मीडिया में महिलाओं की उचित मौजूदगी नहीं होने से, लोकतंत्र अधूरा
“मीडिया वास्तविकता को दर्शाता है और लोकतंत्र की नींव है. लेकिन जब उसमें महिलाओं की मौजूदगी नहीं होती है, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है.” ये शब्द यूएन महिला संस्था – UN Women की कार्यकारी उप निदेशक किर्सी माडी के हैं. सन्दर्भ है कि महिलाएँ, वैश्विक आबादी का आधा हिस्सा हैं, मगर इसके बावजूद समाचार जगत में उनकी उपस्थिति कम ही नज़र आती है.
एक हाल के वैश्विक अध्ययन के अनुसार, प्रसारण, रेडियो और प्रिंट मीडिया की ख़बरों में नज़र आने या सुनाई देने वाली आवाज़ों में, केवल एक-चौथाई महिलाएँ हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान, इस आँकड़े में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.
अन्तरराष्ट्रीय संचार अधिकार संगठन (WACC) द्वारा प्रकाशित 'वैश्विक मीडिया निगरानी परियोजना' (GMMP), मीडिया में लैंगिक प्रतिनिधित्व की स्थिति का आकलन करने पर केन्द्रित सबसे बड़ा और सबसे लम्बे समय से जारी अध्ययन है.
इस रिपोर्ट के अनुसार, ख़बरों के विषय या स्रोत के रूप में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 26 प्रतिशत है.
यूएन वीमेन के 'महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा समाप्त करने' से सम्बन्धित विभाग की प्रमुख कैलिओपी मिंगैरू ने यूएन न्यूज़ हिन्दी के साथ ख़ास बातचीत में कहा, “ख़बरों में दिखाई देने, सुनी या पढ़ी जाने वाली हर 4 पहचानों में केवल एक महिला होती है.”
कैलिओपी मिंगैरू कहती हैं, “इसका कारण यह नहीं कि महिलाओं में विशेषज्ञता या नेतृत्व क्षमता की कमी है. बल्कि, न्यूज़रूम के चलन, स्रोत चुनने के तरीक़े और संरचनात्मक पक्षपात में कोई बदलाव नहीं होना, इसकी वजह है. मीडिया में अकसर पहले से चली आ रही सीमित आवाज़ों को मंच दिया जाता है, और विशेषज्ञ या निर्णयकर्ता के रूप में पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है.”
कैलिओपी मिंगैरू ने कहा कि मीडिया सिर्फ़ वास्तविकता का आईना नहीं है, बल्कि इसे आकार भी देता है.
केवल लैंगिक मुद्दा नहीं, लोकतांत्रिक ख़ामी भी
इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि महिलाएँ उन समाचारों में अक्सर अदृश्य रहती हैं, जो जनमत और लोकतांत्रिक बहस को आकार देते हैं.
कैलीओपी मिंगैरू का कहना है कि, “लोकतंत्र, सूचित बहस और समावेशी निर्णय लेने पर निर्भर करता है. जब महिलाओं की आवाज़ें अदृश्य या ग़ायब रहती हैं, तो लोग एक तरफ़ की कहानी ही जान पाते हैं. इससे वास्तविकता विकृत होती है, जवाबदेही कमज़ोर पड़ती है और लोकतांत्रिक क्षेत्र संकुचित हो जाता है.”
उन्होंने कहा, “अगर मीडिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं होता, तो राजनीति, शान्ति, अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन के बारे में उनके दृष्टिकोण भी सामने नहीं आते हैं.”
कैलीओपी मिंगैरू के अनुसार, आज के समय में, जब लैंगिक समानता के विरुद्ध प्रतिरोध बढ़ रहा है, ख़बरों में महिलाओं को शामिल नहीं करना, केवल लैंगिक मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ख़ामी भी है.”
लैंगिक हिंसा से जुड़े मुद्दों की अनदेखी
रिपोर्ट में एक चिन्ताजनक तथ्य यह भी है कि लिंग-आधारित हिंसा का मुद्दा, समाचारों में लगभग नदारद है, जबकि दुनिया की आधी आबादी इससे प्रभावित है.
हर 100 में से केवल 2 समाचारों में ही, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की कवरेज होती है, जबकि कहीं अधिक संख्या में महिलाएँ इससे पीड़ित हैं.
इसके अलावा, हर 100 में से केवल 2 समाचारों में ही रूढ़ियों को चुनौती दी जाती है, जिससे मौजूदा पूर्वाग्रहों को फिर से बल मिलता है, और लैंगिक समानता हासिल करने के रास्ते में यह एक बड़ा अवरोध है.
कैलीओपी मिंगैरू ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा, केवल ‘महिलाओं का मुद्दा’ नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट है. इसके बावजूद, इस मुद्दे के बारे में कवरेज बहुत कम होती हैं. मीडिया को इसे समाज के सामने प्रमुख रूप से पेश करना चाहिए.
उन्होंने ज़ोर दिया कि समाचार सम्पादकों को पत्रकारों को प्रशिक्षण दिलाए जाने में निवेश करना चाहिए, और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को, ज़िम्मेदारी के साथ कवर करने के लिए विशेष संसाधन उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना चाहिए.
कुछ प्रगति भी…
हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में प्रगति हुई है. पारम्परिक समाचार रिपोर्टिंग में अब 41 प्रतिशत रिपोर्टर महिलाएँ हैं, जबकि 1995 में यह आँकड़ा 28 प्रतिशत था.
अध्ययन बताता है कि महिला पत्रकारों की द्वारा कवर की जाने वाली ख़बरों में महिलाओं की मौजूदगी नज़र आने की सम्भावना (29 प्रतिशत), पुरुष पत्रकारों द्वारा की जाने वाली कवरेज की तुलना में अधिक (24 प्रतिशत) है. इससे स्पष्ट है कि न्यूज़रूम में लैंगिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने से ख़बरों में सन्तुलन लाया जा सकता है.
कैलीओपी मिंगैरू कहती हैं, “जहाँ महिला पत्रकारों की मौजूदगी है, वहाँ खब़रों की प्रस्तुति बदल जाती है. न्यूज़रूम में महिला और पुरुष कर्मचारियों में समानता लाना, सन्तुलित और व्यापक ख़बरें पेश करने का सबसे स्पष्ट रास्ता है.”
‘ख़बर लहरिया’ बदल रहा है तस्वीर
वैश्विक न्यूज़रूम और सम्पादकीय बोर्डरूम की पहुँच से कोसों दूर, भारत के ग्रामीण इलाक़ों में, पिछले दो दशकों से पत्रकारिता का एक बिलकुल अलग मॉडल आकार ले रहा है.
वर्ष 2002 में स्थापित ख़बर लहरिया एक ऐसा मीडिया संगठन है जो पूरी तरह महिला संचालित है. इसमें कार्यरत दलित, आदिवासी और मुस्लिम समेत अनेक ग्रामीण महिला रिपोर्टर, भारत के सबसे वंचित क्षेत्रों से ख़बरें पहुँचा रही हैं.
इस संगठन की संस्थापक कविता देवी ने यूएन न्यूज़ हिन्दी के साथ बातचीत में बताया कि उन्हें शुरू में बहुत शंकाओं और विरोध का सामना करना पड़ा. ग्रामीण लोग सन्देह में थे कि क्या ये महिलाएँ पत्रकार बन सकती हैं. साथ ही, शिक्षा की कमी ने महिला पत्रकारों को काम पर रखना और भी मुश्किल बना दिया था.
कविता देवी बताती हैं, “हम हर स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रहे थे. लोग कहते थे कि महिलाएँ पत्रकार नहीं बन सकतीं. लेकिन हमने गाँव-गाँव जाकर मेहनत की और साबित किया कि महिलाएँ न केवल रिपोर्टिंग कर सकती हैं, बल्कि ऐसी कवरेज भी पेश कर सकती हैं, जो कोई और नहीं बता रहे थे.”
उस समय, उत्तर प्रदेश और बिहार के न्यूज़रूम में महिला पत्रकार लगभग नहीं के बराबर थीं. ख़बर लहरिया से जुड़ी अनेक महिलाओं की औपचारिक शिक्षा भी बहुत कम थी.
ऐसी ही एक पत्रकार श्यामकली हैं, जो अधिक शिक्षित नहीं थीं, लेकिन आज ख़बर लहरिया में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में काम कर रही हैं.
श्यामकली ने यूएन न्यूज़ हिन्दी के साथ अपनी शुरुआती रिपोर्टिंग के अनुभव साझा किए.
उन्होंने कहा, “मुझे न तो अपनी बायोडाटा (CV) बनाना आता था और न कैमरा सम्भालना, लेकिन प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के ज]रिए मैंने सब कुछ सीख लिया – इंटरव्यू करना, मोबाइल पत्रकारिता करना, और अब मैं ऐसी ख़बरें रिपोर्ट करती हूँ जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया अक्सर नज़रअन्दाज़ कर देती है.”
ख़बर लहरियाँ की रिपोर्टिंग केवल महिलाओं की उपस्थिति तक सीमित नहीं है.
श्यामकली एक ऐसी कहानी बताती हैं, जिसमें एक महिला, अत्याचार झेलने के बाद, हताशा में अपने पति के ख़िलाफ़ हिंसक क़दम उठाती है. उन्होंने उस महिला के पक्ष को सामने रखा, जिसे मुख्याधारा मीडिया में कोई जगह नहीं दी गई थी.
श्यामकली द्वारा की जा रही पत्रकारिता न केवल ख़बरों में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ाती हैं, बल्कि सामाजिक सन्दर्भ और वास्तविकता को उजागर करके, मुख्यधारा की मीडिया की अधूरी या पक्षपाती रिपोर्टिंग को सन्तुलित करती है.
ख़बर लहरिया अपनी ख़बरों को बुन्देली, अवधी और भोजपुरी जैसी स्थानीय बोलियों में प्रकाशित करके, ग्रामीण समुदायों तक आसान और सशक्त पहुँच सुनिश्चित करती हैं.
कविता बताती हैं, “जब हम मुद्दों को सम्बन्धित लोगों की भाषा में समझाते हैं, तो लोग इसे बेहतर समझ पाते हैं. वे ख़बरों में अपनी ही छवि देखते हैं, ख़ासकर महिलाएँ.”
हर ख़बर में महिलाओं की आवाज़…
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह है कि (महिलाओं का) विरोध किए जाने की मानसिकता वास्तविक है, प्रगति रुकी हुई है, और जवाबदेही को अब और नहीं टाला जा सकता है.
यूएन महिला संस्था की कार्यकारी उप निदेशक किर्सी माडी का कहना है, “यह निष्कर्ष चेतावनी भी है और कार्रवाई की पुकार भी…महिलाओं की आवाज़ के बिना न तो पूरी कहानी सामने आ सकती है,और न न्यायपूर्ण लोकतंत्र और न ही साझा भविष्य सम्भव हैं.”
किर्सी माडी कहती हैं, “महिलाओं और लड़कियों का हक़ है कि वे स्वयं को मीडिया में देखें और उनकी आपबीतियों को मीडिया में स्थान मिले.”
“इस समानता को साकार करने की ज़िम्मेदारी अब सरकारों, सम्पादकों, मीडिया मंचों और नीति-निर्माताओं की है. हम तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक हर न्यूज़रूम और हर ख़बर में महिलाओं की आवाज़ नहीं सुनाई देगी.”