ICJ: 'म्याँमार के ख़िलाफ़ रोहिंग्या जनसंहार' मामले की सुनवाई शुरू
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में, म्याँमार में रोहिंग्या लोगों के जनसंहार के आरोपों के मामले में, देश के ख़िलाफ़ मुक़दमे की ऐतिहासिक सुनवाई सोमवार को शुरू हुई है. यह मामला गाम्बिया ने म्याँमार के ख़िलाफ़ दायर किया है, जिसमें म्याँमार की सेना द्वारा, रोहिंग्या अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ किए गए क्रूर व्यवहार में, जनसंहार कन्वेंशन का उल्लंघन किए जाने का आरोप लगाया गया है.
नैदरलैंड्स के हेग स्थित पीस पैलेस में आयोजित ये कार्यवाहियाँ, प्रारम्भिक क़ानूनी बहसों के अनेक वर्षों बाद, इस मामले के गुण-दोष (merits) चरण की शुरुआत हैं.
आगामी तीन सप्ताहों के दौरान चलने वाली इस सुनवाई में, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश दोनों पक्षों की मौखिक दलीलें सुनेंगे, गवाहों और विशेषज्ञों का विश्लेषण करेंगे.
इसके बाद, यह राय देंगे कि क्या म्याँमार ने जनसंहार अपराध की रोकथाम और दंड से सम्बन्धित कन्वेंशन के तहत अपने दायित्वों का उल्लंघन किया है. म्याँमार भी इस कन्वेंशन का पक्षकार है.
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष न्यायाधीश इवासावा यूजी ने, सुनवाई की शुरुआत करते हुए कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी.
उन्होंने बताया कि कार्यवाही के दौरान गाम्बिया और म्याँमार द्वारा दलीलों के दो-दो चरण पेश किए जाएँगे. साथ ही, आवेदक देश द्वारा बुलाए गए गवाहों की गवाही सुनने के लिए, बन्द सत्र भी आयोजित किए जाएँगे.
गाम्बिया की ओर से पक्ष रखते हुए, देश के अटॉर्नी जनरल और न्याय मंत्री दाउदा जल्लो ने न्यायालय को बताया कि उनकी सरकार ने, यह मामला म्याँमार के राख़ीन प्रान्त में रहने वाले मुस्लिम अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ किए गए, “अत्यन्त क्रूर और अमानवीय मानवाधिकार उल्लंघनों” से जुड़ी विश्वसनीय रिपोर्टों की समीक्षा के बाद दायर किया है.
उन्होंने कहा, “हर दृष्टि से यह मामला केवल अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के जटिल सैद्धान्तिक प्रश्नों से नहीं जुड़ा है. यह असली लोगों, उनकी सच्ची कहानियों और एक वास्तविक मानव समुदाय से सम्बन्धित है.”
2019 में मामला हुआ दायर
ग़ौरतलब है कि गाम्बिया ने, नवम्बर 2019 में यह मामला दायर किया था, जिसमें म्याँमार पर आरोप लगाया गया कि उसके सैन्य बल या ततमादॉव द्वारा किए गए तथाकथित “सफ़ाई अभियान” के दौरान जनसंहार अपराधों की रोकथाम और दंड से जुड़े कन्वेंशन का उल्लंघन किया गया.
ये सैन्य अभियान, वर्ष 2017 में अत्यन्त तेज़ हो गए थे, जिसकी वजह से व्यापक हत्याओं, यौन हिंसा, गाँवों में आगज़नी और अन्य गम्भीर अत्याचारों के मामले सामने आए.
इन हालात के बीच, देश में रह रहे 7 लाख से अधिक रोहिंग्या लोग, अपने घर छोड़कर पड़ोसी देश बांग्लादेश भागने को मजबूर हुए.
तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ज़ाइद राआद अल-हुसैन ने, उस समय इस स्थिति को “नस्लीय सफ़ाए का एक पाठ्यपुस्तक उदाहरण” क़रार दिया था.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा गठित एक तथ्य-खोजी मिशन ने, वर्ष 2018 में कहा था कि उसके पास यह निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस और विश्वसनीय आधार हैं कि म्याँमार में अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत गम्भीर अपराध किए गए हैं, जिनमें जनसंहार, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध और युद्ध अपराध शामिल हैं.
आज भी लगभग 10 लाख रोहिंग्या लोग, बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अनगिनत अन्य लोग, म्याँमार के भीतर ही विस्थापित हैं या अत्यन्त दयनीय परिस्थितियों में फँसे हुए हैं.
अस्थाई उपाय
जनवरी 2020 में, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने सर्वसम्मति से अस्थाई उपायों का आदेश दिया था.
इसके तहत म्याँमार को, रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़, किसी भी जनसंहारक कृत्य को रोकने के लिए अपनी क्षमता के भीतर सभी आवश्यक क़दम उठाने, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और इन आदेशों के अनुपालन की नियमित रिपोर्ट अदालत को सौंपने का निर्देश दिया गया.
हालाँकि म्याँमार ने अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी, लेकिन जुलाई 2022 में न्यायाधीशों ने यह फ़ैसला सुनाया कि अदालत इस मामले की सुनवाई करने के लिए सक्षम है.
इसके अलावा, 11 देशों ने जनसंहार सम्मेलन की व्याख्या को लेकर गाम्बिया के पक्ष में लिखित प्रस्तुतियाँ भी दाख़िल की हैं.
जवाबदेही और व्यापक परिप्रेक्ष्य
गाम्बिया के अटॉर्नी जनरल और न्यायमंत्री जल्लो ने, न्यायाधीशों को सम्बोधित करते हुए कहा कि म्याँमार अब भी “अत्याचारों और दंडमुक्ति के एक चक्र” में फँसा हुआ है, जहाँ रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों के लिए, अब तक किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया गया है.
उन्होंने फ़रवरी 2021 में हुए सैन्य तख़्तापलट का भी ज़िक्र किया, जिसके तहत, निर्वाचित सिविल सरकार को अपदस्थ कर दिया गया और देश एक बार फिर व्यापक हिंसा और युद्ध की चपेट में चला गया.
दावदा जल्लो ने ज़ोर देते हुए कहा कि जवाबदेही अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि दंडमुक्ति की स्थिति में ऐसे भीषण अपराधों के दोबारा होने का ख़तरा बना रहता है.
म्याँमार की दलीलें
म्याँमार इस सप्ताह के बाद, अपनी दलीलें पेश करना शुरू करेगा. यह सुनवाई पूरी होने के बाद, न्यायालय का अन्तिम फ़ैसला आने में कई महीने या उससे अधिक समय लग सकता है, और यह निर्णय क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होगा.
ग़ौरतलब है कि अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ), संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है. यह देशों के बीच क़ानूनी विवादों का निपटारा करता है और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून से जुड़े प्रश्नों पर परामर्शात्मक राय देता है.
आपराधिक अदालतों के विपरीत, यह न्यायालय किसी व्यक्ति पर मुक़दमा नहीं चलाता, बल्कि देशों की न्यायिक ज़िम्मेदारी तय करता है.