'विऔपनिवेशीकरण अब भी अधूरा', शेष 17 क्षेत्रों को स्वाधीनता की ओर ले जाने का आग्रह
वर्ष 1945 के बाद से अब तक, 80 से अधिक पूर्व उपनिवेशों के 75 करोड़ से अधिक लोगों ने स्वाधीनता हासिल की है. मगर, संयुक्त राष्ट्र की सूची में, 17 क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ, 20 लाख से अधिक लोग अब भी स्व-शासन से वंचित हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने औपनिवेशिक शासन पर विराम लगाने के लिए, नए सिरे से संकल्प लिए जाने का आग्रह किया है.
इनमें अफ़्रीका में पश्चिमी सहारा से लेकर कैरीबियाई और प्रशान्त क्षेत्र में लघु द्वीपीय क्षेत्र हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने विऔपनिवेशीकरण (Decolonization) के लिए अपनी औपचारिक मुहिम, 60 वर्ष से अधिक समय पहले शुरू की थी.
सोमवार को विऔपनिवेशीकरण पर विशेष समिति का 2026 सत्र शुरू हुआ है, जिसे यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश की ओर से उनके शैफ़ द कैबिने कोर्टनी रैट्रे ने सम्बोधित किया.
स्व-शासन की ओर
यूएन प्रमुख ने अपने वक्तव्य में ध्यान दिलाया है कि संयुक्त राष्ट्र के आरम्भिक दिनों से ही, विऔपनिवेशीकरण, संगठन के बुनियादी उद्देश्यों में रहा है.
“यह संगठन एक ऐसे स्थान के रूप में स्थापित किया गया था, जहाँ देश समानता के आधार पर मिल सकें, न कि शासक और प्रजा के तौर पर.”
उन्होंने सचेत किया कि औपनिवेशवाद की विरासत अब भी मौजूदा दौर की वास्तविकताओं को आकार दे रही है.
“औपनिवेशवाद की विरासत ने आर्थिक शोषण के गहराई तक समाए तंत्रों के ज़रिए गहरे घाव छोड़े हैं, और नस्लवाद, असमानता व निर्णय-निर्धारण करने वाले निकायों से निरन्तर बाहर रखे जाने के रूप में भी.”
यूएन महासभा ने विशेष समिति को 1961 में गठित किया था, ताकि उन क्षेत्रों में स्वाधीनता की दिशा में प्रगति पर नज़र रखे जा सके, जहाँ स्व-शासन तब तक नहीं था.
स्वाधीनता की प्रतीक्षा कर रहे अनेक क्षेत्र, लघु द्वीप हैं, जहाँ जलवायु जोखिम भी बढ़ते जा रहे हैं. बढ़ता समुद्री जलस्तर, तटीय क्षरण और चरम मौसम की घटनाओं से घरों व बुनियादी ढाँचे को नुक़सान पहुँच रहा है, पर्यटन व मत्स्य उद्योग प्रभावित हो रहा है और सीमित सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है.
उन्होंने इन हालात के मद्देनज़र विशेष समिति से आग्रह किया कि चर्चाओं के केन्द्र में स्थानीय समुदायों की सहनसक्षमता को मज़बूती देने व अनुकूलन प्रयासों को रखना होगा.
समावेशी सम्वाद
यूएन प्रमुख ने शेष क्षेत्रों में औपनिवेशीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तीन प्राथमिकताओं पर बल दिया है.
पहली प्राथमिकता, स्व-शासन से वंचित क्षेत्रों में सदस्य देशों, हितधारकों व प्रशासनिक शक्तियों में समावेशी सम्वाद को प्रोत्साहन देना होगा. और हर क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप चर्चा करनी होगी.
दूसरी प्राथमिकता, इस प्रक्रिया में युवजन को साथ लेकर चलना होगा, चूँकि अगली पीढ़ी की दूरदृष्टि और नेतृत्व, एक समावेशी व समृद्ध भविष्य के लिए अहम है.
तीसरी प्राथमिकता, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तुरन्त उपायों की आवश्यकता है, विशेष रूप से उन द्वीपीय क्षेत्रों में, जिनके अस्तित्व पर जोखिम मंडरा रहा है.