युद्ध छीन रहे हैं बच्चों का बचपन और शिक्षा के अवसर
जब स्कूलों पर बमबारी होती है या उन्हें सैन्य बैरकों में तब्दील कर दिया जाता है तो शिक्षा व्यवस्था, युद्ध के सामने मानो घुटने टेकने के लिए विवश नज़र आती है. आज, युद्धग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे लाखों-करोड़ों बच्चों के लिए, हिंसक टकराव की क़ीमत केवल शिक्षा का ठप हो जाना ही नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा, स्थिरता और उस भविष्य का भी नुक़सान है, जिसका वादा उनसे किया गया था.
हेलेना मुरसेली, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और आपात परिस्थितियों में वैश्विक शिक्षा प्रयासों के लिए टीम का नेतृत्व करती हैं. उन्होंने यूएन न्यूज़ हिन्दी के साथ विशेष बातचीत में बताया कि, “स्कूल, अक्सर एक बच्चे के जीवन में सबसे स्थाई और सुरक्षित स्थान होता है.
मगर, “जब शिक्षा रुकती है, तो एक बच्चे से केवल शिक्षा ही नहीं, उससे कहीं ज़्यादा खो जाता है.”
यूनीसेफ़ के अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में स्कूली उम्र के 23 करोड़ 40 लाख से अधिक बच्चे संकटों से प्रभावित हैं, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच के लिए उन्हें तत्काल सहायता की ज़रूरत है. यह आँकड़ा पिछले तीन वर्षों में 3.5 करोड़ की वृद्धि को दर्शाता है.
इनमें से 8.5 करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं या किसी भी तरह की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं. यह स्थिति, वैश्विक स्तर पर शिक्षा बजट में बड़ी कटौती के कारण, और अधिक ख़राब होने की आशंका है.
यूनीसेफ़ ने चेतावनी दी है कि 2026 के अन्त तक 60 लाख अतिरिक्त बच्चे स्कूल से बाहर हो सकते हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने, 24 जनवरी को 'अन्तरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के अवसर पर अपने सन्देश में ध्यान दिलाया है कि “शिक्षा एक मानव अधिकार है और बेहतर अवसरों, गरिमा तथा शान्ति की ओर ले जाने वाला आधार भी है.”
हालाँकि, इस सार्वभौमिक सिद्धान्त के बावजूद, शिक्षा क्षेत्र में वैश्विक संकट की विशालता बेहद चिन्ताजनक है.
जब स्कूल बन्द होते हैं...
स्कूल, शिक्षा के अलावा बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान होते हैं, जो उन्हें अनुशासन, नियमितता, संरक्षण और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच प्रदान करते हैं. लेकिन युद्ध के कारण जब स्कूल के दरवाज़े बन्द हो जाते हैं, तो बच्चे अनेक आयामों में असुरक्षित हो जाते हैं.
यूनीसेफ़ अधिकारी हेलेना मुरसेली ने बताया कि “जब स्कूल बन्द होते हैं या शिक्षा बाधित होती है, तो बाल श्रम, बाल विवाह, सशस्त्र समूहों द्वारा लड़ाइयों में प्रयोग के लिए उनकी जबरन भर्ती, शोषण और दुर्व्यवहार जैसे जोखिम बढ़ जाते हैं.”
स्कूली शिक्षा के अभाव में बच्चे एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं, जिसे यूनीसेफ़ “सीखने के बजाय केवल जीवित रहने की अवस्था” बताता है.
हेलेना मुरसेली ने कहा कि स्कूल, मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता, भरोसेमन्द जानकारी, पोषण, तथा पानी, स्वच्छता व साफ़-सफ़ाई (WASH) सेवाओं तक पहुँच के भी महत्वपूर्ण केन्द्र होते हैं. जब शिक्षा बाधित होती है, तो संरक्षण की कई परतें एक साथ समाप्त हो जाती हैं.
इसके दीर्घकालिक परिणाम बहुत गम्भीर हैं. यूनीसेफ़ के एक अनुमान के अनुसार, संकटों से प्रभावित, 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य ज़रूरतों को नज़रअन्दाज़ करने से, वैश्विक स्तर पर जीवन भर की आय में लगभग 203 अरब अमेरिकी डॉलर का नुक़सान हो सकता है.
केवल सूडान में ही शिक्षा में आई बाधा, बच्चों के लिए जीवन पर्यन्त आये में लगभग 26 अरब अमेरिकी डॉलर के नुक़सान का कारण बन सकती है.
हेलेना मुरसेली कहती हैं, “यही कारण है कि आपात स्थितियों में शिक्षा न केवल जीवनरक्षक होती है, बल्कि जीवन को बदलने वाली भी होती है. आज बच्चों की सुरक्षा करने का अर्थ, भविष्य में पुनर्निर्माण, स्थिरता और शान्ति के लिए आवश्यक मानव पूँजी को सुरक्षित करना है.”
गहराती असमानताएँ...
युद्ध का प्रभाव सभी बच्चों पर समान रूप से नहीं पड़ता. युद्ध मौजूदा असमानताओं को और गहरा कर देते हैं, और सबसे कमज़ोर बच्चों को समाज में हाशिए पर रहने वाले बच्चों को और पीछे धकेलते हैं.
यूनीसेफ़ अधिकारी ने बताया कि, “इससे लड़कियाँ विशेष रूप से प्रभावित होती हैं, ख़ासकर किशोर लड़कियाँ जो बाल विवाह और स्कूल छोड़ने के उच्च जोखिम में हैं; विकलांग बच्चे, जिन्हें शिक्षा प्रणालियों और सेवाओं में बाधा आने पर विशेष समर्थन नहीं मिलता, और शरणार्थी तथा अन्य विस्थापित बच्चे, जिनके पास अक्सर दस्तावेज़ और भाषा सम्बन्धी सहायता की कमी होती है.”
जो बच्चे किसी संकट से पहले ही स्कूल से बाहर थे, उनके लिए स्कूली शिक्षा में वापिस लौटना और भी मुश्किल होता है.
वरिष्ठ सलाहकार हेलेना मुरसेली कहती हैं, “बच्चे जितना अधिक समय तक शिक्षा से दूर रहते हैं, उन्हें स्कूली शिक्षा में वापिस लाना उतना ही कठिन हो जाता है."
"यही कारण है कि यूनीसेफ़ आपात परिस्थितियों में बच्चों को शिक्षा जारी रखने के लिए तत्काल, समावेशी और लक्षित शिक्षा उपायों को प्राथमिकता देता है, चाहे परिस्थितियाँ जैसी भी हों.”
लड़कियाँ अधिक प्रभावित
युद्ध की स्थिति में लड़कियों के लिए अक्सर स्कूल के दरवाज़े पूरी तरह बन्द हो जाते हैं. संकटग्रस्त क्षेत्रों में, लड़कियों के स्कूल से वंचित रहने की सम्भावना, लड़कों की तुलना में 2.5 गुना अधिक होती है.
हेलेना मुरसेली के अनुसार, “बढ़ती असुरक्षा के साथ, परिवार को, लड़कियों को घर पर ही रखने के निर्णय लेने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं, जब स्कूल जाने और लौटने के रास्ते असुरक्षित हों या जब स्कूलों पर हमला या क़ब्ज़े की स्थिति हो.”
उन्होंने बताया कि आर्थिक दबाव बाल विवाह को बढ़ावा देता है, जबकि लड़कियों पर घरेलू और देखभाल सम्बन्धी ज़िम्मेदारियाँ भी अधिक होती हैं.
“विशेष रूप से विस्थापन वाले क्षेत्रों में अपर्याप्त जल, स्वच्छता और साफ़-सफ़ाई की सुविधाओं के अभाव के हालात,, लड़कियों के लिए स्कूल जाना कम गरिमामय और असुरक्षित बना सकते हैं.”
यूनीसेफ़ इन चुनौतियों के समाधान के रूप में, सुरक्षित शिक्षण स्थल, स्वच्छ पानी की पहुँच, सुरक्षित शौचालय और सामुदायिक सहभागिता पर ध्यान केन्द्रित करता है, ताकि सुरक्षा जोखिम कम हों और लड़कियाँ स्कूल में बनी रहें.
युद्ध के चंगुल में शिक्षा
अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत सुरक्षित माने जाने वाले स्कूल, युद्धों और हिंसक टकरावों की लगातार चपेट में आ रहे हैं. पिछले दो दशकों में दुनिया भर में, स्कूलों पर 14 हज़ार से अधिक हमले दर्ज किए गए हैं यानि हर दिन लगभग 2 हमले.
हेलेना मुरसेली का कहना है कि, “ये हमले न केवल स्कूलों को नष्ट करते हैं, बल्कि भय भी उत्पन्न करते हैं, जिससे परिवार अपने बच्चों को घर पर ही रखने के लिए मजबूर होते हैं.”
अपना घर छोड़ने को विवश हुए बच्चों के लिए शिक्षा जारी रखना अक्सर असम्भव सा लगने लगता है.
हेलेना मुरसेली के अनुसार, शरणार्थी और आन्तरिक रूप से विस्थापित बच्चों के सामने, शिक्षा में पहुँच के लिए अनेक और एक-दूसरे से जुड़े अवरोध होते हैं.
“वे भीड़-भाड़ वाली कक्षाओं, शिक्षकों की कमी, परिवारों के लिए मँहगे ख़र्च, खो चुके दस्तावेज़, भाषा सम्बन्धी बाधाओं, सुरक्षा या समावेशन की चिन्ताओं, बुनियादी सुविधाओं की कमी, मेज़बान समुदायों में भेदभाव, और परिवार का समर्थन करने के लिए काम या देखभाल की ज़िम्मेदारियों का सामना करते हैं.”
इसके मद्देनज़र, यूनीसेफ़, देशों की सरकारों के साथ मिलकर विस्थापित बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणालियों में शामिल करता है, शिक्षकों को प्रशिक्षित करता है और आर्थिक बाधाओं को कम करता है.
हेलेना आगाह करते हुए कहती हैं, “फिर भी, शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक वित्तीय समर्थन में कटौतियों के बीच ये उपलब्धियाँ नाज़ुक बनी हुई हैं.”
यूनीसेफ़ को, बांग्लादेश में वैश्विक बजट कटौतियों के कारण कॉक्सेस बाज़ार में स्थित शरणार्थी शिविरों में 6,400 से अधिक शिक्षण केन्द्र बन्द करने पड़े, जिससे लगभग 3 लाख रोहिंग्या बच्चों की शिक्षा जोखिम में है.
एक ‘खोई हुई पीढ़ी’
हेलेना मुरसेली ने यूनीसेफ़ की शिक्षा योजनाओं के परिवर्तनकारी प्रभावों और उनके बाधित होने के भयानक परिणामों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि, “यूनीसेफ़ समर्थित शिक्षा, शिविरों में रहने वाले बहुत से बच्चों के लिए, उनके जीवन में सीखने-सिखाने का पहला और एकमात्र अवसर रही है.”
“जब एक पूरी पीढ़ी स्कूली शिक्षा से वंचित रहती हैं, तो देशों के लिए वो मानव पूँजी खो जाती है जिसकी आवश्यकता उन्हें अपनी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों के पुनर्निर्माण में होती है.”
उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा, “हम एक ‘खोई हुई पीढ़ी’ को तैयार करने का जोखिम झेल रहे हैं, ऐसे बच्चे जो केवल संकट जानते हैं, और जिनके पास समाज का पुनर्निर्माण करने के लिए कौशल या उम्मीद नहीं होती.”
इसलिए, यूनीसेफ़ का हमेशा इस बात पर बल रहा है कि शिक्षा को स्थगित नहीं किया जा सकता. शिक्षा कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो आपात स्थिति के बाद आती है, यह पहले दिन से ही स्थिरता लाने,और शान्ति निर्माण का एक मुख्य हिस्सा है.
आपात हालात में शिक्षा...
धरातल पर, हर संकट में “आपात शिक्षा” अलग रूप लेती है. यह अस्थाई शिक्षण स्थल से लेकर क्षतिग्रस्त कक्षाओं के पुनः निर्माण या जहाँ स्कूल मौजूद नहीं हैं वहाँ व्हाट्सऐप या एसएमएस आधारित पाठ्यक्रम जैसी कम-तकनीकी समाधान के रूप में हो सकती है.
“जब युद्ध शुरू होते हैं या प्राकृतिक आपदा आती है, तो हम यह आकलन करते हैं कि कितने स्कूल क्षतिग्रस्त हुए हैं, कितने बच्चे शिक्षा नहीं कर पा रहे हैं, कितने शिक्षक चले गए हैं, और समुदाय क्या कर सकते हैं.”
हेलेना मुरसेली कहती हैं कि, “कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि संकट का प्रभाव कितना गम्भीर है, मौजूदा क्षमताएँ क्या हैं, स्थानीय किरदारो की कितनी मौजूदगी है, और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की क्या भूमिका है.”
“शिक्षा को स्वास्थ्य, पोषण, पानी, स्वच्छता और संरक्षण सेवाओं के साथ एकीकृत किया गया है, यह मानते हुए कि जब तक बच्चों की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, वे सीख नहीं सकते."
उन्होंने कहा कि अब शिक्षा के लिए हमें आपातकालीन परिस्थितियों में शिक्षा के दृष्टिकोण को भी बदलने की आवश्यकता है. यह केवल अल्पकालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि बच्चों के अधिकारों और उनके भविष्य में दीर्घकालिक निवेश है.”
यह संकट-प्रभावित उन करोड़ों बच्चों के लिए आवश्यक है, जो सीखने का अपना अधिकार पूरा नहीं कर पा रहे हैं. और साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है.