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'हम यहाँ मर रहे हैं': ग़ाज़ा से बाहर जाने के लिए कैंसर पीड़ितों की गुहार

गाजा में एक बुजुर्ग कैंसर रोगी बिस्तर पर लेटा हुआ है, एक व्यक्ति से देखभाल प्राप्त कर रहा है जो धीरे से उसका हाथ पकड़ रहा है और उसके माथे को पोंछ रहा है।
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ग़ाज़ा पट्टी के अल-शिफ़ा अस्पताल में एक व्यक्ति, कैंसर से पीड़ित अपनी माँ की देखभाल कर रहा है.

'हम यहाँ मर रहे हैं': ग़ाज़ा से बाहर जाने के लिए कैंसर पीड़ितों की गुहार

स्वास्थ्य

ग़ाज़ा पट्टी में इस बीमारी से पीड़ित मरीज़ों ने बुधवार, 4 फ़रवरी, को 'विश्व कैंसर दिवस' पर अपनी व्यथा को बयाँ करते हुए कहा है कि उनकी स्थिति बिगड़ रही है, दर्द का इलाज नहीं हो पा रहा है और बेहतर इलाज के लिए बाहर जाने के रास्ते बन्द हैं.

ग़ाज़ा के दक्षिणी हिस्से में स्थित रफ़ाह में मिस्र से लगी सीमा पर एक चौकी को खोला गया है, जिसके ज़रिए सीमित संख्या में गम्भीर बीमारियों से पीड़ित मरीज़ो को उपचार के लिए बाहर भेजा गया है, लेकिन यह संख्या बेहद सीमित है. 

ग़ाज़ा के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती, कैंसर मरीज़ मुन्थर अबू फूल ने बिस्तर पर लेटे हुए बताया कि “हम मर रहे हैं. हर दिन, इस अस्पताल में दो से तीन मरीज़ों की मौत हो जाती है. मैं दर्द की वजह से अपने बिस्तर से खड़ा नहीं हो सकता हूँ. हमें एक समाधान चाहिए, चौकियों को खोलिए.”

उनके शब्द उस वास्तविकता को दर्शाते हैं, जिनसे ग़ाज़ा पट्टी में हज़ारों कैंसर मरीज़ जूझ रहे हैं, जहाँ विशेषीकृत देखभाल की सुलभता ध्वस्त हो चुकी है और अन्य देशों में जाने के विकल्प अनेक की पहुँच से बाहर हैं.

स्थानीय स्वास्थ्य संगठनों ने चेतावनी दी है कि ग़ाज़ा में क़रीब 11 हज़ार मरीज़ों को या तो स्पेशलिस्ट देखभाल उपलब्ध नहीं है या फिर वे निदान, उपचार से वंचित हैं. लगभग 4 हज़ार मरीज़ों को ग़ाज़ा से बाहर अस्पताल में भेजने के लिए रेफ़र किया है, लेकिन उन्हें यात्रा के लिए प्रतीक्षा करते हुए दो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है.

यूएन न्यूज़ ने ग़ाज़ा सिटी में अल-शिफ़ा अस्पताल में हालात का जायज़ा लिया और ऑनकॉलोजी विभाग में चुनौतीपूर्ण स्थिति पर जानकारी जुटाई. अस्पताल में मरीज़ों की भीड़ है, जो डॉक्टर से परामर्श व ऐसे उपचार की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जोकि अब और उपलब्ध नहीं है.

अति-आवश्यक दवाएँ व उपकरण बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हैं, जबकि अनेक मरीज़ लम्बे समय से दर्द को सहन कर रहे हैं और चलने-फिरने में सक्षम नहीं रह गए हैं.

हरे रंग की जैकेट पहने एक आदमी, रायद अबू वारदा, गाजा शहर के अल-शिफा अस्पताल में अपने कैंसर रोगी भाई हामिद अबू वारदा को सांत्वना दे रहा है।
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ग़ाज़ा के अल-शिफ़ा अस्पताल में एक व्यक्ति, अपने कैंसर रोगी भाई की सुश्रुषा कर रहा है.

हर दिन मरीज़ों की मौत

कैंसर मरीज़ मुन्थर अबू फूल को लम्बे समय पहले, मेडिकल कारणों से ग़ाज़ा के बाहर जाने के दस्तावेज़ दिए गए थे, लेकिन दो साल से अधिक समय बीत चुका है और वो अब भी वहीं हैं.

“ग़ाज़ा पट्टी में स्वास्थ्य स्थिति जीर्ण-शीर्ष हो चुकी है. न तो दवाएँ हैं और न ही उपचार, और हम मर रहे हैं. हर दिन, दो से तीन मरीज़ों की इस अस्पताल में मौत हो जाती है.”

उन्होंने मदद की गुहार लगाते हुए कहा कि सीमा चौकियों को उपयुक्त ढंग से खोला जाना होगा, ताकि ईश्वर हमें इस पीड़ा से मुक्ति दिला सके. हर किसी की जवाबदेही तय होगी.” 

एक अन्य वार्ड में, रइद अबू वर्दा अपने भाई हमीद की देखभाल कर रही हैं. कैंसर के लिए इलाज में लम्बी देरी के कारण, उनकी स्थिति बिगड़ गई है, और उनके जीवन के लिए ख़तरा बन रही है.

रइद ने बताया कि उनका भाई पिछले दो वर्षों से कैंसर की पीड़ा झेल रहा है. उन्होंने लम्बे समय तक चौकी के खुलने की प्रतीक्षा की ताकि बाहर इलाज कराया जा सके. दर्द बहुत बढ़ गया है. 

“मैं यहाँ खड़ी होकर अपने भाई को देखती है और बुरी तरह दर्द की चपेट में उनकी स्थिति का शोक मनाती हूँ.”

विशाल आवश्यकताएँ, सीमित विकल्प

ग़ाज़ा पट्टी में ऑनकॉलोजी विभाग में देखभाल की तलाश कर रहे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जबकि वहाँ दवाओं, उपकरणों, और विशेषीकृत स्वास्थ्य कर्मचारियों की क़िल्लत है.

जिन मरीज़ों को हाल ही में अपनी बीमारी का पता चला है, उनके लिए भविष्य अनिश्चित नज़र आ रहा है.

रफ़ाह चौकी के खुलने के बाद, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मरीज़ों और उनके तिमारदारों को ग़ाज़ा से बाहर ले जाने के लिए व्यवस्था की है, और इसके लिए सुरक्षित परिवहन मुहैया कराया गया है.

इसके बावजूद, मौजूदा आवश्यकताएँ फ़िलहाल सहायता के विकल्पों की तुलना में कहीं अधिक हैं. 

गाजा में कैंसर रोगी मुंधिर अबू फूल, अस्पताल के बिस्तर पर हाथ खोलकर बैठा हुआ है, ऐसा लगता है कि वह बोल रहा है या इशारा कर रहा है।
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ग़ाज़ा पट्टी के एक अस्पताल में भर्ती मुन्थर अबू फूल, कैंसर से पीड़ित हैं.

'हम बस जीना चाहते हैं'

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, 18 हज़ार से अधिक मरीज़ अपने उपचार के लिए ग़ाज़ा से बाहर भेजे जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिनमें 4 हज़ार बच्चे हैं.

पिछले सप्ताह, यूएन मानवतावादी कार्यालय ने स्थानीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हवाले से बताया था कि मेडिकल कारणों से बाहर जाने की प्रतीक्षा में 1,200 मरीज़ों की मौत हो चुकी है. 

गम्भीर रूप से बीमार, 4 हज़ार कैंसर मरीज़, प्रतीक्षा सूची में हैं और बन्द चौकियों व भीषण दबाव झेल रही स्वास्थ्य व्यवस्था में फँसे हुए हैं. 

मगर, मुन्थर अबू फूल जैसे मरीज़ों के लिए समय तेज़ी से बीता जा रहा है. “हम मर रहे हैं. हम बस यही चाहते हैं कि जीने को कोई एक रास्ता मिल जाए.”