए यह कार्रवाई की. ये जनसंहार के लक्षण हैं.”
ज़घावा और फ़ुर, सूडान के पश्चिमी दारफूर क्षेत्र के सबसे बड़े गै़र-अरब जातीय समुदायों में शामिल हैं.
दोनों समूहों को ऐतिहासिक रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ा है, और इन्हें 2000 के दशक की शुरुआत से दारफू़र में हुई हिंसात्मक घटनाओं के दौरान भी निशाना बनाया गया था.
अल फ़शर और उसके आसपास के अनेक परिवार पहले से ही कई बार विस्थापित हो चुके थे.
कोई ठोस कार्रवाई नहीं
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अभियान का एक केन्द्रीय तत्व पहचान-आधारित लक्षित हमले थे, जो जातीयता, लिंग और कथित राजनैतिक सम्बद्धता से जुड़े थे.
इसमें विशेष रूप से ज़घावा और फ़ुर महिलाओं व लड़कियों को यौन हिंसा के दौरान लक्षित किया गया, जबकि जिन्हें अरब माना गया, उन्हें अक्सर छोड़ दिया गया.
मिशन ने यह भी बताया कि क़ब्ज़े से पहले, गम्भीर हालात के बारे में अनेक बार चेतावनियाँ दी गई थीं और “अत्याचार किए जाने के जोखिम के स्पष्ट रूप से पहचाने गए संकेत” मौजूद थे.
इनमें 2024 के मध्य से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जारी अपीलें शामिल थीं, जिनमें घेराबन्दी को समाप्त करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई थी.
रिपोर्ट में कहा गया, “इन चेतावनियों के बावजूद, किसी भी पक्ष द्वारा नागरिक आबादी की सुरक्षा के लिए प्रभावी क़दम नहीं उठाए गए.”
मिशन ने, कोर्दोफ़ान में और अन्य क्षेत्रों में फैलते युद्ध के बीच, चेतावनी दी है कि नागरिक सुरक्षा की आवश्यकता अब पहले से कहीं अधिक है.
मिशन की सदस्य जॉय न्गोज़ी एज़ीलो ने कहा कि अल फ़शर में हुई घटनाएँ, जनसंहार जैसी हिंसा की प्रवृत्ति की एक उदाहरण हैं.
मिशन ने आकलन किया है कि प्रभावी रोकथाम और जवाबदेही के अभाव में, “आगे भी जनसंहार जैसी घटनाओं का जोखिम गम्भीर और जारी है.”
मिशन के अध्यक्ष ओथमान ने कहा, “सभी स्तरों पर ज़िम्मेदार व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराया जाना होगा. जहाँ सबूत जनसंहार की ओर संकेत करते हैं, वहाँ अन्तरराष्ट्रीय समुदाय पर, रोकथाम, सुरक्षा सुनिश्चित करने और न्याय दिलाने की विशेष ज़िम्मेदारी है.”
ग़ौरतलब है कि तथ्य-खोजी मिशन को यूएन मानवाधिकार परिषद ने, अक्टूबर 2023 में स्थापित किया था और इसे युद्ध में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों व अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के उल्लंघनों की जाँच का अधिकार दिया गया था.
मिशन का उद्देश्य, यथासम्भव, ज़िम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करना भी है.
यह रिपोर्ट 26 फरवरी 2026 को मानवाधिकार परिषद के सामने प्रस्तुत की जाएगी.