दक्षिण सूडान: जोंगलेई में बड़े पैमाने पर हिंसा के ख़तरे की चेतावनी
दक्षिण सूडान में यूएन शान्तिरक्षा मिशन (UNMISS) ने, जोंगलेई प्रान्त में बढ़ती हिंसा को लेकर गम्भीर चिन्ता जताई है. यह हिंसा आम नागरिकों के जीवन के लिए गम्भीर ख़तरा बन रही है और क्षेत्र में शान्ति की उम्मीदों को दीगर कमज़ोर कर रही है.
प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक वरिष्ठ सैन्य नेता अपने सैन्य बलों को नागरिकों के ख़िलाफ़ भेदभावपूर्ण हिंसा करने के लिए उकसा रहा है. इसके कारण 1 लाख 80 हज़ार से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं.
UNMISS के अधिकारी ग्राहम मेटलैंड ने चेतावनी दी है, “सभी नागरिकों, ख़ासकर सबसे कमज़ोर लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा किए जाने का उकसावा, पूरी तरह निन्दनीय है और इसे तुरन्त रोका जाना चाहिए.”
झड़पें और तनाव जारी...
जुलाई 2011 में, दक्षिण सूडान ने स्वतंत्रता हासिल की थी, लेकिन जल्द ही, दुनिया का यह सबसे युवा देश गृहयुद्ध की आग में फँस गया.
यह लड़ाई राष्ट्रपति सल्वा कीर के समर्थक और मुख्य विपक्षी नेता, उपराष्ट्रपति रीक मचार के समर्थक बलों के बीच छिड़ गई.
साल 2018 में, शान्ति समझौते और संक्रमणकालीन एकता सरकार के गठन के बावजूद, झड़पें और तनाव जारी हैं.
UNMISS के अनुसार, बढ़ते युद्ध से, जोंगलेई और अन्य स्थानों के समुदायों को भारी नुक़सान हो रहा है, जिसमें सैन्य बलों के बीच सीधे सैन्य टकराव भी शामिल हैं.
दक्षिण सूडान के नेता शान्ति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते तो हैं, लेकिन शत्रुता और युद्धविराम के उल्लंघन जारी हैं.
संयुक्त राष्ट्र मिशन ने नेताओं से लोगों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने, लड़ाई तुरन्त रोके जाने और शान्ति समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने का आग्रह किया है.
ग्राहम मैटलैंड ने कहा, “इसमें सहमति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया में लौटना, सत्ता-बँटवारे की व्यवस्थाओं का पालन करना और समावेशी सम्वाद के ज़रिए बदलाव को शान्तिपूर्ण रूप से समाप्त करने का रास्ता तय करना शामिल है.”
उत्तेजक बयानबाज़ी...
संयुक्त राष्ट्र दक्षिण सूडान मानवाधिकार आयोग ने जोंगलेई की स्थिति पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है.
आयोग ने कहा कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की उत्तेजक बयानबाज़ी और बल तैनाती की ख़बरें, आम नागरिकों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हिंसा के जोखिम को बढ़ा देती हैं, और शान्ति समझौते को दीगर कमज़ोर करती हैं.”
आयोग के सदस्यों ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, ऐसे सैन्य और नागरिक नेता जो अपराध को उकसाते हैं या जिनके नियंत्रण में बल हैं, उन्हें आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
इसके अलावा, जो लोग उन अपराधों को रोकने या सज़ा देने में विफल रहते हैं, जिनके बारे में उन्हें जानकारी थी या जिनके होने का उन्हें पता होना चाहिए था, वे भी समान रूप से आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार हैं.
व्यापक राजनैतिक संकट
संयुक्त राष्ट्र के दक्षिण सूडान मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष यासमीन सूका ने आगाह करते हुए कहा, “ऐसी भाषा जो अब लड़ाई में भाग नहीं लेने वाले व्यक्तियों और बुज़ुर्गों सहित आम लोगों की हत्या करने के लिए उकसाती है, न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि बेहद ख़तरनाक भी है - जैसे कि ‘किसी को नहीं बख़्शा जाना चाहिए’...”
उन्होंने कहा, “दक्षिण सूडान के इतिहास में, इस तरह की बयानबाज़ी बड़े पैमाने पर अत्याचारों से पहले होती रही है. जब ऐसे शब्द नेतृत्व की स्थिति में रहने वालों द्वारा दिए या सहन किए जाते हैं, तो यह स्थिति हिंसा की अनुमति का संकेत देती है, और संयम की कोई उम्मीद नहीं बचती.”
आयोग ने कहा कि वर्तमान हिंसा कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि व्यापक राजनैतिक संकट का हिस्सा है. यह शान्ति समझौते के लगातार उल्लंघनों और पहले से ही अस्थिर व जातीय रूप से विभाजित वातावरण में नेतृत्व अनुशासन की गिरावट के कारण बढ़ रही है.
संयम बरतने की अपील
संयुक्त राष्ट्र दक्षिण सूडान मानवाधिकार आयोग के आयुक्त बार्नी अफाक़ो ने कहा, “जब वरिष्ठ अधिकारी बेपरवाह या हिंसक बयानबाज़ी करते हैं, या इसे निर्णायक रूप से रोकने में विफल रहते हैं, तो वे दुर्व्यवहार या शोषण की सीमा घटा देते हैं और सन्देश भेजते हैं कि अब संयम लागू नहीं होता.”
उन्होंने चेतावनी दी, “इस सन्दर्भ में बलों की तैनाती, जातीय सन्देशों के साथ मिलकर, प्रतिशोधी हिंसा की श्रृंखला को जन्म दे सकती है, जो तेज़ी से नियंत्रण से बाहर हो सकती है.”
आयोग ने सभी पक्षों से आग्रह किया है कि वे तुरन्त उत्तेजक बयानबाज़ी और बल तैनाती बन्द करें ताकि तनाव कम किया जा सके.
अन्तरराष्ट्रीय दबाव का आग्रह
आयोग ने, दक्षिण सूडान के क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय साझीदारों से भी शान्ति समझौते को बचाने और नेताओं पर राजनैतिक प्रक्रिया में लौटने का दबाव डालने के लिए, तुरन्त फिर से सक्रिय होने का आहवान किया है.
आयोग ने चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर पूर्ण स्तर की जातीय हिंसा और एक त्रासदी का ख़तरा है, जिसे घटित होने से पहले ही रोका जा सकता है.
ग़ौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने, दक्षिण सूडान मानवाधिकार आयोग की स्थापना मार्च 2016 में की थी, और इसका कार्यादेश हर वर्ष आगे बढ़ाया जाता रहा है.
आयोग में कार्यरत तीनों आयुक्त संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं हैं और उन्हें अपने इस कार्य के लिए, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन नहीं मिलता.