भारत: लड़कियों के लिए छोटे-छोटे स्कूली कोनों से निकलती आत्मविश्वास की राह
भारत में यूनीसेफ़ और उसके साझीदारों के समन्वित प्रयासों से, ओडिशा के कन्धमाल में स्कूलों के छोटे-छोटे कोने, लड़कियों के लिए गरिमा, शिक्षा और बाल विवाह से मुक्ति का माध्यम बन रहे हैं. इस बदलाव से लड़कियों में आत्मविश्वास बढ़ने की नई राह निकली है.
भारत के पूर्वी घाट की पहाड़ियों में बसे ओडिशा के आदिवासी ज़िले कन्धमाल में बदलाव किसी बड़े अभियान या घोषणा के रूप में नहीं आया है. यह बदलाव स्कूलों के उन छोटे-छोटे कोनों से शुरू हुआ है, जहाँ लड़कियों को माहवारी के दौरान गरिमा और निजता मिली है - और वहीं से शिक्षा जारी रखने तथा बाल विवाह से बाहर निकलने का रास्ता भी खुला है.
आज लड़कियाँ बिना झिझक, बिना डर और पूरे आत्मविश्वास के स्कूल आ रही हैं. इसके साथ ही, बाल विवाह की दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.
इस परिवर्तन की नींव रखी - स्कूलों में शौचालय उपलब्ध कराने वाले स्वच्छ भारत मिशन ने. फिर प्रदेश सरकार की प्रमुख किशोर सशक्तिकरण पहल ‘एडविका’ (ADVIKA) ने इस प्रयास को आगे बढ़ाया.
यूनीसेफ़ और UNFPA के सहयोग से चल रहा यह कार्यक्रम, अब ओडिशा के सभी 30 ज़िलों में 25 लाख से अधिक किशोर-किशोरियों तक पहुँच चुका है.
सुरक्षित स्थान
कन्धमाल के आदिवासी समुदायों में माहवारी पर पीढ़ियों तक चुप्पी छाई रही है. इस दौरान बहुत सी लड़कियाँ स्कूल जाना छोड़ देती थीं. यौवन की शुरुआत से जुड़े पारम्परिक आयोजन, अक्सर विवाह की चर्चा की शुरुआत बन जाते थे.
दुतिमेंडी पंचायत हाई स्कूल की कक्षा 9 की छात्रा पायल को आज भी याद है कि उनके लिए पहले माहवारी का क्या मतलब होता था.
वो बताती हैं, “पहले मैं अपनी माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाती थी. बहुत झिझक होती थी. अब स्कूल में माहवारी प्रबन्धन (MHM) कोना है. वहाँ पैड हैं, बदलने की जगह है और शौचालय भी है. अब डर नहीं लगता.”
लड़कियों के शौचालय के पास बना यह MHM कोना साफ़-सुथरा और निजी स्थान है. यहाँ सैनिटरी पैड, पानी, सुरक्षित निस्तारण के लिए डिब्बे और ओड़िया तथा स्थानीय आदिवासी भाषाओं में जानकारी देने वाले पोस्टर उपलब्ध हैं.
यह सुविधा, यूनीसेफ़ के तकनीकी सहयोग से, स्कूल की दैनिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है.
यूनीसेफ़ ओडिशा की WASH विशेषज्ञ शिप्रा सक्सेना ने बताया, “लड़कियों को जो निजता और गरिमा मिली है, वही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है. वे अब आत्मविश्वास के साथ स्कूल आ रही हैं. यह जगह उनकी अपनी जगह बन गई है.”
शिक्षकों से हुई शुरुआत
दुतिपाड़ा सरकारी हाई स्कूल में प्रधानाध्यापिका अम्बिका प्रधान और शिक्षिका खुंटिया ने बदलाव की शुरुआत निर्माण से नहीं, बल्कि बातचीत से की.
अम्बिका प्रधान कहती हैं, “केवल कोना बनाना पर्याप्त नहीं था. लड़कियों को यह महसूस होना ज़रूरी था कि यह जगह सुरक्षित है.”
खुंटिया बताती हैं, “पहले लड़कियाँ, माहवारी के समय घर पर रहती थीं. अब वे स्कूल आती हैं, कक्षाओं में भाग लेती हैं और जो सीखती हैं, उसे दूसरों के साथ भी साझा करती हैं.”
इस पहल का सीधा असर स्कूल उपस्थिति पर पड़ा है. जब लड़कियाँ नियमित रूप से स्कूल में बनी रहती हैं, तो न केवल शिक्षा छूटने की सम्भावना कम होती है, बल्कि बाल विवाह का जोखिम भी घटता है.
स्कूलों में उपस्थिति बढ़ने का असर
दुबागड़ा गाँव की 14 वर्षीय साईस्मृति इस बदलाव की एक स्पष्ट मिसाल है. पारम्परिक रूप से, माहवारी की शुरुआत पर, अक्सर विवाह की बातचीत की शुरुआत के लिए 'बड़ा झिया हेला' अनुष्ठान किया जाता था.
साईस्मृति कहती है, “एडविका कार्यक्रम से मुझे अपने अधिकारों के बारे में मालूम हुआ. इससे मुझे बाल विवाह के लिए ‘नहीं’ कहने की हिम्मत मिली. मैंने अपने परिवार से कहा कि मैं पहले शिक्षा हासिल करना चाहती हूँ.”
उसकी माँ मेरुबासी बेहरा गर्व से बताती हैं, “पहले यह रस्म शादी की तैयारी मानी जाती थी. अब इसका मतलब है कि लड़की आगे की शिक्षा के लिए तैयार है.”
समन्वय से बना प्रभावी मॉडल
कन्धमाल के ज़िला शिक्षा कार्यालय ने, यूनीसेफ़ के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि ये प्रयास केवल बुनियादी ढाँचे तक सीमित नहीं रहें, बल्कि माता-पिता की सोच और व्यवहार में भी बदलाव लाएँ.
इसके तहत शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया, सहकर्मी नेतृत्व को बढ़ावा दिया गया और माहवारी प्रबन्धन को स्कूल स्वास्थ्य व जीवन-कौशल शिक्षा से जोड़ा गया.
यूनीसेफ़ ओडिशा के फ़िल्ड कार्यालय प्रमुख विलियम जे हैनलन कहते हैं, “माहवारी स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल संरक्षण को एक साथ जोड़कर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ओडिशा की हर लड़की आत्मविश्वास के साथ बड़ी हो सके और अपनी पूरी क्षमता को हासिल कर सके.”
राज्यभर में एडविका कार्यक्रम के तहत एक लाख से अधिक सहकर्मी नेता तैयार किए गए हैं और 14 हज़ार गाँवों को बाल-विवाह मुक्त घोषित किया जा चुका है.
कोनों से समुदाय तक
दुतिमेंडी और दुतिपाड़ा के स्कूलों के जो कोने कभी ख़ामोश थे, वे अब बातचीत और सीख के केन्द्र बन गए हैं. लड़कियाँ मिलकर साबुन भरती हैं, शिक्षक स्वच्छता व अधिकारों पर चर्चा करते हैं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियमित रूप से किशोरियों से सम्वाद करती हैं.
कन्धमाल में अब माहवारी स्वास्थ्य और बाल विवाह दो अलग-अलग विषय नहीं रहे. ये दोनों लड़कियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और भविष्य को लेकर होने वाली बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं.
पायल और साईस्मृति, शाम होने पर, अपने स्कूल बैग कन्धे पर टाँगे घर लौटती हैं - इस भरोसे के साथ कि अब उनका भविष्य उनके अपने हाथों में है.
यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.