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म्याँमार के रोहिंग्या लोगों पर हमले करने से पहले उन्हें ‘मुस्लिम कुत्ते’ कहा गया

म्याँमार में, हालात बेहद असुरक्षित होने के कारण, हज़ारों रोहिंज्या लोग देश से बाहर निकल गए हैं.
© UNICEF/Maria Spiridonova
म्याँमार में, हालात बेहद असुरक्षित होने के कारण, हज़ारों रोहिंज्या लोग देश से बाहर निकल गए हैं.

म्याँमार के रोहिंग्या लोगों पर हमले करने से पहले उन्हें ‘मुस्लिम कुत्ते’ कहा गया

डेनियल जॉन्सन
मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च न्यायालय (ICJ) में गाम्बिया की उस याचिका पर गुरूवार को भी सुनवाई जारी रही, जिसमें म्याँमार पर, रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ जनसंहार करने का आरोप लगाया गया है. इस मुक़दमे की सुनवाई के दौरान आरोप लगाया गया है कि म्याँमार के सैन्य अधिकारियों ने, रोहिंग्या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को “मुस्लिम कुत्ते” कहकर सम्बोधित किया और उन्हें “समाप्त कर देने” की बातें कहकर हिंसा के लिए उकसाया.

गाम्बिया की क़ानूनी टीम की ओर से जेसिका जोन्स ने गुरूवार को अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में सुनवाई के दौरान बताया कि रोहिंग्या समुदाय को, म्याँमार की सेना के वरिष्ठ अधिकारियों सहित अन्य सैन्य कर्मियों की ओर से लम्बे समय से अपमान, अवमानना और घृणास्पद भाषणों का सामना करना पड़ा है.

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उन्होंने, अगस्त 2017 में सोशल मीडिया मंच - फ़ेसबुक पर एक साझा किए गए एक वीडियो का भी ज़िक्र किया. 

इस वीडियो में एक सैनिक, रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ “जनसंहार जैसी हिंसा को खुले तौर पर बढ़ावा देता हुआ” दिखाई दे रहा है.  

जेसिका जोन्स ने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयाँ, 1948 की जनसंहार निरोधक कन्वेंशन (Genocide Convention) के तहत म्याँमार की अन्तरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट उल्लंघन हैं.

जेसिका जोन्स ने, म्याँमार के उस सैन्य अधिकारी के शब्दों को प्रस्तुत किया जिसमें वो कह रहा है, “हम उन गाँवों को मिटा देंगे, जहाँ ये जानवर रहते हैं. हमारे पास बन्दूकें हैं, हमारे पास गोलियाँ हैं. हम गोला-बारूदों के साथ, इन जानवरों पर हमला करने की भावना के साथ यहाँ आए हैं. अगर तुम तलवार उठा सकते हो, तो तलवार उठाओ. अगर लाठी उठा सकते हो, तो लाठी उठाओ. जो भी उठा सको, उसे उठाओ और इन जानवरों का बहादुरी से सामना करो.’”

गाम्बिया, एक मुस्लिम बहुल देश है, जिसने आरोप लगाया है कि म्याँमार के सैन्य शासकों ने 2016 से 2018 के बीच उत्तरी राख़ीन प्रान्त में, रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ भीषण जनसंहार किया.

इन उल्लंघनों में सामूहिक हत्याएँ, महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 10 हज़ार आम नागरिकों की अन्धाधुन्ध हत्या, व्यापक यौन हिंसा और सैकड़ों गाँवों को जानबूझकर जला देना शामिल है.

'नस्लीय सफ़ाए का एक पाठ्यपुस्तक उदाहरण'

वर्ष 2017 में, तत्कालीन यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ज़ाइद राआद अल-हुसैन ने, उस समय इस स्थिति को “नस्लीय सफ़ाए का एक पाठ्यपुस्तक उदाहरण” क़रार दिया था.

उन कथित जनसंहारक कृत्यों ने, देश में रह रहे 7 लाख से अधिक रोहिंग्या लोगों को, अपने घर छोड़कर पड़ोसी देश बांग्लादेश भागने को मजबूर कर दिया था. आज भी लगभग 10 लाख रोहिंग्या लोग, बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अनगिनत अन्य लोग, म्याँमार के भीतर ही विस्थापित हैं या अत्यन्त दयनीय परिस्थितियों में फँसे हुए हैं.

2020 में, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने गाम्बिया की याचिका पर म्याँमार को अपने कथित जनसंहारक कृत्यों को रोकने का आदेश दिया था.

अब गाम्बिया, म्याँमार को उसके कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराने के साथ-साथ भुक्तभोगियों के लिए मुआवज़ा और पुनर्वास सुनिश्चित करने की माँग कर रहा है.

वहीं, म्याँमार लम्बे समय से रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ जानबूझकर उत्पीड़न के आरोपों से इनकार करता रहा है और उसका कहना है कि उसने केवल उग्रवाद-रोधी (counter-insurgency) अभियान चलाए थे.

Rohingya refugees arrive by makeshift raft from Myanmar to Noya Para, Bangladesh.
© UNICEF/Mackenzie Knowles-Coursin
म्याँमार में 2017 में भीषण हिंसा से बचने के लिए से लाखों रोहिंग्या लोग किसी तरह कामचलाऊ नाव के ज़रिए बांग्लादेश पहुँचे थे.

ऐतिहासिक मामला

इस मामले को व्यापक रूप से एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि यह पहला अवसर है जब अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ऐसे विवाद पर फ़ैसला देने जा रहा है, जिसे उस देश ने उठाया है जो कथित अपराध से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं हुआ है.

अगले सप्ताह, तीन रोहिंग्या गवाह अदालत के सामने अपने बयान दर्ज कराएंगे. गाम्बिया की ओर से फ़िलिप सैन्ड्स ने समापन टिप्पणी में कहा कि ये गवाह “ग़लत समय पर, ग़लत जगह पर और ग़लत समूह के सदस्य” थे, जिन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने जीवनसाथियों और बच्चों की हत्या होते देखी.

ग़ौरतलब है कि अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ), संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है. यह देशों के बीच क़ानूनी विवादों का निपटारा करता है और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून से जुड़े प्रश्नों पर परामर्शात्मक राय देता है.

नैदरलैंड्स के द हेग में इस मुक़दमे की यह ऐतिहासिक सुनवाई 29 जनवरी तक चलेगी.