सूडान युद्ध: ‘भयावह यौन हिंसा’ को नज़रअन्दाज़ न किए जाने की अपील
संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में सूडान के नॉर्थ दारफ़ूर प्रान्त में यौन हिंसा, बिना किसी सुनवाई के लोगों की हत्याओं समेत अन्य भयावह अत्याचार मामलों की जानकारी दी गई है, जिन्हें कथित रूप से अर्द्धसैनिक बल (RSF) द्वारा इस वर्ष अप्रैल में अंजाम दिया गया था.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) की नई रिपोर्ट दर्शाती है कि ज़मज़म विस्थापन शिविर में तीन दिनों तक RSF लड़ाकों के हमले के दौरान किस तरह से आम नागरिकों ने यातना व अगवा किए जाने की घटनाओं को सहा.
यूएन उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने बताया कि केवल ज़मज़म शिविर पर हुए हमले में 1,000 लोगों से अधिक लोगों को जान से मार दिया गया. इनमें से 319 लोगों की उनके घरों, स्कूलों, बाज़ारों, स्वास्थ्य केन्द्रों और मस्जिदों में बिना किसी सुनवाई के हत्या की गई.
“आम नागरिकों या व्यक्तियों या लड़ने में असमर्थ लोगों को इस तरह से सोच-समझकर जान से मारे जाने को हत्या के युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है...दुनिया को पीछे हटकर नहीं बैठना होगा, और न ही ऐसी क्रूरता को फैलने देना होगा.”
सूडान में सशस्त्र बलों और अतीत में उसके सहयोगी रहे अर्द्धसैनिक बल (RSF) के बीच, देश पर नियंत्रण के लिए अप्रैल 2023 में हिंसक टकराव भड़क उठा था, जिसमें जान-माल की भीषण हानि हुई है और सूडान एक गहरे मानवीय संकट से जूझ रहा है.
नॉर्थ दारफ़ूर प्रान्त का अल फ़शर शहर लड़ाई का एक प्रमुख केन्द्र था, जिसकी RSF लड़ाकों ने पिछले 1.5 साल से घेराबन्दी की हुई थी.
RSF लड़ाकों का वहाँ अक्टूबर में क़ब्ज़ा हो गया और वहाँ फँसे आम लोगों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर अत्याचारों को अंजाम दिए जाने की ख़बरें आईं, जिसके बाद, लड़ाई अब कोर्दोफ़ान क्षेत्र को अपने चपेट में ले रही है.
शिविर में आतंकित लोग
यूएन रिपोर्ट के अनुसार, RSF लड़ाकों द्वारा ज़मज़म शिविर में किए गए हमले के दौरान वहाँ 5 लाख विस्थापितों ने शरण ली हुई थी.
OHCHR कार्यालय का कहना है कि 11-13 अप्रैल के दौरान हुए इस हमले में RSF को उसके सहयोगी अरब मिलिशिया का समर्थन प्राप्त था, जिसमें भारी तोपखाने के साथ ज़मीनी हमले किए गए. इन हमलों में बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौत हुई और लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए.
सूडान के नॉर्थ दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल फ़शर और उसके नज़दीकी विस्थापन शिविरों पर मई 2024 से ही हमले होते रहे हैं, जिसके मद्देनज़र, मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने सितम्बर 2024 में ज़मज़म और अबू शौक शिविरों के लिए एक ऐलर्ट जारी किया था.
उन्होंने गुरुवार को अपने एक वीडियो सन्देश में कहा कि कम से कम 104 लोगों (75 महिलाएँ, 26 लड़कियाँ, 3 लड़के) को बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और यौन दासता समेत भयावह यौन हिंसा का शिकार बनाया गया. इनमें अधिकाँश ज़घावा जातीय समुदाय से थे.
“समुदाय में आतंक फैलाने के लिए ऐसा प्रतीत होता है कि यौन हिंसा को सोचे-समझे ढंग से अंजाम दिया गया.”
दर्दनाक व्यथा
रिपोर्ट में इन घटनाओं के भुक्तभोगियों की व्यथा को साझा किया गया है, जो दर्शाती हैं कि किस तरह से RSF लड़ाकों ने आम नागरिकों को निशाना बनाया, विस्थापितों को बिना किसी सुनवाई के ही मार दिया गया.
OHCHR ने अपने वक्तव्य में जीवित बचे एक सामुदायिक नेता का उल्लेख किया. उन्होंने बताया है कि RSF के दो लड़ाकों ने उनके कमरे की खिड़की में दो सुराख के ज़रिए बन्दूकें तानीं और गोलीबारी की. वे वहाँ 10 अन्य पुरुषों के साथ छिपे हुए थे, जिनमें से 8 की मौत हो गई.
एक महिला, घातक हमले के एक दिन बाद अपने 15 वर्षीय बेटे को ढूंढने के लिए अपने शिविर में लौटी थीं. उन्होंने बताया कि शिविर खाली था, वहाँ शव बिखरे हुए थे. केवल पशु, मवेशी घूम रहे थे. उन्हें अपना बेटा नहीं मिल पाया.
इस रिपोर्ट के निष्कर्ष यूएन मानवाधिकार निगरानी पर आधारित हैं, जिनमें चाड में एक फ़ील्ड मिशन भी है. इसके लिए 115 भुक्तभोगियों व प्रत्यक्षदर्शियों के साथ बातचीत की गई, जिनमें ज़मज़म शिविर से जान बचाकर भागने वाली 114 महिलाएं, 3 लड़कियाँ और 6 लड़के हैं.
उच्चायुक्त टर्क ने ज़मज़म शिविर पर हुए हमले की निष्पक्ष, विस्तृत जाँच कराए जाने और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के गम्भीर हनन मामलों की जवाबदेही तय किए जाने का आग्रह किया है.