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सूडान संकट: अल फ़शर में युद्ध अपराधों को अंजाम दिए जाने की आशंका

रंगीन पारंपरिक परिधान पहनने वाली महिलाओं और लड़कियों का एक समूह एक साधारण संरचना के अंदर बैठा हुआ है, जो सूडान में लौटने वालों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाता है।
© IOM/Philippa Lowe सूडान में कोर्दोफ़ान, दारफ़ूर समेत अन्य युद्धग्रस्त इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग फँसे हुए हैं.

सूडान संकट: अल फ़शर में युद्ध अपराधों को अंजाम दिए जाने की आशंका

मानवाधिकार

सूडान में पिछले साल अक्टूबर में, अल फ़शर की 1.5 साल तक घेराबन्दी के बाद, अर्द्धसैनिक बल (RSF) ने शहर पर नियंत्रण के लिए अपने अन्तिम हमले के दौरान ऐसी भयावह हिंसा की लहर को अंजाम दिया, जोकि बहुत बर्बर और स्तब्धकारी है. यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने शुक्रवार को जारी अपनी एक नई रिपोर्ट में कहा है कि व्यापक पैमाने पर ढहाए गए इन अत्याचारों को युद्ध अपराध व मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है.

सूडान की सशस्त्र सेना और RSF के बीच अप्रैल 2023 में, देश पर नियंत्रण के मुद्दे पर मतभेदों के बीच हिंसक टकराव भड़क उठा था. पिछले वर्ष 26 अक्टूबर को, RSF ने उत्तर दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल फ़शर पर, 1.5 साल की घेराबन्दी के बाद, अपना क़ब्ज़ा किया, जहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन और अत्याचारों को अंजाम दिए जाने के आरोप सामने आए.

शुक्रवार को जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, RSF बलों और उसके सहयोगी अरब लड़ाकों ने बड़े पैमाने पर हमले किए, सामूहिक हत्याओं, बिना सुनवाई के लोगों को जान से मारने, यौन हिंसा, फ़िरौती के लिए अपहरण, यातना, बुरे बर्ताव, हिरासत, गुमशुगदी, लूटपाट और लड़ाई में बच्चों का इस्तेमाल करने समेत अन्य घटनाओं को अंजाम दिया.

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स्थानीय लोगों को उनकी जातीयता या इस आधार पर भी लक्षित ढंग से निशाना बनाया गया कि वे किसके समर्थन में हैं.

यूएन कार्यालय की रिपोर्ट में सामूहिक हत्याओं की अनेक घटनाओं पर जानकारी एकत्र की गई है, उन इलाक़ों की भी जहाँ जान बचाने के लिए जुटे आम लोगों को निशाना बनाया गया. 

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि अल फ़शर युनिवर्सिटी के एक हॉस्टल में 26 अक्टूबर को RSF लड़ाकों ने भारी हथियारों से 1 हज़ार लोगों की भीड़ पर गोलियाँ चलाईं, जिनमें क़रीब 500 लोगों की जान गई. 

एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, शरीर हवा में फेंके जा रहे थे और यह किसी डरावनी फ़िल्म जैसा था. 

यह रिपोर्ट, वर्ष 2025 के अन्तिम दिनों में पूर्वी चाड और उत्तर दारफ़ूर में 140 भुक्तभोगियों और प्रत्यक्षदर्शियों के साथ बातचीत के आधार पर तैयार की गई है.

भयावह हिंसा

यूएन मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार, RSF द्वारा अन्तिम धावा बोले जाने के बाद के पहले तीन दिनों में, अल फ़शर में और वहाँ से भागने के रास्तों पर 6 हज़ार से अधिक लोगों को मार दिए जाने की जानकारी जुटाई गई है.

एक सप्ताह तक जारी रही हिंसा के दौरान, मृतकों का आँकड़ा इससे कहीं अधिक होने की आशंका है.

उन्होंने कहा कि यह मानने के तार्किक आधार हैं कि RSF और सहयोगी अरब लड़ाकों ने ऐसे मामलों को अंजाम दिया, जिन्हें युद्ध अपराध व मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है:

  • इरादतन आम लोगों और नागरिक प्रतिष्ठानों पर ताबड़तोड़ हमले करना
  • आम नागरिकों की भुखमरी को युद्ध के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल में लाना
  • मेडिकल और मानवीय सहायताकर्मियों के विरुद्ध हमले करना
  • बलात्कार समेत यौन हिंसा, यातना व अन्य क्रूर बर्ताव को अंजाम देना
  • लड़ाई में धकेलेने के लिए बाल सैनिकों की भर्ती करना 

यूएन कार्यालय के अनुसार, जिस तरह से अल फ़शर में मानवाधिकार उल्लंघन मामलों और दुर्व्यवहार की घटनाएँ हुईं, वह अप्रैल 2025 की याद दिलाता है जब RSF लड़ाकों ने ज़मज़म विस्थापन शिविर और 2023 में ऐल जिनीना व अरदामाता में ऐसी ही घटनाओं को अंजाम दिया था. 

OHCHR ने कहा कि इन मामलों को एक साथ यदि जोड़ा जाए तो ये दर्शाता है कि दारफ़ूर क्षेत्र में नागरिक आबादी के विरुद्ध व्यवस्थागत, संगठित ढंग से निरन्तर हमले किए जा रहे हैं. 

ग़ैर-अरब समुदायों पर निशाना

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने क्षोभ जताया कि अन्तिम हमले के दौरान जिस तरह से अभूतपूर्व स्तर पर क्रूरता को अंजाम दिया गया, उससे अल फ़शर में फँसे लोगों के लिए भयावह स्थिति और जटिल हो गई, जो पहले से ही लम्बे समय से घेराबन्दी का शिकार थे और निरन्तर लड़ाई व बमबारी झेल रहे थे. 

RSF लड़ाकों ने अल फ़शर में उन आम नागरिकों को भी निशाना बनाया, जिन पर सूडान के सशस्त्र बलों के साथ सहयोग करने का सन्देह था. इसके लिए अक्सर उन लोगों की ग़ैर-अरब जातीयता का आधार बनाया गया, जैसेकि ज़ग़ावा समुदाय. किशोर लड़कों और 50 वर्ष से कम आयु के पुरुषों के अलावा ग़ैर-अरब समुदाय की महिलाओं व लड़कियों पर ख़ासतौर से जोखिम है.

उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने कहा कि RSF और सहयोगी अरब लड़ाकों ने जिस तरह से हिंसा का चक्र चलाया, वह दर्शाता है कि दंडहीनता की भावना से इसे बढ़ावा मिल रहा है.

इसके मद्देनज़र, उन्होंने कमांडर व वरिष्ठ अधिकारियों समेत दोषियों की आपराधिक जवाबदेही तय किए जाने के लिए विश्वसनीय व निष्पक्ष जाँच का आग्रह किया है.

समाधान पर बल

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने सभी युद्धरत पक्षों से कारगर क़दम उठाने का आग्रह किया है ताकि उनके आदेश का पालन कर रहे लड़ाकों द्वारा ऐसे मानवाधिकार उल्लंघन मामलों पर विराम लगाया जा सके. 

साथ ही, प्रभुत्वशाली देशों से अपील की गई है कि अल फ़शर जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उन्हें अपने प्रयासों में तेज़ी लानी होगी. हथियारों की आपूर्ति पर प्रतिबन्ध का सम्मान करना, और सैन्य साज़ोसामान की बिक्री, हस्तांतरण और ख़रीद फ़रोख़्त को बन्द करना होगा.

उच्चायुक्त टर्क ने स्थानीय, क्षेत्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थता प्रयासों पर भी बल दिया है ताकि हिंसक टकराव पर विराम लगाया जाए और समावेशी शासन व्यवस्था के लिए मार्ग तैयार हो. उन्होंने कहा कि इस संकट का हल निकालने के लिए यह ज़रूरी है कि समाधान प्रयासों के केन्द्र में मानवाधिकारों को रखा जाए.