फ़तवा, आस्था, भ्रांतिया: अफ़्रीका में महिला ख़तना से जुड़े मिथकों को चुनौती
19 वर्ष की ओलिविया एल्बर्ट को 14 साल की उम्र में महिला जननांग विकृति (Female Genital Mutilation) का सामना करना पड़ा. उन्होंने यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के लिए यूएन एजेंसी (UNFPA) को बताया कि उस समय उन्होंने अपना दर्द इसलिए छुपा लिया था, क्योंकि उनके आसपास के सभी लोगोंने कहा कि यह एक सामान्य बात है.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “मन ही मन मैं जानती थी कि जो कुछ मुझे झेलना पड़ा, वह ऐसा अनुभव था जिससे किसी भी लड़की को कभी नहीं गुज़रना चाहिए..”
संयुक्त गणराज्य तंज़ानिया के मारा क्षेत्र में, कभी महिला ख़तना या महिला जननांग विकृति (FGM) को लड़कियों के लिए एक अपरिहार्य रस्म माना जाता था, लेकिन अब समुदाय इसमें बदलाव की दिशा में क़दम बढ़ा रहे हैं.
मिथक की सच्चाई
दुनिया भर में 23 करोड़ लड़कियाँ व महिलाएँ महिला जननांग विकृति (FGM) की भुक्तभोगी रही हैं, तथा इसके गहरे, लम्बे समय तक रहने वाले, और कई बार जानलेवा शारीरिक व मानसिक असर झेल रही हैं. हालाँकि इस अमानवीय प्रथा को ख़त्म करने के प्रयास लगातार जारी हैं.
2026 में भी, लगभग 45 लाख लड़कियाँ इस प्रथा का शिकार होने के जोखिम में हैं.
इस प्रथा के अब तक बने रहने की एक बड़ी वजह यह ग़लत धारणा है कि इसे छोड़ने की मुहिम किसी विदेशी दबाव का नतीजा है.
महिला जननांग विकृति के प्रति शून्य सहिष्णुता के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर, हम इसी मिथक की सच्चाई उजागर कर रहे हैं. यह दिवस हर वर्ष 6 फ़रवरी को मनाया जाता है.
बदलाव की लहर
जब ओलिविया एल्बर्ट, संयुक्त राष्ट्र एजेंसी के सहयोग से आयोजित एक सामुदायिक सम्वाद में शामिल हुईं, तो उन्होंने अन्य प्रभावित महिलाओं को अपने अनुभव खुले तौर पर साझा करते हुए सुना.
उन्होंने कहा, “जब लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति से सुनती हैं, जिसने यह सब स्वयं झेला है, तो उसका अलग असर होता है.”
“उन्हें साहस मिलता है. प्रभावित महिलाओं का नेतृत्व मेरे समुदाय में बदलाव ला रहा है. हम अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन यह ज़रूर सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में लड़कियाँ बिना डर के बड़ी हों, और साथ मिलकर हम यह सम्भव बना सकते हैं.”
ग़लत धारणाओं को चुनौती
धार्मिक नेता भी महिला जननांग विकृति से जुड़ी ग़लत धारणाओं को स्पष्ट तौर पर खारिज कर रहे हैं. इनमें गिनी के किन्डिया प्रान्त के सम्मानित इमाम, उस्मान याबारा कामारा भी शामिल हैं.
उन्होंने कहा, “महिला जननांग विकृति का इस्लाम से कोई धार्मिक आधार नहीं है. इसके गम्भीर स्वास्थ्य प्रभावों के कारण अनगिनत लड़कियाँ पीड़ा सहती हैं. इसे रोकना ज़रूरी है.”
उनका मानना है कि इस विषय को पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस प्रथा से दूर रहकर सुरक्षित जीवन जी सकें.
आज, बढ़ती संख्या में स्कूलों में बच्चों को व्यापक यौन शिक्षा के ज़रिये इस मुद्दे के बारे में जानकारी दी जा रही है.
नए क़ानून
जिन देशों में महिला जननांग विकृति कई पीढ़ियों से चली आ रही है, वहाँ नए क़ानून अब धीरे-धीरे बदलाव ला रहे हैं.
जिबूती, ऐरीट्रिया और सोमालिया में, इस्लामी विद्वानों ने 2025 में एक राष्ट्रीय फ़तवा जारी किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि महिला जननांग विकृति को सही ठहराने का कोई धार्मिक आधार नहीं है.
जिबूती की सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा महमूद मुहम्मद ने कहा, “अब हमारे इलाक़ों में हमारे पास दो मज़बूत सुरक्षा कवच हैं: संविधान और फ़तवा.”
उन्होंने कहा, “क़ानून लोगों को यह साफ़ तौर पर बताता है कि इस प्रथा के क्या क़ानूनी दुष्परिणाम हो सकते हैं, जबकि फ़तवा उस धार्मिक बहाने को ख़त्म करता है जिसका इस्तेमाल पीढ़ियों तक इसे सही ठहराने के लिए किया जाता रहा."
"यह दोहरी जीत, हमें ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को परिवारों से खुलकर बात करने और यह कहने का भरोसा देती है कि ‘आपका धर्म और आपका देश, दोनों आपकी बेटी की रक्षा करते हैं.’
पुरुषों और लड़कों की भागेदारी
इथियोपिया में 15 से 49 वर्ष की उम्र की लगभग तीन-चौथाई महिलाएँ और लड़कियाँ किसी न किसी रूप में महिला जननांग विकृति से पीड़ित रही हैं.
स्थानीय ज़िला प्रमुख मितिकु गुंटे बताते हैं, “सालों तक हम बेबस रहे. हमने महिलाओं को प्रसव के दौरान गम्भीर समस्याओं से जूझते देखा, और कई बार माँ और बच्चे दोनों को खोते हुए भी देखा. हमें समझ आता था कि कुछ ग़लत है, लेकिन यह नहीं जानते थे कि इसे कैसे रोका जाए.”
अब मितिकु गुंटे, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के एक साझा कार्यक्रम के साथ एक समर्थक के तौर पर जुड़े हैं. यह कार्यक्रम स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर इस प्रथा के विरुद्ध सैकड़ों पुरुषों और लड़कों को सक्रिय रूप से जोड़ रहा है.
समुदाय में अलग-अलग समूहों के लिए सम्वाद आयोजित किए जाते हैं. बुज़ुर्ग, युवा, अविवाहित पुरुषों, महिलाओं व युवाओं से उनकी चिन्ताओं के अनुसार सीधे बातचीत की जाती है, और इसके लिए समुदाय के सदस्य घर-घर जाकर लोगों से मिलते हैं.
कोई चिकित्सकीय कारण नहीं
जब यह प्रक्रिया किसी स्वास्थ्यकर्मी द्वारा की जाती है, तो इसे अक्सर “चिकित्सकीय रूप से की गई” कहा जाता है. लेकिन प्रशिक्षित व्यक्ति और साफ़ उपकरण होने के बावजूद, महिला जननांग विकृति न तो सुरक्षित है, न ज़रूरी, और न ही इसका कोई चिकित्सकीय आधार है.
मिस्र में एक पारिवारिक चिकित्सक डॉक्टर मरम महमूद कहती हैं, “मेरे पास अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जहाँ नुक़सान पहले ही हो चुका होता है और गम्भीर जटिलताएँ सामने होती हैं.”
उन्होंने कहा, “मुझे अंदाज़ा नहीं था कि यह अनुभव मेरी सोच को इतना बदल देगा. अब मैं इस पर विचार करने वालों की मानसिकता को बेहतर समझ पाती हूँ और उन्हें इसके गम्भीर नुक़सान, जोखिम और परिणामों के बारे में साफ़ तौर पर समझाने में ख़ुद को अधिक सक्षम महसूस करती हूँ.”
महिला जननांग विकृति को समाप्त करने में UNFPA के प्रयासों पर अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.