सूडान: आम नागरिकों के विरुद्ध 'अत्याचारों की एक और लहर' का जोखिम
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने चेतावनी दी है कि सूडान में एक और अल फ़शर को दोहराए जाने का जोखिम है, जहाँ कुछ सप्ताह पहले आम लोगों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर हिंसा को अंजाम दिए जाने के आरोप सामने आए थे. सूडान में परस्पर विरोधी सैन्य बलों के बीच भीषण टकराव अब कोर्दोफ़ान क्षेत्र में फैल गया है और अत्याचारों की नई लहर की आशंका बढ़ रही है.
सूडान की सशस्त्र सेना और अर्द्धसैनिक बल (RSF) एक समय सहयोगी रह चुके हैं, लेकिन देश पर नियंत्रण के लिए मतभेदों की वजह से दोनों पक्षों में अप्रैल 2023 में लड़ाई भड़क उठी. अब यह टकराव सूडान में तेल सम्पदा से सम्पन्न तीन प्रान्तों में केन्द्रित है.
अक्टूबर महीने के अन्त में, RSF लड़ाकों ने क़रीब डेढ़ साल की घेराबन्दी के बाद नॉर्थ दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल फ़शर को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था. इसके बाद, वहाँ फँसे आम लोगों को जान से मारे जाने जाने, यौन हिंसा, यातना व अन्य अत्याचारों का शिकार बनाए जाने के आरोप सामने आए.
सूडान में हिंसक टकराव, विश्व में सबसे बड़े मानवीय संकटों में हैं जहाँ क़रीब तीन करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की आवश्यकता है.
मानवाधिकार उच्चायुक्त टर्क ने प्रभाव रखने वाले सभी देशों से आग्रह किया है कि लड़ाई को रोकने के लिए तुरन्त क़दम उठाए जाने होंगे और उन हथियारों के प्रवाह को भी रोकना होगा, जो इस टकराव को हवा दे रहे हैं.
“यह देखना वास्तव में स्तब्धकारी है कि अल फ़शर में भयावह घटनाक्रम के बाद, अब कोर्दोफ़ान में इतिहास अपने को इतनी जल्दी दोहरा रहा है.”
“अन्तरराष्ट्रीय समुदाय उस समय एकजुट खड़ा हुआ, बिना किसी लागलपेट के बर्बर उल्लंघन व विध्वंस की निन्दा की गई. हमें कोर्दोफ़ान को एक और अल फ़शर नहीं बनने देना है.”
बदले की भावना से हत्याएँ
अर्द्धसैनिक बल, RSF ने 25 अक्टूबर को नॉर्थ कोर्दोफ़ान के बारा शहर को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था. उसके बाद से, यूएन मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार, हवाई हमलों, गोलाबारी, और बिना अदालती सुनवाई के लोगों को जान से मारने की घटनाओं में 279 लोग मारे जा चुके हैं.
हालांकि, मृतक आम नागरिकों का आँकड़ा इससे कहीं अधिक होने की आशंका है, चूँकि इन्टरनैट और दूरसंचार सेवाओं में व्यवधान की वजह से पर्याप्त जानकारी मिल पाना कठिन है.
इनके अलावा, बदला लेने की भावना से लोगों की हत्या करने, मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, अगवा करने, यौन हिंसा व सैनिक के रूप में जबरन भर्ती किए जाने के मामले सामने आए हैं.
अनेक आम नागरिकों को विरोधी पक्ष के साथ सहयोग करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है. नफ़रत भरे सन्देशों व दरार डालने वाले भाषणों की आशंका भी गहरा रही है.
हिंसा की वजह से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और अब तक 45 हज़ार से अधिक लोग सुरक्षित स्थान की तलाश में जा चुके हैं.
‘चुप्पी, कोई विकल्प नहीं’
मानवाधिकार मामलों के प्रमुख ने कहा कि यह एक और मानव-जनित आपदा है और इन परिस्थितियों में चुप नहीं रहा जा सकता है.
उन्होंने लड़ाई पर तुरन्त विराम लगाने और भूख से जूझ रहे लोगों तक सहायता पहुँचाने के लिए रास्ता मुहैया कराने का आग्रह किया.
“क्या हमने अतीत से कोई सबक़ नहीं सीखे हैं? हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते हैं और न ही और अधिक संख्या में सूडानी नागरिकों को भयावह मानवाधिकार उल्लंघन के भुक्तभोगी बनने दे सकते हैं. हमें क़दम उठाने होंगे और इस लड़ाई को अभी रोकना होगा.”
सूडान में मानवतावादी एजेंसियों ने अपने एक साझा वक्तव्य में कोर्दोफ़ान क्षेत्र में हिंसा में आई तेज़ी और अन्य शहरों की घेराबन्दी की कठोर शब्दों में निन्दा की है.
यूएन एजेंसियों के अनुसार, हिंसा के कारण भोजन, दवाओं व अति-आवश्यक सामान की आपूर्ति पर गहरा असर हुआ है, किसान अपने खेतों व बाज़ार में नहीं जा पा रहे हैं और पूरे कोर्दोफ़ान क्षेत्र में अकाल का ख़तरा फैल रहा है.
मानवाधिकार उच्चायुक्त टर्क ने कहा कि नॉर्थ कोर्दोफ़ान के उल उबेद में RSF द्वारा किए गए एक ड्रोन हमले में 45 लोग मारे गए. इससे पहले, 3 नवम्बर को सूडान की सशस्त्र सेना के हमले में, साउथ कोर्दोफ़ान के कौड़ा में 48 लोग मारे गए थे.
यूएन मानवीय राहत एजेंसियाँ चुनौतीपूर्ण हालात में ज़रूरतमन्दों तक मदद पहुँचाने में जुटी हैं और कोर्दोफ़ान क्षेत्र में 11 लाख लोगों को सहायता प्रदान की गई है.