अफ़ग़ानिस्तान: पाबन्दियों के बावजूद, महिलाओं के कारोबारी हौसले बुलन्द
अफ़ग़ानिस्तान में, तालेबान शासन के कड़े प्रतिबन्धों ने, अधिकांश महिलाओं को, सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया है. मगर, हज़ारों महिलाओं ने हार मानने से इनकार कर दिया है और अनेक महिलाएँ अपने हुनर का प्रयोग करके, रोज़ी-रोटी कमाने के तरीक़े निकाल रही हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में, अनेक महिलाओं के लिए छोटा व्यवसाय चलाना ही, आय का अब एकमात्र विकल्प बन गया है. साथ ही, ये कारोबार, उन अन्य महिलाओं का सहारा भी बनते हैं जिन्होंने अपना रोज़गार खो दिया है.
संयुक्त राष्ट्र की सहायता से, अनेक महिला उद्यमी अपने रोज़गार जारी रखे हुए हैं.
विशेषकर, उन हालात में जब उन्हें अकसर कड़े सामाजिक दबाव और घर से बाहर निकलने पर सख़्त पाबन्दियों का सामना करना पड़ता है.
छोटे व्यवसाय, एकमात्र रास्ता
परवीन ज़फ़र, मज़ार-ए-शरीफ़ नामक शहर में दर्ज़ी की एक दुकान चलाती हैं.
वह कहती हैं, “महिलाओं के लिए घर पर बैठना मुश्किल था. उन्हें अपने घरों से निकलकर सीखना पड़ता था.”
परवीन ज़फ़र का व्यवसाय उन कुछ जगहों में से एक है, जहाँ महिलाएँ सुरक्षित रूप से काम कर सकती हैं और अन्य को प्रशिक्षण दे सकती हैं.
हालाँकि महिलाओं पर, सरकारी रोज़गार, ग़ैर-सरकारी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों में काम करने की पाबन्दी है.
इसके बावजूद, अनेक महिलाएँ घर से या पारम्परिक रूप से महिलाओं से जुड़े व्यवसायों में, काम जारी रखने के तरीके़ तलाश रही हैं.
इनमें वस्त्र निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और कम्बल-बुनाई जैसे क्षेत्र शामिल हैं. ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय और तालेबान प्रशासन, दोनों व्यापक रूप से स्वीकृति देते हैं.
परवीन ज़फ़र कहती हैं, “अफ़ग़ान महिलाओं के लिए एकमात्र रास्ता, छोटे व्यवसाय ही हैं.”
UNDP दे रहा है समर्थन
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) इस रास्ते को बनाए रखने में मदद कर रहा है.
UNDP ने, अफ़ग़ानिस्तान में 89 हज़ार से अधिक छोटे उद्यमों का समर्थन किया है, जिनमें से 91 प्रतिशत महिलाओं द्वारा संचालित हैं. इससे 4 लाख 39 लाख से अधिक रोज़गार सृजित हुए हैं.
UNDP के मज़ार-ए-शरीफ़ क्षेत्र के लिए प्रबन्धक वाहीब अल एरयानी ने बताया कि “ये वे क्षेत्र हैं जहाँ महिलाएँ परम्परागत रूप से काम करती रही हैं. इन पारम्परिक व्यवसायों को कोई विरोध नहीं होता है.”
हालाँकि, यहाँ महिलाओं के काम करने स्वीकृति का मतलब यह नहीं है कि काम करना आसान है.
पारिवारिक दबाव भी एक बाधा
अनेक महिलाओं को, अब भी अपने घरों में विरोध का सामना करना पड़ता है. कुछ ऐसा ही अनुभव शाइस्ता हकीमी का रहा है.
तीन बच्चों की माँ शाइस्ता हकीमी एक रेस्तराँ चलाती हैं. शाइस्ता के पति का दो साल पहले निधन हो गया, जिसके बाद उन्होंने रेस्तराँ में काम करना शुरू किया.
मगर उनके ससुर ने उन पर, काम छोड़ने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया.
वो बताती हैं कि उनके ससुर कहते हैं कि लोग हमारा मज़ाक उड़ाएँगे कि उनकी बहू काम कर रही है.
शाइस्ता हकीमी ने तमाम विरोध के बावजूद अपना काम जारी रखा है. उनका रेस्तराँ केवल महिलाओं के लिए है, जो अब 18 महिलाओं के लिए आय का स्रोत भी है.
UNDP के ऋण की मदद से, शाइस्ता हकीमी ने अपने व्यवसाय को जीवित रखा और इसके विस्तार के लिए एक अन्य आवेदन भी कर रही हैं.
पुरुषों पर निर्भरता
अफ़ग़ानिस्तान में सबसे सफल महिला उद्यमियों को भी, पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भर रहना पड़ता है.
इसमें कुछ ऐसे आदेश शामिल हैं जैसे, महिलाएँ अपने पुरुष अभिभावक (मेहरम) के बिना यात्रा नहीं कर सकतीं. ये कड़े नियम महिलाओं के लिए, व्यवसाय करने से जुड़ी ज़रूरतों को गम्भीर रूप से सीमित कर देते हैं.
परवीन ज़फ़र बताती हैं कि “महिलाओं को अपने मेहरम रिश्तेदार के बिना कहीं जाने की अनुमति नहीं है… ख़ासकर जब हमें अपने उत्पाद अन्य प्रान्तों में पहुँचाने हों, तो हम ऐसा नहीं कर सकते.”
अनेक महिलाएँ, अपने व्यवसाय को बनाए रखने के लिए अपने पति, भाई या बेटों पर निर्भर रहती हैं, क्योंकि पुरुष स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकते हैं.
UNDP के वाहीब अल एरयानी कहते हैं कि “महिलाएँ, अपने नैटवर्क का प्रयोग करती हैं…अगर वे खुद बाज़ार तक नहीं पहुँच पातीं, तो पुरुष रिश्तेदार, उनके उत्पाद बेचते हैं या थोक विक्रेताओं के साथ सौदे निपटाते हैं.”
लम्बी है डगर...
बाज़ार और वित्तीय संसाधनों तक पहुँच अब भी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. केवल 4 प्रतिशत अफ़ग़ान महिलाएँ अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँच पाती हैं.
साथ ही, ऋण प्राप्त करने के लिए अकसर, गारंटर की ज़रूरत होती है, और इस रुकावट को कुछ महिलाएँ ही पार कर पाती हैं.
फिर भी महिलाएँ, UNDP द्वारा समर्थित उद्यमी नए चुनौतियों के बावजूद अपने व्यवसाय को जारी रखने के रास्ते ढूँढ रही हैं.
हाल ही में, ईरान और पाकिस्तान से बड़ी संख्या में अफ़ग़ानी लोग स्वदेश वापिस लौटे हैं, और कई महिला-प्रधान व्यवसायों ने, लौटने वाले लोगों को रोज़गार देने की पहल की है.
वाहीब अल एरयानी कहते हैं कि UNDP के समर्थन से, महिलाओं ने हर व्यवसाय में 20 से 40 तक ऐसे लोगों को रोज़गार दिया है जो स्वदेश वापिस लौटे हैं…वे अब मदद प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सहयोगी और सहायक बन गई हैं.”
अफ़ग़ान महिला उद्यमियों की जुझारू मेहनत के बावजूद, उनका भविष्य अनिश्चित है. लड़कियों को छठी कक्षा के बाद शिक्षा से वंचित किया गया है, जिससे अगली पीढ़ी व्यवसाय और वित्तीय प्रबन्धन के कौशल सीखने से वंचित रह जाएगी.
हालाँकि, ये महिलाएँ अपने समुदाय को जोड़ें रख रही हैं, रोज़गार और कौशल प्रदान कर रही हैं, लेकिन शिक्षा पर पाबन्दी और निरन्तर अन्तरराष्ट्रीय समर्थन के बिना, विकास का दायरा सिमट सकता है.