बढ़ती क़िल्लत और मांग में उछाल के बीच, जल संसाधनों पर गहराता दबाव
हर वर्ष, प्राकृतिक प्रकियाओं के माध्यम से, विश्व भर में नदियाँ, झीलें और भूगर्भ भंडार फिर से जल से समृद्ध हो जाते हैं. मगर, पिछले एक दशक में, बढ़ती मांग के बीच ताज़े जल की उपलब्धता में कमी आने का रुझान जारी है, और पहले से ही क़िल्लत से जूझ रहे संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है.
खाद्य एवं कृषि के लिए संयुक्त राष्ट्र संगठन (FAO) के एक नए अध्ययन के अनुसार, पिछले एक दशक के दौरान, प्रति व्यक्ति नवीकरणीय जल की उपलब्धता में 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, और यह 5,719 क्यूबिक मीटर से घटकर यह 5,326 क्यूबिक मीटर रह गई है.
2025 AQUASTAT Water Data Snapshot शीर्षक वाली यह रिपोर्ट दर्शाती है कि उत्तरी अफ़्रीका, दक्षिणी एशिया और पश्चिमी एशिया सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में हैं.
नवीकरणीय जल (renewable water) से तात्पर्य ताज़े जल के उन संसाधनों से है, जो जल चक्र के ज़रिए निरन्तर, पुन: प्राकृतिक रूप से पोषित होते हैं.
उदाहरण के लिए, इस चक्र में जल तरल अवस्था से पहले वाष्प में तब्दील होता है, फिर बादलों में वातावरण में एकत्र होता है, और फिर वर्षा या बर्फ़ के माध्यम से ज़मीन पर वापिस आता है. नदियों, झीलों और भूगर्भ जल के रूप में.
स्वाभाविक रूप से होने वाले नवीनीकरण की इस प्रक्रिया की वजह से ही वैज्ञानिकों ने जल को नवीकरणीय संसाधन माना है.
मगर, इसके बावजूद, मानव उपभोग के लिए जल की उपलब्धता अनेक कारकों से प्रभावित होती है, जैसेकि भौगोलिकता, जलवायु और जनसंख्या का आकार व मांग.
जल स्रोतों पर दबाव
एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर में 2 अरब से अधिक लोग ऐसे क्षेत्रों में बसे हैं, जहाँ जल संसाधनों पर भीषण दबाव है और जलवायु परिवर्तन के कारण यह चुनौती और गहरी हो जाने का जोखिम है.
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की नई रिपोर्ट में, विश्व भर में जल की उपलब्धता, सिंचाई समेत उसके उपयोग के तौर-तरीक़ों और बढ़ती मांग की वजह से उभरते दबाव के बारे में जानकारी दी गई है.
उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिमी एशिया समेत अन्य क्षेत्रों में ताज़े जल के अत्यधिक सीमित संसाधन हैं. क़तर, संयुक्त अरब अमीरा, कुवैत, यमन, मालदीव, और सऊदी अरब विश्व में प्रति व्यक्ति नवीकरणीय जल संसाधन के मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं.
पिछले कुछ वर्षों में, अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले ताज़े जल की मात्रा भी बढ़ी है, जिससे पहले से दबाव झेल रहीं नदी घाटियों और भूजल भंडारों (भूमि के नीचे एकत्र जल की परतें) पर दबाव बढ़ा है.
रिपोर्ट दर्शाती है कि विश्व भर में, कृषि सैक्टर में सबसे अधिक जल का उपयोग होता है, और अनेक क्षेत्रों में ताज़े जल के कुल इस्तेमाल में इसका हिस्सा 72 फ़ीसदी तक है. इसके बाद औद्योगिक (15 प्रतिशत) व सेवा सैक्टर (13 प्रतिशत) का स्थान है.
66 देशों में ये 75 प्रतिशत से अधिक ताज़े जल का उपयोग केवल कृषि कार्यों में किया जाता है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान, माली, नेपाल, सोमालिया व सूडान में यह 95 प्रतिशत तक है.
क्षेत्रीय रुझान, इस्तेमाल में बदलाव
यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व भर में जल की उपलब्धता और मांग में बदलाव दिखाई दे रहे हैं.
उत्तरी अफ़्रीका में, प्रति व्यक्ति ताज़े जल की उपलब्ध दुनिया में सबसे कम है, लेकिन उसका इस्तेमाल पिछले 10 वर्षों में 16 प्रतिशत तक बढ़ा है.
उधर, पश्चिमी एशिया में, आबादी में हुई वृद्धि और कृषि सैक्टर की मांग की वजह से सीमित आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है.
ऐसे क्षेत्र जहाँ जल की उपलब्धता तुलनात्मक रूप से अधिक है, वहाँ भी अर्थव्यवस्था के विभिन्न सैक्टर में मांग बढ़ रही है और शहरीकरण व कृषि के लिए सिंचाई समेत अन्य कारक इस मांग को हवा दे रहे हैं.
यूएन एजेंसी के डेटा में स्पष्ट किया गया है कि सिंचाई और जल संसाधन के उपयोग की दक्षता में विसंगतियाँ हैं.
लातिन अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में, कृषि उत्पादन में सिंचाई की बहुत हद तक भूमिका है, जबकि सब-सहारा अफ़्रीका में कम स्तर पर ही खेती में सिंचाई का उपयोग किया जाता है.
अध्ययन दर्शाता है कि अनेक क्षेत्रों में अब बेहतर ढंग से जल का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन उन देशों के लिए अब भी समस्याएँ हैं, जहाँ जल का इस्तेमाल, नवीकरणीय होने वाली जल की मात्रा से अधिक किया जा रहा है.
इसे ध्यान में रखते हुए, जल प्रबन्धन के सतत तौर-तरीक़ों को अपनाने पर बल दिया गया है, चूँकि प्रकृति के इस मूल्यवान संसाधन की मांग बढ़ती जा रही है.