ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आपसी वार्ता के ज़रिए समाधान ही 'सर्वोत्तम विकल्प'
ईरान के परमाणु कार्यक्रम व अप्रसार के मुद्दे पर गहन कूटनैतिक प्रयासों के बावजूद इस वर्ष की दूसरी छमाही में कोई समझौता नहीं हो पाया है. राजनैतिक एवं शान्तिनिर्माण मामलों के लिए यूएन अवर महासचिव रोज़मैरी डीकार्लो ने मंगलवार को सुरक्षा परिषद की बैठक को सम्बोधित करते हुए यह जानकारी दी है.
अवर महासचिव डीकार्लो ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने पुष्टि की है कि इस अवधि के दौरान, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए तयशुदा सीमाओं को पार कर लिया है, जोकि परमाणु समझौते (JCPOA/संयुक्त कार्रवाई व्यापक कार्ययोजना) के अनुरूप नहीं है.
ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के इरादे से 2015 में एक समझौते पर सहमति हुई थी, जिसे संयुक्त व्यापक कार्रवाई योजना (JCPOA) के नाम से जाना जाता है.
सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों – अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ़्राँस, रूस -- और जर्मनी के साथ ईरान की इस समझौते पर सहमति बनी थी, जिसे प्रस्ताव 2231 के ज़रिए समर्थन दिया गया.
IAEA का मानना है कि साझा सहमति के ज़रिए एक फ़्रेमवर्क को आकार दिया जाना ज़रूरी है, ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण बनाए रखा जा सके.
मंगलवार को परमाणु अप्रसार और ईरान की परमाणु गतिविधियों के विषय पर सुरक्षा परिषद की बैठक में राय विभाजित रही. 15 सदस्यों वाली परिषद में कुछ देशों ने ईरान पर फिर से प्रतिबन्ध थोपे जाने का समर्थन किया, जबकि अन्य का कहना है कि इन प्रतिबन्धों को स्थाई रूप से हटा लिया जाना चाहिए.
अवर महासचिव डीकार्लो ने सुरक्षा परिषद को ध्यान दिलाया कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष सर्वोत्तम विकल्प यही है कि बातचीत के ज़रिए सहमति बनाई जाए, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण बनाए रखा जाए और उसे प्रतिबन्धों से राहत भी मिले.
प्रस्ताव 2231 की अवधि 18 अक्टूबर 2025 को समाप्त हो गई थी. हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्राँस और सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों का तर्क है कि परमाणु समझौते को सम्भव बनाने वाला प्रस्ताव 2231 (2015) अब भी लागू है और इसलिए अप्रसार मुद्दे पर सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई जा सकती है.
फ़्राँस, जर्मनी और ब्रिटेन ने इस वर्ष अगस्त महीने में, JCPOA योजना के तहत संकल्पों का पालन करने का हवाला देते हुए ईरान पर फिर से प्रतिबन्ध थोप दिए थे.
इसके बाद, सितम्बर में ईरान को प्रतिबन्धों से राहत देने के लिए सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव को पेश किया गया था, मगर वह पारित नहीं हो पाया था. इस वजह से, परमाणु समझौते के तहत ईरान को जिन प्रतिबन्धों में ढील दी गई थी, उन्हें फिर से थोप दिया था.