भारत: लड़कियाँ, जिन्होंने एक स्कूल को सुनना सिखाया
बिहार के पूर्णिया ज़िले के कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों में समावेशन का अर्थ सिर्फ़ मदद करना नहीं, बल्कि वास्तविक मायनों में सुनना है. यहाँ कक्षा 6 से 8 की क़रीब 75 बधिर किशोरियाँ, मुख्यधारा के आवासीय स्कूलों में रहकर, पढ़ना, गणित और सांकेतिक भाषा सीख रही हैं. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) और स्थानीय साझेदारों की इस पहल ने यह दर्शाया है कि जब शिक्षा सबकी पहुँच में हो, तो हर लड़की आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकती है.
अजमती ख़ातून दो बहनों और तीन भाइयों के साथ रहती हैं. घर में हमेशा बातचीत और हँसी-ठहाके गूँजते रहते थे, लेकिन अजमती उन आवाज़ों को महसूस नहीं कर पाती थीं. सबके साथ होते हुए भी वह ख़ुद को कटा हुआ महसूस करती थीं. सुनने-बोलने में असमर्थ होने के कारण अजमती 19 साल की उम्र तक कभी स्कूल नहीं जा सकीं.
फिर उन्हें एक ऐसे आवासीय स्कूल के बारे में पता चला, जहाँ उनके जैसी लड़कियों के पास सीखने-सिखाने का मौक़ा मिलता है. अजमती ने स्कूल बैग उठाया और पढ़ाई की राह पर निकल पड़ीं.
बड़ी चुनौती
जिस दिन अजमती समेत 25 अन्य मूक-बधिर लड़कियाँ स्कूल पहुँचीं, वह दिन सामान्य नहीं था. सभी चौंक उठे.
पूर्णिया ज़िले के कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय में सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाली 31 साल की मानसी कुमारी बताती हैं, “जो न सुन सकती हैं, न बोल सकती हैं, उन्हें हम पढ़ाएँ कैसे?” उस समय इस सवाल का किसी के पास जवाब नहीं था.
लड़कियाँ बाक़ी छात्रों के साथ कक्षाओं में बैठीं, वही पाठ्यक्रम पढ़ाया गया, लेकिन पढ़ाई उनके लिए धुँधली रही.
समग्र शिक्षा कार्यक्रम के ज़िला पदाधिकारी कौशल कुमार ने जब यह स्थिति देखी, तो समस्या स्पष्ट थी. वे कहते हैं, “वे कक्षा में बैठती थीं, शिक्षक पढ़ाते भी थे, लेकिन न तो वे सुन सकती थीं और न बोल सकती थीं.”
अक्सर ऐसे बच्चों को अलग कर दिया जाता है, लेकिन इस बार फ़ैसला अलग था. कौशल कुमार ने कहा, “अगर हम इन्हें छोड़ देंगे, तो ये आगे नहीं बढ़ पाएँगी,”
नए कौशल
इसके बाद एक नई योजना बनी. स्कूल में स्मार्ट बोर्ड लगाए गए और सांकेतिक भाषा में पढ़ाने का फ़ैसला हुआ. लेकिन कोई शिक्षक यह भाषा नहीं जानता था.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) और बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के सहयोग से जुलाई 2025 में आठ दिनों का प्रशिक्षण कराया गया.
मानसी कुमारी कहती हैं, “हम इशारे सीखते थे और कई बार ग़लतियाँ करते थे.”
विशेष शिक्षक संतोष मौर्य जोड़ते हैं, “इस प्रशिक्षण से हमें आत्मविश्वास मिला.”
धीरे-धीरे कक्षाओं का माहौल बदल गया. डिजिटल पटल, चित्र, चलती तस्वीरें और सांकेतिक भाषा के पोस्टर पढ़ाई का हिस्सा बने.
बदलाव की बयार
अब न अलग कक्षाएँ हैं, न अलग स्कूल. सभी बच्चे एक साथ, सांकेतिक भाषा के माध्यम से सीखते हैं. अजमती आज मुस्कराकर कहती हैं, “यहाँ मुझे समझ आया कि मुझे गणित पसन्द है.”
कुछ ही हफ़्तों में जिन लड़कियों को पढ़ने योग्य नहीं माना जाता था, वे परीक्षाओं में 80 से 90 प्रतिशत अंक लाने लगीं.
कौशल कुमार कहते हैं, “यह साबित करता है कि सही माध्यम मिले, तो ये बच्चे बहुत अच्छी तरह सीख सकते हैं.”
सबसे अहम बात यह है कि ये बधिर लड़कियाँ अलग नहीं हैं. वे अन्य छात्राओं के साथ एक ही कक्षा और छात्रावास में रहती हैं. अब सुनने में सक्षण लड़कियाँ भी सांकेतिक भाषा सीख रही हैं.
मानसी कहती हैं, “ये बच्चे बाक़ी बच्चों के साथ ही पढ़ते, खाते और रहते हैं.”
भविष्य की राह
आगे की चुनौती आठवीं के बाद की है. इसके लिए शिक्षकों के और प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास और ज़िला स्तर पर केन्द्र खोलने की योजना बनाई जा रही है.
कौशल कुमार कहते हैं, “हर बच्चे में कोई न कोई क्षमता होती है. सवाल यह है कि हम उसे पहचानते हैं या नहीं.”
बिहार शिक्षा परियोजना परिषद, समग्र शिक्षा बिहार और यूनीसेफ़ के सहयोग से जिस पहल शुरुआत कुछ लड़कियों से हुई थी, वह अब बड़े बदलाव में बदल चुकी है.
पूर्णिया के कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय दिखा रहे हैं कि समावेशन बच्चों को बदलने का नहीं, बल्कि शिक्षा की व्यवस्था को बदलने का नाम है.
इस लेख का विस्तृत रूप पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.