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“दृष्टि गई, लेकिन हिम्मत नहीं’: यूएन स्वयंसेवक सुशील अधिकारी का साहसिक सफ़र

UN के स्वयंसेवक सुशील अधिकारी का चित्र, जो एक दिव्यांग व्यक्ति हैं, धूप का चश्मा और स्कार्फ पहने हुए बाहर मुस्कुराते हुए दिखाई दे रहे हैं।
© UNICEF यूएन स्वयंसेवा के विकलांग समावेशन व सम्पर्क अधिकारी सुशील अधिकारी ने अपनी दृष्टि बाधित होने पर हिम्मत नहीं हारी.

“दृष्टि गई, लेकिन हिम्मत नहीं’: यूएन स्वयंसेवक सुशील अधिकारी का साहसिक सफ़र

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय कार्यालय के लिए काठमांडू में कार्यरत विकलांगता समावेशन एवं सहभागिता अधिकारी और यूएन स्वयंसेवक सुशील अधिकारी की कहानी हिम्मत और लगन का प्रेरक उदाहरण है. यूएन स्वयंसेवक संस्था (UNV) और यूनीसेफ़ के संयुक्त युवा पैरोकार कार्यक्रम के ज़रिए विकलांगजन समेत सभी युवजन को बच्चों के अधिकारों पर काम करने के लिए, एक साल का व्यावसायिक अनुभव मिलता है.

“मैंने अपनी दृष्टि खोई, मगर अपना दृष्टिकोण कभी नहीं खोया.” सुशील अधिकारी, अपनी आपबीती की शुरुआत इन शब्दों से करते हैं - एक ऐसी कहानी जो सीमाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य व दृढ़ता से ओत-प्रोत है.

बचपन में नेपाल में उन्हें भेदभाव, अकेलेपन और अपने बारे में लोगों की ग़लत धारणाओं का सामना करना पड़ा. कई जगह विकलांगता को आज भी ‘पिछले जन्म का दंड’ समझा जाता था, और उनके परिवार को भी इसी तरह के ताने सुनने पड़े.

सुशील अधिकारी बताते हैं, “इन संघर्षों ने मेरे भीतर आग जलाई. इससे मुझे अपना उद्देश्य मिला - लोगों की सोच बदलना और उन्हें विकलांगता का असली अर्थ समझाना.”

वही सपना मुझे युवाओं और विकलांगजन के अधिकारों के लिए काम करने की ओर ले गया. मैं, ग़लत धारणाओं को धीरे-धीरे चुनौती देते हुए, उन लोगों की आवाज़ बन गया जिनकी आवाज़ को कोई अहमियत नहीं दी जाती थी. 

वे कहते हैं, “विकलांग युवाओं के अधिकारों के लिए लड़ना ज़रूरी है. हमें नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए, हमें बराबरी से शामिल किया जाना चाहिए.”

2024 में, सुशील सहित बीस युवा पैरोकारों ने भूटान, ईरान, केनया, लाइबेरिया, मोल्दोवा, मोज़ाम्बीक़, नामीबिया, नेपाल, पेरू, रवांडा, थाईलैंड, तुर्कीये और ज़िम्बाब्वे जैसे देशों में, यूनीसेफ़ के साथ यूएन स्वयंसेवक के रूप में अपना कार्य शुरू किया. 

यह कार्यक्रम युवाओं को नेतृत्व सीखने, अनुभव हासिल करने और समाज में सार्थक योगदान देने का अवसर देता है.

सक्रियता से पैरोकारी तक का सफ़र

सुशील शुरू से ही अपने समुदाय में सक्रिय रहे. इसलिए संयुक्त राष्ट्र के काम से जुड़ना उनके लिए अगला स्वाभाविक क़दम था.

वे याद करते हैं, “11 साल की उम्र में मैंने अपनी दृष्टि खो दी थी, मगर न तो अपना उद्देश्य खोया और न ही हिम्मत. मुझे हमेशा लगा कि सही बात के लिए खड़ा होना ज़रूरी है.”

सुशील, यूनीसेफ़ के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय कार्यालय में, कार्यक्रमों और दफ़्तरी कामकाज के हर स्तर पर विकलांगता समावेशन को मज़बूत करने की कोशिश करते हैं. 

स्कूल की एक दीवार पर बने भित्तिचित्र में हाथ के इशारों का उपयोग करते हुए सांकेतिक भाषा में वर्णमाला प्रदर्शित की गई है।
© UNICEF

वह प्रशिक्षण और अनुभव बाँटने वाली बैठकों का आयोजन करते हैं, दूरस्थ बैठकों का संचालन करते हैं, अलग-अलग संगठनों के साथ सहयोग बढ़ाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि विकलांग बच्चे और युवजन केवल श्रोता नहीं रहें, बल्कि समाधान निकालने में बराबर के भागीदार बनें.

सुशील कहते हैं, “यह नियुक्ति मेरे जीवन के सबसे सन्तोषजनक अनुभवों में से एक रही है. बच्चों और युवाओं की मदद करना मेरे लिए बहुत व्यक्तिगत बात है, और हर छोटी प्रगति इस प्रयास को सार्थक बना देती है.”

वह मानते हैं कि नियमों और प्रक्रियाओं की जटिलताएँ कभी-कभी चुनौती बन जाती हैं, लेकिन यही चुनौतियाँ उनकी लगन और प्रतिबद्धता को और मज़बूत करती हैं.

युवा पीढ़ी के लिए सन्देश

सुशील युवा पीढ़ी को एक बड़ी सम्भावना के रूप में देखते हैं. “मैं युवाओं को लाभार्थी नहीं, बल्कि नेता और बदलावकर्ता मानता हूँ."

"आसमान की कोई सीमा नहीं है. सीखने, नेतृत्व करने और योगदान देने के अनगिनत अवसर हैं. बस धैर्य, दृढ़ता और निरंतरता के साथ आगे बढ़ें, मिलकर, एक साझा लक्ष्य के लिए.”

सुशील कहते हैं, “सच्ची दृष्टि आँखों में नहीं होती - वह उस बदलाव में होती है, जिसे हम बनाने का साहस रखते हैं.”