'क़ानून के शासन' को धकेल कर, 'जंगल के क़ानून' को लाने की कोशिशों पर चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र के शीर्षतम अधिकारी, एंतोनियो गुटेरेश ने 'क़ानून के शासन' को हटाकर, 'जंगल के क़ानून' का प्रयोग किए जाने के प्रति चेतावनी जारी करते हुए आग्रह किया है कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति फिर से संकल्प व्यक्त करना होगा, जोकि शान्ति, न्याय व बहुपक्षीय सहयोग की नींव है.
यूएन महासचिव ने सोमवार को सुरक्षा परिषद में, जनवरी के लिए अध्यक्ष सोमालिया द्वारा आयोजित एक उच्चस्तरीय चर्चा को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.
सुरक्षा परिषद की यह बैठक एक ऐसे समय में बुलाई गई है जब विश्व के अनेक हिस्सों में हिंसक टकराव धधक रहे हैं, वैश्विक तनाव उछाल पर है और अन्तरराष्ट्रीय संस्थों व नियमों में भरोसा दरक रहा है. और यह संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के के 80 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हो रहा है, जिसे युद्धों की रोकथाम और पीड़ा दूर करने इरादे से बनाया गया था.
महासचिव गुटेरेश ने कहा कि क़ानून का शासन, वैश्विक शान्ति व सुरक्षा की आधारशिला है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि पिछले आठ दशकों से, यूएन चार्टर, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा, जिनीवा कन्वेंशन, और अन्य बुनियादी क़ानूनी उपकरणों ने, एक और विश्व युद्ध को टालने में दुनिया की मदद की है और अनगिनत हिंसक टकरावों की भयावहता को कम किया है.
खुला उल्लंघन
महासचिव ने आगाह किया कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के लिए प्रतिबद्धताओं को अनदेखा किए जाने का चलन बढ़ता जा रहा है.
“विश्व भर में, क़ानून के शासन को, जंगल के क़ानून के ज़रिए हटाया जा रहा है.” यूएन प्रमुख के अनुसार, यूएन चार्टर और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का खुला उल्लंघन हो रहा है, जिसमें अवैध बल प्रयोग, नागरिक प्रतिष्ठानों पर हमले, मानवाधिकारों का हनन, और जीवनरक्षक मानवीय सहायता को नकारने समेत अन्य मामले हैं.
ग़ाज़ा से यूक्रेन और उससे परे तक, क़ानून के राज, नियमों को देश अपनी मनमर्ज़ी से चुन रहे हैं. मगर, ऐसे उल्लंघनों से ख़तरनाक प्रतिमान स्थापित होते हैं, दंडहीनता को हवा मिलती है और देशों के बीच भरोसा दरकता है.
अहम सुरक्षा उपाय
यूएन प्रमुख ने बताया कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, छोटे, कम शक्तिशाली देशों के लिए समान बर्ताव, सम्प्रभुता, गरिमा व न्याय की एक जीवनरेखा है. ऐसे देश विशेष रूप से ऐतिहासिक असमताओं और औपनिवेशवाद की विरासतों से प्रभावित रहे हैं.
“शक्तिशाली देशों के लिए, यह एक सुरक्षा घेरा है जो तय करता है कि क्या स्वीकार्य है, और क्या नहीं. असहमतियों, विभाजनों और पूरी तरह से टकरावों के समय में.”
महासचिव ने ज़ोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद के पास एक अनूठा दायित्व है. यह यूएन चार्टर के तहत एकमात्र ऐसा निकाय है, जिसके पास सदस्य देशों को क़ानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय सुनाने का अधिकार है और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अन्तर्गत बल प्रयोग को भी स्वीकृति दी जा सकती है.
उनके अनुसार, इसकी ज़िम्मेदार एकमात्र है जबकि यह दायित्व सार्वभौमिक है.
महत्वपूर्ण प्राथमिकताएँ
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अपनी प्राथमिकताओं का खाका प्रस्तुत करते हुए कहा कि सर्वप्रथम, देशों को यूएन चार्टर के तहत तयशुदा दायित्वों का पूर्ण रूप सम्मान करना होगा.
विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा, मानवाधिकारो की रक्षा और सम्प्रभु देशों का सम्मान.
दूसरा, उन्होंने आपसी विवादों के निपटारे के लिए शान्तिपूर्ण उपायों का इस्तेमाल करने का आग्रह किया. वार्ता, मध्यस्थता और न्यायिक व्यवस्था के ज़रिए सुलटाव. आवश्यकता होने पर क्षेत्रीय संगठनों की साझेदारी में यह किया जाना होगा और विकास में अधिक निवेश ज़रूरी है ताकि असमानता की बुनियादी वजहों को दूर किया जा सके.
तीसरा, निष्पक्ष, स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता. महासचिव ने अन्तरराष्ट्रीय अदालतों और ट्राइब्यूनल पर निर्भरता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिनमें अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय और अन्तरराष्ट्रीय अपराध मामलों के लिए न्यायिक व्यवस्था है.
उन्होंने सचेत किया कि बिना किसी जवाबदेही के कोई सतत या न्यायसंगत शान्ति को साकार कर पाना सम्भव नहीं है. “क़ानून के राज को सर्वोपरि बनाना होगा.”