वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
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प्रकृति के साथ नए रिश्ते गढ़ते देश और समुदाय

© Unsplash/James Wainscoat
हमिंगबर्ड पक्षी जैकरांडा के पेड़ से भोजन करते हुए.

प्रकृति के साथ नए रिश्ते गढ़ते देश और समुदाय

जलवायु और पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पृथ्वी गम्भीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, जो अरबों लोगों के भविष्य को ख़तरे में डाल सकता है. रिपोर्ट में इस संकट से निपटने के लिए व्यापक और ठोस बदलावों की ज़रूरत बताई गई है.

Global Environment Outlook’ में कहा गया है कि इस संकट से निपटने के लिए मानवता को अर्थव्यवस्थाओं के संचालन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, कचरा प्रबन्धन, ऊर्जा उत्पादन, भोजन के उत्पादन और उपभोग, तथा पर्यावरण के प्रति अपने व्यवहार में बड़े और ठोस बदलाव करने होंगे.

हालाँकि रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि यह कार्य असम्भव नहीं है. लगभग 300 बहु-विषयक वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के कई हिस्सों में समुदाय पहले ही अहम प्रणालियों को नए सिरे से गढ़ना शुरू कर चुके हैं. शुरुआती नतीजे बताते हैं कि पर्यावरण की रक्षा करते हुए नए अवसर पैदा करना सम्भव है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के विज्ञान कार्यालय में सेवा प्रमुख मार्टेन कैपेल्ले कहते हैं, “अक्सर लोग मानते हैं कि इसके लिए पर्यावरण या अर्थव्यवस्था में से एक ही विकल्प चुनना होगा. लेकिन ऐसी अर्थव्यवस्था बनाई जा सकती है जो लोगों और धरती दोनों को लाभ पहुँचाए. वास्तव में, यह काम बुर्कीना फ़ासो से लेकर भारत तक किया जा रहा है.”

नीचे ऐसे चार उदाहरण दिए गए हैं, जहाँ इस तरह के बदलाव ज़मीन पर दिखाई दे रहे हैं.

भारत के ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान में बंगाल टाइगर.
© Gregoire Dubois
भारत के ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान में बंगाल टाइगर.

भारत: संरक्षण और विकास का मेल

भारत में विश्व-प्रसिद्ध पेरियार टाइगर अभयारण्य ( Reserve) के आसपास बसे आदिवासी समुदाय, लम्बे समय तक रोज़गार की कमी और ग़रीबी से प्रभावित रहे. लेकिन 1990 के दशक के अन्त में सरकार और दाता समूहों ने एक साझा पहल शुरू की, जिसके ज़रिये विकास और संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाया गया.

लगभग 2 लाख आदिवासी समुदाय के सदस्यों को वन्यजीव मार्गदर्शक और वन रक्षक बनने का प्रशिक्षण दिया गया. इससे एक ओर रिज़र्व में मौजूद संकटग्रस्त बड़ी बिल्लियों की प्रजातियों की सुरक्षा मज़बूत हुई. 

वहीं दूसरी ओर, क्षेत्र में पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा मिला. इस पहल से कई स्थानीय परिवारों के लिए रोज़गार और आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित हुई.

चीन: इलैक्ट्रॉनिक कचरे में छिपे नए अवसर

1990 के दशक में चीन लम्बे समय तक इलैक्ट्रॉनिक कचरे का बड़ा केन्द्र बना रहा. इसका बड़ा हिस्सा विदेशों से अवैध रूप से आया था. पुराने कम्प्यूटरों से लेकर रैफ़्रिजरेटर तक, तरह-तरह का इलैक्ट्रॉनिक कचरा, कूड़ा स्थलों में जमा होता रहा. इससे ज़हरीले रसायन मिट्टी और जल स्रोतों में फैलने लगे.

पिछले दो दशकों में चीन में 100 से अधिक लाइसेंस प्राप्त इलैक्ट्रॉनिक कचरा री-सायकलिंग कम्पनियाँ विकसित की गई हैं. आज ये कम्पनियाँ सर्किट बोर्ड, टोनर कार्ट्रिज और कई तरह के इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों को री-सायकिल करती हैं.

इससे पारा जैसे ज़हरीले रसायन पर्यावरण में फैलने से रुके हैं और हज़ारों लोगों को रोज़गार मिला है. वर्ष 2020 तक, चीन में बनने वाले इलैक्ट्रॉनिक कचरे का लगभग 50 प्रतिशत री-सायकिल किया जा रहा था.

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© Seychelles Tourism Board/Ennio Maffei
सेशेल्स के एक राष्ट्रीय उद्यान, क्यूरियस द्वीप के समुद्र तट पर एक विशाल कछुआ पानी की ओर बढ़ते हुए.

सेशेल्स: क़र्ज़ से संरक्षण की ओर

2010 के दशक के मध्य में हिन्द महासागर का छोटा द्वीपीय देश सेशेल्स भारी क़र्ज़ के दबाव में था और अपने ऋणदाताओं से राहत की तलाश में था. इसी दौरान, उसने एक ऐसा विशेष समझौता किया, जिससे अर्थव्यवस्था को सहारा मिला और उसके जैव-विविधता से समृद्ध तटीय जलक्षेत्र का संरक्षण भी सम्भव हुआ.

‘द नेचर कंजरवेंसी’ नामक अमेरिकी संरक्षण संगठन ने सेशेल्स का 1.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर का क़र्ज़ ख़रीदने पर सहमति दी. इसके बदले, सेशेल्स ने अपने तट के आसपास कई समुद्री संरक्षित क्षेत्र स्थापित करने का वादा किया.

सेशेल्स ने इस ‘क़र्ज़ के बदले प्रकृति’ समझौते के ज़रिये, अपने समुद्री क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित किया है. वर्ष 2015 में यह हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम था.

निजेर में एक महिला पहले क्षरण का शिकार हो चुकी भूमि में सब्ज़ियाँ उगा रही है.
© UNHCR/Colin Delfosse
निजेर में एक महिला पहले क्षरण का शिकार हो चुकी भूमि में सब्ज़ियाँ उगा रही है.

अफ़्रीका: सहारा का विस्तार रोकने की कोशिश

अफ़्रीका के साहेल क्षेत्र में खेती दशकों से एक बड़ी चुनौती रही है. यह अर्ध-शुष्क इलाक़ा सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी हिस्से से लगा हुआ है. जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते सूखे और अनियमित बारिश ने फ़सलों को भारी नुक़सान पहुँचाया है. हाल के वर्षों में इससे अकाल जैसी स्थितियाँ भी पैदा हुई हैं.

लेकिन हाल के वर्षों में बुर्कीना फ़ासो से लेकर केनया तक के किसानों ने एक पारम्परिक खेती का तरीक़ा अपनाया है, जिसे ‘ज़ाई’ कहा जाता है. 

यह तकनीक हालात बदलने में मदद कर रही है. इस पर्यावरण-अनुकूल तरीक़े में किसान ख़राब हो चुकी मिट्टी में छोटे गड्ढे खोदते हैं और उनमें कम्पोस्ट या प्राकृतिक खाद डालते हैं. ये गड्ढे उपलब्ध थोड़े से पानी को रोककर रखते हैं, जिससे बीजों के लिए उपजाऊ ज़मीन बनती है.

कुछ किसान कठोर और सूखी ज़मीन को नरम करने के लिए दीमकों का भी सहारा लेते हैं. कहा जाता है कि इस तकनीक से फ़सल उत्पादन 500 प्रतिशत तक बढ़ सकता है.

हालाँकि, ये सफलताएँ अभी सीमित हैं और पर्याप्त नहीं हैं. सभी पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर प्रभावी समाधानों को लागू करने के लिए कहीं अधिक प्रयासों की आवश्यकता है.