दलहन: पोषण, पर्यावरण व खाद्य सुरक्षा की मज़बूत कड़ी
भोजन की थाली में चना, अरहर, मसूर, राजमा और अन्य दालों की उपस्थिति, स्वाद के साथ-साथ पोषण की भी निशानी है. हर व्यक्ति के लिए अपने आहार में प्रोटीन को शामिल करना आवश्यक है, और दलहन फ़सलें इसका एक अहम साधन हैं. ये हर व्यक्ति की पहुँच में हैं, निर्धन परिवारों की जेब पर बोझ नहीं हैं, और पर्यावरण की दृष्टि से भी लाभकारी हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने, सेहतमन्द आहार में दलहन के महत्व को वैश्विक स्तर पर रेखांकित करने के लिए, वर्ष 2019 में एक प्रस्ताव पारित करके हर साल 10 फ़रवरी को ‘विश्व दलहन दिवस’ के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया था.
यह दिवस, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों व स्वस्थ आहार के हिस्से के रूप में, दलहनों के उत्पादन और उपभोग को बढ़ावा देता है.
इससे पहले, खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने वर्ष 2016 को 'अन्तरराष्ट्रीय दलहन वर्ष' के रूप में मनाया था जिससे 'विश्व दाल दिवस' के लिए प्रोत्साहन मिला.
क्या हैं दलहन?
दलहन (Pulses) ऐसे खाद्य बीज (दालें) होते हैं, जिन्हें फलीदार पौधों से प्राप्त किया जाता है और जिनका प्रयोग भोजन और पशु-चारे, दोनों के लिए किया जाता है.
सेम, चना और मटर सबसे ज़्यादा पहचाने जाने वाले दलहन हैं, लेकिन दुनिया भर में दलहनों की कई अन्य किस्में भी उगाई जाती हैं. उदाहरणस्वरूप, मूंग, उड़द, अरहर, लोबिया, मसूर.
ये सभी फ़सलें खाद्य सुरक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन से निपटने और जैवविविधता को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाती हैं.
दलहन के फ़ायदे
विशेषज्ञों के अनुसार, दलहन पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और इनमें शरीर के लिए आवश्यक अनेक विटामिन और खनिज पाए जाते हैं.
FAO के पौध उत्पादन और संरक्षण प्रभाग के उप-निदेशक चिकेलु म्बा के अनुसार, “दालों में, अन्य फ़सलों की तुलना में कहीं अधिक प्रोटीन, खनिज फ़ाइबर होते हैं."
इनकी भंडारण अवधि लम्बी होती है, जिससे भोजन की बर्बादी कम होती है और लोगों के आहार में विविधता आती है.
उन्होंने कहा कि "दुनिया के अनेक हिस्सों में, जहाँ आर्थिक, सामाजिक या धार्मिक कारणों से पशु प्रोटीन तक पहुँच सीमित है, वहाँ दालें ही इन ज़रूरी पोषक तत्वों का मुख्य स्रोत हैं.”
भारत, सबसे बड़ा उत्पादक
यूएन खाद्य एजेंसी के अनुसार, साल 2024 में वैश्विक स्तर पर दालों की औसत वार्षिक खपत 7 किलोग्राम प्रति व्यक्ति रही.
अफ़्रीका में खपत का आँकड़ा सबसे अधिक, 11 किलोग्राम प्रति व्यक्ति था, जबकि योरोप में यह 3.53 किलोग्राम प्रति व्यक्ति दर्ज किया गया, जोकि सबसे कम है.
वर्ष 2024 में, भारत 2.53 करोड़ टन उत्पादन के साथ, दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक देश रहा.
पर्यावरण की सखी
दालें, पर्यावरण की दृष्टि से भी लाभकारी हैं. इन्हें कम संसाधनों की आवश्यकता होती है, ये कठोर परिस्थितियों में भी उग सकती हैं और जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियों के निर्माण में मदद करती हैं.
उप-निदेशक चिकेलु म्बा कहते हैं कि, “दालें ऐसी फसलें हैं जो मिट्टी को समृद्ध करती हैं. ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को लेकर उसे ऐसे पोषक तत्वों में बदल देती हैं, जो अन्य पौधों और फ़सलों को भी लाभ पहुँचाते हैं.”
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, खेती की बहु-फ़सली प्रणालियों में दलहनों को शामिल करने से कृषि जैवविविधता बढ़ती है, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता मज़बूत होती है और पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ मिलता है.
साथ ही, फ़सल चक्र में दलहनों को शामिल करने से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की दक्षता भी बढ़ती है.
सतत विकास लक्ष्य की ओर
यह माना गया कि दलहन, सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा के लक्ष्यों को हासिल करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं.
इस दिवस को मनाने का उद्देश्य लोगों में दलहनों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और यह बताना है कि कैसे ये फ़सलें अधिक प्रभावी, समावेशी, सहनशील और टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणालियों के निर्माण में मदद करती हैं.
यह बेहतर उत्पादन, बेहतर पोषण, बेहतर पर्यावरण और बेहतर जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर है, ताकि कोई भी पीछे न छूटे.
इसके साथ ही, दलहन खेती ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं के लिए रोज़गार और उद्यम के नए अवसर उत्पन्न करती है. इन मायनों में, दलहन केवल भोजन का स्रोत नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ समाज, सुरक्षित खाद्य भविष्य और टिकाऊ पर्यावरण की दिशा में एक मज़बूत आधार भी हैं.