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यूनेस्को की अमूर्त साँस्कृतिक धरोहर सूची में दीपावली के नामांकन का जश्न मनाता भारतीय प्रतिनिधिमंडल.

दीपावली बनी वैश्विक धरोहर: यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल

© UNESCO/Paras Mendiratta
यूनेस्को की अमूर्त साँस्कृतिक धरोहर सूची में दीपावली के नामांकन का जश्न मनाता भारतीय प्रतिनिधिमंडल.

दीपावली बनी वैश्विक धरोहर: यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल

संस्कृति और शिक्षा

भारत और दुनिया भर में बसे लाखो-करोड़ों लोगों के लिए दीपावली की रौशनी अब और भी ख़ास हो गई है. यूनेस्को ने, नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल क़िले में हुई बैठक में, दीपावली को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची’ में शामिल करने की घोषणा की है.

यह निर्णय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (ICH) की सुरक्षा के लिए अन्तर-सरकारी समिति के 20वें सत्र के दौरान लिया गया.

मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में दीपावली का शामिल होना, भारत के लिए एक अहम पड़ाव है. यह भारत का 16वाँ तत्व है जिसे यूनेस्को की वैश्विक जीवन्त परम्पराओं की सूची में स्थान मिला है.

भारत में यूनेस्को कार्यालय के निदेशक टिम कर्टिस ने दीपावली को इस सूची में शामिल किए जाने की घोषणा होने पर बधाई देते हुए कहा, “दीपावली केवल एक त्योहार नहीं है."

"यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा की एक जीवन्त अभिव्यक्ति है. यह परम्परा समुदायों, परिवारों और लोगों को एक साथ जोड़ती है, और इसे जीवित रखने वाले सभी लोग इसके वास्तविक संरक्षक हैं.”

ICH 2025 सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल.
© UNESCO/Paras Mendiratta

उन्होंने कहा कि यह त्योहार प्रकाश के अन्धकार पर विजय, अच्छाई की बुराई पर जीत और नए आरम्भ का प्रतीक है. इसी कारण इसकी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता सदियों से बनी हुई है.

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वहीं यूनेस्को में भारत के स्थाई प्रतिनिधि और समिति के अध्यक्ष विशाल शर्मा ने कहा, “दीपावली सदियों से भारत और भारतीय लोगों का त्योहार रही है. आज से यह पूरी मानवता का त्योहार है. सत्य, न्याय और सदभाव का इसका सन्देश, हर व्यक्ति और हर समाज के लिए है.”

दुनिया भर की जीवन्त विरासतों को वैश्विक सम्मान

समिति ने, दीपावली के साथ-साथ, दुनिया के कई देशों की भी अनेक परम्पराओं, कलाओं और ज्ञान-परम्पराओं को सूचियों में शामिल किया है. कुछ तत्व “तत्काल संरक्षण” वाली सूची में गए, जबकि कई अन्य “प्रतिनिधि सूची” में जोड़े गए.

इनमें संगीत, नृत्य, शिल्प, सामुदायिक उत्सव, कृषि से जुड़ी प्रथाएँ, अनुष्ठान और मौखिक परम्पराएँ शामिल हैं.

पत्थर की इमारतों और स्मारकों से अलग, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत उन जीवित परम्पराओं और तरीक़ों को कहा जाता है जिन्हें लोग करके सीखते हैं और आगे बढ़ाते हैं - जैसेकि रीति - रिवाज़ , कौशल, अनुष्ठान, संगीत, शिल्प और सामाजिक प्रथाएँ, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं.

श्रीलंका: पारम्परिक किथुल टैपिंग तकनीक

श्रीलंका के ग्रामीण समुदायों में किथुल मदीमा या किथुल कपीमा, किथुल पेड़ से रस निकालने की प्राचीन पारम्परिक विधि है. 

किथुल खजूर का एक ऊँचा पेड़ होता है, जो जंगलों और घरों के पास उगता है. 

रस निकालने के लिए सीढ़ी से पेड़ पर चढ़कर फूल की डंडी को बेल से बांधा जाता है और एक पवित्र चाकू से सावधानी के साथ काटकर हर दिन रस इकट्ठा किया जाता है.

यह रस छानकर देर तक उबाला जाता है, जिससे किथुल ट्रिकल या किथुल शहद बनता है. इसे ताज़ा पेय के रूप में पिया जाता है और गुड़, सिरका तथा पारम्परिक पेय बनाने में भी इस्तेमाल किया जाता है.

श्रीलंका के ग्रामीण समुदायों में किथुल मदीमा या किथुल कपीमा, किथुल पेड़ से रस निकालने की प्राचीन पारम्परिक विधि है.
© Dr Raveendra Withanachchi, 2025

जिबूती: पारम्परिक ‘ज़फ़्फ़ा’ उत्सव

ज़फ़्फ़ा, जिबूती, कोमोरोस, संयुक्त अरब अमीरात, इराक़, जॉर्डन, मॉरितानिया और सोमालिया में मनाया जाने वाला पारम्परिक विवाह जुलूस है, जो दूल्हा-दुल्हन के अविवाहित जीवन से, विवाहित जीवन में प्रवेश का प्रतीक है. इसमें गीत, संगीत, नृत्य और पूरे समुदाय का उत्सव शामिल होता है.

इस जुलूस में कई प्रतीकात्मक अनुष्ठान किए जाते हैं ताकि नए जीवन की शुरुआत शुभ हो और जोड़े को आशीर्वाद मिले. अलग–अलग देशों में इनके रूप थोड़े बदलते हैं, लेकिन भावना एक ही रहती है - नवविवाहित जोड़े के लिए ख़ुशहाली, सुरक्षा और प्रेम की कामना.

जिबूती के प्रतिनिधि अपनी प्रिय लोक परम्परा क़िबना अरोबी का प्रदर्शन करते हुए.
© UN News/Rohit Upadhyay

पाकिस्तान: मिट्टी की धुन ‘बोरींडो’

सिन्ध और थर के गाँवों में बजने वाला बोरींडो यंत्र, मिट्टी से बना गोलाकार लोक वाद्य है. इसे हाथ से गढ़कर धूप में सुखाया और सजाया जाता है. समय के साथ यह कला विलुप्त होता जा रही है और अब बहुत कम बुज़ुर्ग कारीगर ही इसे बनाना जानते हैं.

यूनेस्को की “तत्काल संरक्षण सूची” में शामिल होने से, अब इस परम्परा के दस्तावेज़ रखने, प्रशिक्षण और युवाओं तक पहुँच के प्रयास मज़बूत होंगे.

पाकिस्तान का प्राचीन लोक वाद्य बोरींदो - उसकी धुनें, ज्ञान और पारम्परिक कौशल.
© UNESCO/Faraz Ahmad/Culture Department, Sindh

बांग्लादेश: टांगाइल साड़ी बुनाई

टांगाइल साड़ियों की महीन बुनावट और पारम्परिक डिज़ाइन सदियों से बांग्लादेश की पहचान का हिस्सा रहे हैं. यह परम्परा बासाक और झोला समुदाय निभाते हैं, जहाँ हिन्दू और मुस्लिम कारीगर साथ काम करते हैं. 

पुरुष डिज़ाइन और करघे पर बुनाई करते हैं, महिलाएँ धागा तैयार करने व अन्तिम सजावट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

यूनेस्को की सूची में शामिल होना इस कला, इसके कारीगरों के रोज़गार और उनकी अन्तरराष्ट्रीय पहचान, तीनों को मजबूत करता है.

बांग्लादेश की टांगाइल पारम्परिक साड़ी बुनाई कला को यूनेस्को की अमूर्त साँस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया.
© UNESCO/Paras Mendiratta

केन्या: ‘म्वाज़िन्दिका’ - उपचार और समुदाय की धुन

केन्या के दाईदा समुदाय की म्वाज़िन्दिका परम्परा नृत्य, संगीत, अनुष्ठान और कथा का संगम है. यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि उपचार, आध्यात्मिक सन्तुलन और संकट के समय सामूहिक सहारे का माध्यम है. पीढ़ीगत बदलाव के कारण यह परम्परा कमज़ोर पड़ रही थी.

यूनेस्को की “तत्काल संरक्षण सूची” में शामिल होने से अब इसके पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास तेज़ होंगे.

केन्या के म्वाज़िन्दिका आध्यात्मिक नर्तक, अमूर्त साँस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने का जश्न मनाते हुए.
© UN News/Rohit Upadhyay

मोरक्को: काफ़्तान की शिल्पकला 

मोरक्को का काफ़्तान जटिल कढ़ाई, मोतियों और पारम्परिक धागों से सजा हुआ लम्बा वस्त्र होता है. इसे विवाह, जन्म, त्योहारों और सामुदायिक आयोजनों में सम्मान व ख़ुशी के प्रतीक के रूप में पहना जाता है. 

कारीगर पीढ़ियों से हाथों की महीन कला से इसे जीवित रखे हुए हैं. यूनेस्को की सूची में शामिल होने से युवा कारीगरों, स्थानीय समुदायों और रचनात्मक उद्योगों को नया उत्साह मिलने की उम्मीद है.

ICH सत्र में पारम्परिक परिधान में एक प्रतिभागी.
© UN News/Rohit Upadhyay

अफ़ग़ानिस्तान: प्राचीन सूक्ष्म (miniature) कला

अफ़ग़ानिस्तान की बेज़ाद शैली की सूक्ष्म (miniature) कला सूक्ष्म चित्रण, गहरे रंग और ऐतिहासिक कथाओं के लिए जानी जाती है. 

यह कला समुदायों को उनके इतिहास, साहित्य और दर्शन से जोड़ती है. कई देश और कला संस्थान अब भी कमाल उद-दीन बेज़ाद की शैली से प्रेरणा लेते हैं.

यूनेस्को से मिली मान्यता, अफ़ग़ान कलाकारों के लिए आशा और संरक्षण का मज़बूत सन्देश है, विशेषकर मौजूदा कठिन परिस्थितियों में.

नई दिल्ली में 2025 की अमूर्त साँस्कृतिक धरोहर समिति की बैठक में अफ़ग़ानिस्तान का प्रतिनिधिमंडल.
© UNESCO/Paras Mendiratta

यूनेस्को अपनी सूचियों के ज़रिए सरकारों और समुदायों के साथ मिलकर इन परम्पराओं को पहचान देता है, उनके संरक्षण में मदद करता है और विशेषकर वहाँ सहयोग जुटाता है जहाँ ये विरासतें सामाजिक, आर्थिक या पर्यावरणीय कारणों से ख़तरे में हैं.

नई सूची की सम्पूर्ण जानकारी यहाँ उपलब्ध है.