म्याँमार के चुनाव ‘एक नाटकीय प्रदर्शन’, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह करने की कोशिश
म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर टॉम एंड्रयूज़ ने, देश में हो रहे चुनावों को अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से स्पष्ट रूप से रद्द करने की अपील की है. उन्होंने सैन्य शासन और उसके नेताओं को अलग-थलग करने के प्रयास तेज़ करने, और चुनाव प्रक्रिया को तुरन्त रद्द कराने के लिए, उन पर दबाव डालने की भी मांग की है.
मानवाधिकारों पर स्वतंत्र विशेषज्ञ टॉम एंड्रयूज़ ने गुरूवार को कहा है कि 28 दिसम्बर को हुए प्रथम चरण के मतदान के परिणामों ने, यह स्पष्ट कर दिया है कि यह चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष या वैध नहीं है.
उन्होंने कहा, “हर मानक पर यह एक चुनाव नहीं, बल्कि एक नाटकीय प्रदर्शन है, जिसका उद्देश्य अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह करना है.”
मतदान दर बेहद कम
टॉम एंड्रयूज़ के अनुसार, 28 दिसम्बर को हुए चुनाव के प्रथम चरण में मतदान दर बेहद कम रहा, बावजूद इसके कि सैन्य नेतृत्व ने लोगों पर दबाव डाला था और प्रतिशोध का भय फैला रखा था.
वर्ष 2015 और 2020 के आम चुनावों में भारी जीत हासिल करने वाली नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी (NLD) को सैन्य नेतृत्व द्वारा भंग किए जाने के बाद मतपत्र में शामिल ही नहीं किया गया.
ग़ौरतलब है कि 1 फ़रवरी 2021 को, म्याँमार की सेना ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई तत्कालीन सरकार को, सत्ता से बेदख़ल कर दिया था और राष्ट्रपति, स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची समेत सैकड़ों अधिकारियों, राजनैतिक नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था.
इसके बाद से ही देश, मानवीय व मानवाधिकारों के संकट से जूझ रहा है, जोकि समय बीतने के साथ और अधिक गहरा हुआ है.
म्याँमार सैन्य तख़्तापलट के चार वर्ष बाद भी लगातार हिंसक टकराव की चपेट में है जिससे लाखों लोग विस्थापन के शिकार हुए हैं, खाद्य सुरक्षा व अर्थव्यवस्था बेहाल है, हवाई बमबारी में घर-परिवार तबाह हुए हैं और लोगों को जबरन सैनिकों के रूप में भर्ती किए जाने के मामले भी सामने आए हैं.
NLD नेता आंग सान सू ची तख़्तापलट के बाद से हिरासत में हैं, जबकि उनके ठिकाने और स्वास्थ्य स्थिति को लेकर अब भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.
ये चुनाव स्वतंत्र या विश्वसनीय नहीं
आधिकारिक परिणामों के अनुसार, सैन्य शासन द्वारा समर्थित यूनियन एकजुटता और विकास पार्टी ने संसद के निचले सदन की लगभग 90 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज की.
विशेष रैपोर्टेयर टॉम एंड्रयूज़ का कहना है कि सैन्य शासन में शामिल अधिकारियों ने विस्थापित लोगों, छात्रों, सरकारी कर्मचारियों, कै़दियों और आम नागरिकों पर मतदान के लिए दबाव बनाया.
साथ ही, मानवीय सहायता, शिक्षा, प्रवासन दस्तावेज़ और सरकारी सेवाएँ रोकने की धमकियों का इस्तेमाल किया गया.
उन्होंने कहा कि “युवाओं को जबरन भर्ती की धमकी देकर वोट डालने को मजबूर किया गया. यह राजनैतिक भागीदारी नहीं, बल्कि खुला दबाव है.”
मानवाधिकारों पर स्वतंत्र विशेषज्ञ ने कहा कि जब हज़ारों राजनैतिक कै़दी कारावास में बन्द हों, विपक्षी दलों को समाप्त कर दिया गया हो, पत्रकारों की आवाज़ दबा दी गई हो और बुनियादी स्वतंत्रताओं को कुचल दिया गया हो, और ऐसे में किसी भी चुनाव को स्वतंत्र या विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता.
मानवाधिकार विशेषज्ञ
ग़ौरतलब है कि यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञ और विशेष रैपोर्टेयर, संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं, वो किसी देश या सरकार से स्वतंत्र होते हैं और अपनी व्यक्तिगत हैसियत में काम करते हैं.
उन्हें जिनीवा स्थित यूएन मानवाधिकार परिषद, किसी देश या विशेष मानवाधिकार स्थिति की जाँच पड़ताल करके, रिपोर्ट सौंपने के लिए नियुक्त करती है.
विशेष रैपोर्टेयर और स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों को अपना काम करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से कोई वेतन इत्यादि नहीं मिलता है.
विरोधियों पर कड़ी क़ानूनी कार्रवाई
म्याँमार की राष्ट्रीय मीडिया के हवाले से बताया गया है कि सैन्य नेतृत्व ने चुनाव की आलोचना या विरोध करने के आरोप में, 200 से अधिक लोगों पर कड़े चुनाव क़ानून के तहत मुक़दमे दर्ज किए हैं. इन मामलों में दोषी पाए जाने पर 49 साल तक की जेल की सज़ा का प्रावधान है.
विशेष रैपोर्टेयर एंड्रयूज़ ने कहा कि जबरन मतदान कराए जाने के बढ़ते सबूत बेहद चिन्ताजनक हैं. सेना समर्थित पार्टी की भारी जीत किसी के लिए आश्चर्य की बात नहीं है.
उन्होंने कहा कि “यह चुनाव सैन्य शासन ने इस तरह रचा कि उसकी सत्ता और नियंत्रण बना रहे और वैधता का एक झूठा आवरण तैयार किया जा सके.
वहीं, चुनाव के अगले दो चरण 11 और 25 जनवरी को होने हैं. सैन्य शासन ने पहले ही 65 नगरपालिका क्षेत्रों और हज़ारों वार्ड व गाँवों में मतदान नहीं कराने का निर्णय ले लिया है, जो देश के बड़े हिस्सों पर उनके नियंत्रण की कमी को दर्शाता है. जबकि हिंसा और दमन जारी है.”
म्याँमार का भविष्य उसके लोगों का...
मानवाधिकारों पर स्वतंत्र विशेषज्ञ ने उन देशों की सराहना की, जिन्होंने चुनावों को रद्द करने का संकेत दिया है, वहीं उन कुछ देशों पर चिन्ता भी जताई जिन्होंने पहले चरण के मतदान में पर्यवेक्षक भेजे और इस प्रक्रिया को वैधता दी.
उन्होंने कहा कि “लोकतंत्र और मानवाधिकारों का समर्थन करने वाले देशों को म्याँमार के लोगों के पक्ष में स्पष्ट और सैद्धान्तिक रुख़ अपनाना चाहिए.”
विशेष रैपोर्टेयर टॉम एंड्रयूज़ ने ज़ोर देकर कहा कि म्याँमार का भविष्य उसके लोगों का है, न कि उन लोगों का जो उन्हें कै़द करते हैं, चुप कराते हैं और आतंकित करते हैं.