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भारत के त्रिपुरा राज्य के दूरदराज़ इलाक़ों में स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए नदी पर नाव में सवार होकर निकले, डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य अधिकारी.

भारत: न सड़कें, न नक़्शा, लेकिन हर बच्चे तक पहुँचने की प्रतिबद्धता

© WHO India/Ranadeep Saha
भारत के त्रिपुरा राज्य के दूरदराज़ इलाक़ों में स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए नदी पर नाव में सवार होकर निकले, डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य अधिकारी.

भारत: न सड़कें, न नक़्शा, लेकिन हर बच्चे तक पहुँचने की प्रतिबद्धता

स्वास्थ्य

पूर्वोत्तर भारत में स्थित राज्य, त्रिपुरा के सबसे दूरदराज़ के इलाक़ों मेंजहाँ नदी ही आवागमन का एकमात्र रास्ता हैएक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य अभियान के ज़रिए अलग-थलग पड़े समुदायों तक देखभाल और उम्मीद पहुँचाई जा रही है.

सुबह के समय, भारत के पूर्वी हिस्से में खवाई नदी घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच से होकर शान्त बहती है. त्रिपुरा की अथारामुरा पर्वत श्रृँखला में बसे कालिचरण पाड़ा के परिवारों के लिए यह नदी सिर्फ़ जीवनरेखा नहीं, बल्कि आने-जाने का एकमात्र रास्ता है.

कालिचरण पाड़ा, खवाई ज़िले के मुनगियाकामी ब्लॉक में नूनाचेरा गाँव की एक छोटी बस्ती है, जहाँ न सड़कें पहुँचती हैं और न ही नियमित सार्वजनिक सेवाएँ. यहाँ तक पहुँचने के लिए घने जंगलों और कठिन भू-भाग से होकर नाव से लगभग पाँच घंटे की यात्रा करनी पड़ती है.

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कालिचरण पाड़ा लम्बे समय से सबसे कठिन चुनौतियों में से एक रहा है - मानो यह बस्ती नक़्शे से बाहर हो.

वंचितों तक पहुँच 

स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए, ज़िला प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य निगरानी नैटवर्क के साथ मिलकर इस गाँव को उच्च जोखिम वाला प्राथमिक क्षेत्र घोषित किया. 

इसके बाद किसी औपचारिक या सामान्य गतिविधि में समय नहीं गँवाया गया, बल्कि नदियों और जंगलों को पार करके आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ सीधे लोगों तक पहुँचाने का ठोस प्रयास किया गया.

अन्ततः, जब टीम गाँव पहुँची, तो वो अपने साथ केवल टीके और चिकित्सा सामग्री ही नहीं लाई. अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के साथ वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे, जिससे स्पष्ट सन्देश गया कि लम्बे समय से स्वास्थ्य सेवाओं से कटे समुदायों तक पहुँचना एक वास्तविक प्राथमिकता है.

त्रिपुरा की अथारामुरा पहाड़ियों के भीतर बसे कालिचरण पाड़ा तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता खवाई नदी है.
© WHO India/Padmaram Jamatia
त्रिपुरा की अथारामुरा पहाड़ियों के भीतर बसे कालिचरण पाड़ा तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता खवाई नदी है.

टीकाकरण के साथ-साथ, शिविर में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ भी दी गईं, जिससे लम्बे समय से अधूरी पड़ी ज़रूरतों को पूरा किया जा सका.

लेकिन सबसे गहरे असर वाली बातें गाँव वालों से आम चर्चाओं के दौरान हुईं. 

परिवारों के साथ बैठकर, उनकी बातें सुनते हुए, स्वास्थ्यकर्मियों ने पहली बार उन लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को क़रीब से जाना, जो अब तक पहुँच से बाहर रहे थे - छूटी हुई सुविधाएँ, कठिन यात्राएँ और भुला दिए जाने का अहसास. 

इन बातचीतों ने आँकड़ों को इनसानी अनुभवों में बदल दिया और दूरदराज़ इलाक़ों में रहने वाले समुदायों के सामने मौजूद ढाँचागत चुनौतियों को उजागर किया.

मुहिम का असर

खवाई के ज़िला कलेक्टर और मजिस्ट्रेट, रजत पंत ने कहा, “कठिन भू-भाग और दूरस्थ स्थिति के बावजूद, यहाँ बच्चों को समय पर टीके मिल रहे हैं. यह दिखाता है कि किसी को भी पीछे न छूटने देने के लिए, ज़िले की प्रतिबद्धता मज़बूत है.”

उन्होंने बताया कि अन्तिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए एक एकीकृत स्वास्थ्य शिविर लगाया गया, जिसमें टीकाकरण, ग़ैर-संचारी रोगों की जाँच, मलेरिया जागरूकता, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, ग्राम स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस की सेवाएँ और कृमिनाशक दवाओं का वितरण शामिल था. 

उन्होंने कहा, “फ़ील्ड टीम लगातार काम कर रही है, ताकि दूरदराज़ और पहुँचने में कठिन इलाक़े आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित न रहें.”

उन्होंने यह भी बताया कि गाँव में अब घर पर असुरक्षित प्रसव पूरी तरह बन्द हो गए हैं और सभी गर्भवती महिलाएँ प्रसव के लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जा रही हैं. 

उन्होंने निरन्तर प्रगति पर ज़ोर देते हुए, ज़िला स्वास्थ्य विभाग को नियमित दौरे करने और बेहतर सम्पर्क के लिए वैकल्पिक सड़क निर्माण की सम्भावनाएँ तलाशने के निर्देश दिए.

भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य निगरानी नेटवर्क की टीम, ज़िला प्रशासन और अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के साथ समुदाय की ज़रूरतों को समझने के लिए त्रिपुरा के कालिचरण पाड़ा पहुँची.
© WHO India/Swapan Das
विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य निगरानी नेटवर्क की टीम, ज़िला प्रशासन और अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के साथ, समुदाय की ज़रूरतों को समझने के लिए कालिचरण पाड़ा पहुँची.

व्यवस्थागत बदलाव 

यह यात्रा कालिचरण पाड़ा पर आकर समाप्त नहीं हुई. यहाँ से मिले अनुभव राज्य मुख्यालय तक पहुँचे, जहाँ विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य निगरानी नैटवर्क ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करके यह विचार किया कि आगे सेवाओं को किस तरह से और बेहतर बनाया जा सकता है.

एक साथ मिलकर ऐसे टिकाऊ और विस्तार योग्य उपायों पर चर्चा हुई, जिनसे दुर्गम इलाक़ों में टीकाकरण और आवश्यक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ मज़बूत हों - ताकि किसी बच्चे का स्वस्थ भविष्य उसके रहने की जगह पर निर्भर न रहे.

आज, कालिचरण पाड़ा इस बात की मिसाल है कि जब सहयोग एवं प्रतिबद्धता साथ आती हैं, और जब व्यवस्थाएँ लोगों तक पहुँचने के लिए ख़ुद को ढालती हैं, तो वास्तविक बदलाव सम्भव होता है.

अथारामुरा की पहाड़ियों में, जंगलों के बीच चुपचाप बहती नदी के साथ एक स्पष्ट सन्देश गूंजता है - कोई भी बच्चा पीछे नहीं छूटना चाहिए, चाहे मंज़िल कितनी ही दूर क्यों न हो.