भारत: बच्चों की समझ वाली भाषा में शिक्षा, जीवन की एक अहम शुरुआत
बच्चों के लिए उनकी समझ की भाषा में सीखना, समावेशी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में एक अहम क़दम साबित होता है. ऐसा कहना है यूनेस्को का, जिसने भारत में शिक्षा स्थिति रिपोर्ट 2025 का सातवाँ संस्करण जारी किया है. यह रिपोर्ट मातृभाषा और बहुभाषी शिक्षा के सम्बन्ध व सम्भावनाओं पर केन्द्रित है.
भारत में शिक्षा स्थिति पर 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा में भाषा केवल पढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि सीखने, समझने और समावेशन की नींव है.
भारत जैसे देश में, जहाँ 1,369 भाषाएँ बोली जाती हैं, बहुभाषी शिक्षा अपनाना ज़रूरी है, ताकि सभी बच्चे उस भाषा में सीख सकें जिसे वो समझते हों.
यूनेस्को के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक एवं प्रतिनिधि टिम कर्टिस कहते हैं, “मातृभाषा एवं बहुभाषी शिक्षा, समावेशी शिक्षा, भाषाई विविधता के संरक्षण और बेहतर सीखने के परिणामों की आधारशिला है. शिक्षा की शुरुआत बच्चों की अपनी भाषा या मातृभाषा में होनी चाहिए, ताकि वे बेहतर समझ सकें और आगे की शिक्षा में सफल हो सकें.”
रिपोर्ट में भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि यह नीति शिक्षा में भाषा की केन्द्रीय भूमिका को मानती है और बहुभाषा प्रयोग को मज़बूती से बढ़ावा देती है.
नीति के अनुसार, बच्चों की शुरुआती शिक्षा उनकी घर की भाषा, स्थानीय भाषा या किसी परिचित भाषा में होनी चाहिए. यह व्यवस्था कम से कम कक्षा पाँच तक, और सम्भव हो तो कक्षा आठ तक लागू रहने की सिफ़ारिश की गई है.
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार ने इस अवसर पर कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, बच्चों को उनकी मातृभाषा में सीखने को प्राथमिकता देती है. इससे बच्चों की समझ बेहतर होती है और सीखने की प्रक्रिया मज़बूत बनती है.
मज़ूबती का आधार
रिपोर्ट में भारत की अलग-अलग शैक्षिक परिस्थितियों में बहुभाषी शिक्षा के लागू होने की स्थिति पर नज़र डाली गई है. इसमें कक्षाओं के अनुभव, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल प्रयोग और समुदाय की भागेदारी वाले कार्यक्रमों से मिले प्रमाणों को शामिल किया गया है.
आदिवासी और ग्रामीण इलाक़ो के अध्ययन बताते हैं कि जब स्कूल बच्चों की घरेलू भाषाओं को अपनाते हैं, तो बच्चों की पढ़ने की समझ बढ़ती है. कक्षा में उनकी भागेदारी बेहतर होती है, और अवधारणाओं को समझने की क्षमता के साथ-साथ, आगे की पढ़ाई के लिए मज़बूत आधार भी बनता है.
यह रिपोर्ट, बहुभाषी शिक्षा पर वैश्विक मार्गदर्शन से प्रेरित है. इसका मक़सद शिक्षा मंत्रालयों और अन्य प्रमुख भागीदारों को ऐसी नीतियाँ और तरीक़े अपनाने में मदद देना है, जो शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी, समान एवं असरदार बना सकें.
चुनौतियाँ
रिपोर्ट में बताया गया है कि बहुभाषी शिक्षा को ज़मीन पर लागू करने में बहुत सी चुनौतियाँ भी हैं. जैसेकि शिक्षकों की तैयारी, भाषा से जुड़ी नीतियाँ और शिक्षा के लिए ज़रूरी सामग्री की कमी.
इन कमियों को दूर करने और काम की रफ़्तार बढ़ाने के लिए रिपोर्ट ने दस प्रमुख सिफ़ारिशें दी हैं जिनमें प्रमुख हैं...
- प्रदेश स्तर पर स्पष्ट भाषा नीतियाँ बनाना,
- बहुभाषी दक्षता वाले शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण मज़बूत करना,
- स्कूलों में समुदाय और स्थानीय ज्ञान की भागेदारी बढ़ाना,
- अच्छी गुणवत्ता वाली बहुभाषी किताबें व आकलन सामग्री तैयार करना,
- डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्था और भाषा आधारित तकनीक में निवेश करना
- मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय मिशन शुरू करना.