लेबनान: 'ब्लू लाइन' के पास रासायनिक सामग्री के छिड़काव की ख़बरों पर चिन्ता
संयुक्त राष्ट्र ने लेबनान और इसराइल को अलग करने वाली 'ब्लू लाइन' के आसपास के क्षेत्रों में इसराइली सैन्य बलों द्वारा अत्यधिक विषैले रासायनिक पदार्थों (herbicides) के छिड़काव की ख़बरों पर अपनी चिन्ताओं को दोहराया है. लेबनान में यूएन मिशन (UNIFIL) ने 1 फ़रवरी को इसराइल द्वारा यह रासायनिक सामग्री गिराए जाने की जानकारी दी थी.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि यह घटनाक्रम, वहाँ रह रहे आम नागरिकों के लिए एक गम्भीर मानवीय जोखिम उत्पन्न करता है.
जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र सूचना सेवा की निदेशक आलेस्सांद्रा वेलुच्ची ने कहा कि herbicides का इस्तेमाल स्थानीय कृषि भूमि पर इसके प्रभावों को लेकर गम्भीर सवाल खड़े करता है, और समय बीतने के साथ, इससे लोगों की अपने घरों तथा आजीविका में वापसी भी प्रभावित हो सकती है.
आलेस्सांद्रा वेलुच्ची ने न्यूयॉर्क में गुरूवार को संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता की टिप्पणी को दोहराते हुए, अन्तरराष्ट्रीय मानवतावादी क़ानून के तहत सभी पक्षों की ज़िम्मेदारियों पर बल दिया.
उन्होंने कहा कि 'ब्लू लाइन' के उत्तरी हिस्से में, इसराइली रक्षा बलों (IDF) की किसी भी तरह की गतिविधि, सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 का उल्लंघन है.
लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अन्तरिम बल (UNIFIL) के ध्वज तले, यूएन शान्तिरक्षक 120 किलोमीटर लम्बी ‘ब्लू लाइन’ पर तैनात हैं, जोकि दक्षिणी लेबनान और इसराइल को अलग करने वाली एक रेखा है.
यह कोई सीमा नहीं है, बल्कि इसराइली सैन्य बलों की वापसी को निर्धारित करने वाली रेखा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2000 में स्थापित किया था.
OHCHR के प्रवक्ता थमीन अल-ख़ीतान ने कहा कि इन ख़बरों की गहन जाँच आवश्यक है, ताकि यह पुष्टि की जा सके कि किन रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया था.
उन्होंने चेतावनी दी कि खेती की ज़मीन और जल स्रोतों पर हमले, गम्भीर मानवीय जोखिम उत्पन्न करते हैं.
लेबनान के अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस herbicides का इस्तेमाल किया गया, वह ग्लाइफ़ोसेट (glyphosate) है.
जिन इलाक़ों में घनी वनस्पति पर यह छिड़काव किया गया था, वहाँ से लिए गए नमूनों में इसकी मात्रा, सामान्य स्तर से 20 से 30 गुना अधिक पाई गई है.
क़ाबिज़ पश्चिमी तट में विस्थापन
यूएन मानवाधिकार अधिकारी ने क़ाबिज़ पश्चिमी तट में, हालिया घटनाक्रमों पर भी गहरी चिन्ता व्यक्त की है.
उन्होंने चेतावनी दी है कि इसराइल की नई सैन्य कार्रवाइयाँ और बस्तियों का विस्तार एक व्यवहारिक फ़लस्तीनी देश की सम्भावना को कमज़ोर कर सकते हैं.
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष से अब तक क़ब्ज़े वाले पश्चिमी तट में हज़ारों फ़लस्तीनी नागरिकों को जबरन विस्थापित किया जा चुका है.
इनमें तीन शरणार्थी शिविर भी शामिल हैं, जो इसराइल के सैन्य अभियान ‘आयरन वॉल’ से प्रभावित हुए हैं. इस अभियान के तहत जेनिन, तुलकरेम और नूर शम्स के शिविरों से 32 हज़ार से अधिक लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है.
प्रवक्ता थमीन अल-ख़ीतान ने कहा कि विस्थापित लोग अब भी अपने घरों में वापस नहीं लौट पाए हैं और अनेक लोगों के घर इसराइली बलों द्वारा नष्ट कर दिए गए हैं.
OHCHR प्रवक्ता ने बताया कि शुआफ़त शरणार्थी शिविर में दर्जनों घरों और दुकानों पर छापे मारे गए, कम से कम 25 फ़लस्तीनियों को हिरासत में लिया गया, सामान ज़ब्त किया गया और 10 निजी वाहनों को ज़ब्त कर लिया गया.
जबकि, एक अन्य बड़े अभियान में इसराइली सुरक्षा बलों ने, कफ़्र अक़ब और क़लन्दिया शरणार्थी शिविर की सीमाओं से लगे इलाक़ों को निशाना बनाते हुए कथित तौर पर 70 फ़लस्तीनी ढाँचों को ध्वस्त कर दिया.
“अभूतपूर्व गति" से बस्ती विस्तार
मानवाधिकार कार्यालय का कहना है कि यह कार्रवाई क्षेत्र में बस्तियाँ बसाने की बड़ी परियोजनाओं की तैयारी के रूप में की गई प्रतीत होती है.
OHCHR ने यह भी कहा कि फ़लस्तीनियों के विरुद्ध इसराइली बस्तियों के निवासियों द्वारा की जा रही “लगातार हिंसा” जारी है, जिसमें इसराइली सुरक्षा बलों का समर्थन और भागेदारी भी देखी जा रही है.
कार्यालय के अनुसार, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करते हुए इसराइली बसाहटों का विस्तार अब तक की तुलना में “अभूतपूर्व गति” से हो रहा है.
OHCHR के मुताबिक़, दिसम्बर 2025 में इराइली अधिकारियों ने पूर्वी येरूशलम, रामल्ला और बेथलेहम के बीच स्थित इलाके़ में तीन हज़ार से अधिक बस्ती इकाइयों के निर्माण के लिए टेंडर आमंत्रित किए थे. ये तीनों फ़लस्तीनी शहरी क्षेत्रों के तीन सबसे महत्वपूर्ण केन्द्रों में शामिल हैं.
इसराइल की तथाकथित ‘E1 योजना’ को लेकर प्रवक्ता थमीन अल-ख़ीतान ने चेतावनी दी कि यह योजना पश्चिमी तट के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों को पूर्वी येरूशलम से अलग कर सकती है.
उन्होंने कहा कि इससे फ़लस्तीनी समुदाय आपस में बँट जाएँगे और एक व्यवहारिक फ़लस्तीनी देश की सम्भावना गम्भीर रूप से प्रभावित होगी.