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यूनिसेफ और जिला स्वास्थ्य सलाहकारों के मार्गदर्शन में भारत के छत्तीसगढ़ के यशपुर में एक सहकर्मी सहायता समूह की बैठक में सिकल सेल रोग से पीड़ित दो बच्चों सहित चार सदस्यों का एक परिवार एक साथ बैठता है।

भारत: बीमारियों से निपटने में एक दूसरे के सहारे पर भरोसा

© UNICEF/Mithila Jariwala
मंगल राम (बाएँ), अपनी पत्नी (दाएँ), बेटी योगिता बाई और बेटे विभांश राम के साथ बैठक में शामिल होते हैं. उनके दोनों बच्चों को सिकल सेल रोग है.

भारत: बीमारियों से निपटने में एक दूसरे के सहारे पर भरोसा

स्वास्थ्य

भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाक़ों मेंलम्बे समय तक चलने वाली बीमारियों से जूझ रहे परिवार, अब केवल इलाज पर ही नहींबल्कि एक-दूसरे के सहारे पर भी भरोसा कर रहे हैं. जशपुर ज़िले के कई गाँवों मेंसहकर्मी सहायता समूह बैठकों के माध्यम से, सिकल सैल रोग (Sickle Cell Disease)मधुमेह और अस्थमा जैसी असंचारी बीमारियों से जुड़े डर और भ्रम को समझ एवं आत्मविश्वास में बदला जा रहा है.

हर कुछ सप्ताह में गाँवों के सामुदायिक भवनों और स्वास्थ्य केन्द्रों में होने वाली ये बैठकें, यूनीसेफ़ के सहयोग से और साझीदार संस्था संगवारी के प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता संचालित करते हैं. 

इन बैठकों में मरीज़ और उनके परिवार अपने अनुभव साझा करते हैं, सवाल पूछते हैं और बीमारी के लम्बे समय तक प्रबन्धन के व्यावहारिक तरीक़े सीखते हैं.

बैठकों के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ता स्थानीय बोलियों में मेडिकल रिपोर्ट समझाते हैं. वे लक्षणों की पहचान, दवाओं की नियमित ख़ुराक़ और समय पर इलाज लेने के महत्व के बारे में मार्गदर्शन देते हैं, जिससे डर व अनिश्चितता के स्थान पर, जानकारी एवं भरोसा अपनी जगह बनाते हैं.

भारत के छत्तीसगढ़ के जाशपुर जिले के सीएचसी बाग़ीचा में सिकल सैल रोग के मरीज़ों और उनके परिवारों के लिए एक सहकर्मी सहायता समूह की बैठक आयोजित की गई है. प्रतिभागी, ज़िला स्वास्थ्य सलाहकारों के मार्गदर्शन में विकास, चिन्ताओं और व्यक्तिगत अनुभवों पर चर्चा करने के लिए, हरे रंग की एक चटाई पर बैठे हैं.
© UNICEF/Mithila Jariwala
सिकल सेल रोग के लिए सहकर्मी सहायता समूह की बैठक महीने में एक बार आयोजित की जाती है.

'अब बीमारी एक जानी-पहचानी चुनौती है'

संगीता बाई को अपने दो छोटे बच्चों में सिकल सैल रोग होने का पता, दिसम्बर 2024 में चला. वह बताती हैं कि इन बैठकों ने उनका जीवन बदल दिया है.

वह कहती हैं, “पहले मैं हमेशा चिन्तित रहती थी. मेरा छोटा बच्चा पैरों में दर्द से रोता था, लेकिन हमें वजह समझ में नहीं आती थी. अगर स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर जाँच के लिए नहीं आते, तो शायद हमें कभी पता ही नहीं चलता.”

हालाँकि शुरुआत में बीमारी का पता चलना डरावना था, लेकिन अब संगीता ख़ुद को हालात सम्भालने में सक्षम महसूस करती हैं.

वह कहती हैं, “अब बीमारी एक जानी-पहचानी चुनौती है. मुझे पता है कब डॉक्टर के पास जाना है, और मैं अन्य माता-पिता को भी बच्चों की जाँच कराने के लिए प्रेरित करती हूँ.”

मरीज़ से प्रेरक तक का सफ़र

गीता भगत को तीन वर्ष पहले यह जानकारी मिली कि उनकी 13 वर्षीय बेटी ईशा को सिकल सैल रोग है. पहले उसे कई बार रक्त चढ़वाना पड़ा, लेकिन नियमित दवाओं के बाद अब उसकी स्थिति स्थिर है.

गीता बताती हैं, “पहले हमें ज़िला अस्पताल तक 30 किलोमीटर जाना पड़ता था. अब हमें दवाएँ यहाँ के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में ही मिल जाती हैं. इससे ज़िन्दगी बहुत आसान हो गई है.”

भारत के छत्तीसगढ़ के जाशपुर ज़िले के बाग़ीचा में, सिकल सैल रोग से पीड़ित एक 13 वर्षीय लड़की ईशा भगत, अपनी माँ गीता भगत के साथ, अपने घर पर बैठी हैं. ईशा अपनी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है जबकि उसकी माँ उसे दवा दे रही है. वे सुलभ स्वास्थ्य देखभाल और  उनकी स्थिति का प्रबन्धन करने और अपने गाँव में जागरूकता फैलाने में, यूनीसेफ़ के समर्थन के लिए आभारी हैं.
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सिकल सैल रोग से पीड़ित 13 वर्षीय ईशा भगत, अपनी माँ के साथ.

वह संगवारी टीम की सराहना करती हैं, जिसने उन्हें मेडिकल रिपोर्ट और रक्त स्तर समझना सिखाया. “पहले ये आँकड़े मुझे समझ में नहीं आते थे. अब मैं अन्य लोगों को भी जाँच कराने के लिए प्रेरित करती हूँ.”

गीता 13 वर्षीय किशन से भी प्रेरित हैं, जो बैठकों में अकेले आता है, अपनी दवाएँ ख़ुद लेता है और अपनी स्वास्थ्य पुस्तिका नियमित रूप से भरता है. दो साल पहले घर-घर जाँच के दौरान उनकी बीमारी की पहचान हुई थी. 

किशन कहते हैं, “अन्य लोगों की कहानियाँ सुनकर मुझे ताक़त मिलती है.”

ज़मीनी स्तर पर भरोसे की अहमियत

संगवारी की एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ऋतु मंडल, इन बैठकों को सफल बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं.

वह कहती हैं, “हम केवल बैठकें ही आयोजित नहीं करते. हम मरीज़ों को दवाएँ लेने के बारे में याद दिलाते हैं और अगर वे स्वास्थ्य केन्द्र नहीं आ पाते, तो हम दवाएँ लेकर उनके घर जाते हैं.”

उनके अनुसार, भरोसा बनाने में समय लगता है. “जब लोग देखते हैं कि हम सच में उनकी परवाह करते हैं, तब वे हमारी बात सुनने लगते हैं.”

सिकल सैल रोग के लिए एक स्टाफ़ नर्स सलाहकार, ऋतु मंडल, भारत के छत्तीसगढ़ के झापिदरहा गांव में, एक 13 वर्षीय लड़के किशन कुमार को मुफ़्त मासिक दवाएँ प्रदान करते हैं. किशन कुमार अपने सौतेले भाई के साथ बैठा नज़र आ रहा है, और नर्स इलाज के बारे में बता रही है. यूनीसेफ़ इस सामुदायिक स्वास्थ्य पहल का समर्थन कर रहा है.
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छत्तीसगढ़ में सिकल सैल रोग की नर्स ऋतु मंडल, 13 वर्षीय किशन कुमार को उसकी निःशुल्क मासिक दवाइयाँ देते हुए.

साझा प्रयास, स्थाई असर

मई 2024 से, ये सहकर्मी सहायता समूह बैठकें, यूनीसेफ़, ज़िला स्वास्थ्य विभाग और छत्तीसगढ़ सरकार के संयुक्त प्रयास का अहम हिस्सा बन चुकी हैं, जिन्हें संगवारी द्वारा ज़मीनी स्तर पर लागू किया जा रहा है. 

कार्यक्रम का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, परामर्श देना और इलाज से जुड़ी सही जानकारी पहुँचाना है, ख़ासतौर पर उन इलाक़ों में जहाँ डर या झिझक इलाज में बाधा बन सकती है.

यूनीसेफ़, भारत सहित संसाधन-सीमित क्षेत्रों में स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत करने के प्रयासों का समर्थन कर रहा है, ताकि बच्चों और युवाओं में असंचारी बीमारियों की रोकथाम व बेहतर प्रबन्धन सम्भव हो सके.

संगीता बाई कहती हैं, “पहले हम डरते थे. अब हम बात सुनते हैं, साझा करते हैं और सीखते हैं, वो भी एक-दूसरे के साथ-मिलकर.”

इन बैठकों ने न केवल बीमारी के बारे में समझ बढ़ाई है, बल्कि समुदायों को एक-दूसरे का सहारा बनने की ताक़त भी दी है.