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दृष्टिबाधित 14 वर्षीय प्रथमेश सिन्हा ने पहली बार स्कूबा डाइविंग का अनुभव किया और उसका भरपूर आनंद लिया.

भारत: विकलांगजन के लिए रोमांचक खेलों से निकलती हौसले की नई राह

© FlyingFish Scuba School, Goa
दृष्टिबाधित 14 वर्षीय प्रथमेश सिन्हा ने पहली बार स्कूबा डाइविंग का अनुभव किया और उसका भरपूर आनंद लिया.

भारत: विकलांगजन के लिए रोमांचक खेलों से निकलती हौसले की नई राह

मानवाधिकार

बहुत से विकलांग व्यक्तियों के लिए, रोमांचक खेलों में शिरकत करना एक दूर का सपना रहा है. रुकावटें शारीरिक कमसमाज की सोच में अधिक थीं. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. विकलांगजन अब पहली बार समुद्र में ग़ोता लगा रहे हैंपहाड़ी रास्तों पर पैदल यात्राएँ कर रहे हैंसाइकिल चला रहे हैं और दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं. वे अपनी क्षमताओं के नए रूपों को पहचान रहे हैं और आज़ादी की एक बिल्कुल नई अनुभूति का अनुभव कर रहे हैं.

एक दृष्टिबाधित सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, मोहल के लिए वह पल अविस्मरणीय बन गया, जब उन्होंने गोवा में हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पहली बार स्कूबा डाइविंग के लिए पानी में डुबकी लगाई.

उन्हें लगा जैसे पानी ने उन्हें चारों तरफ़ से अपने में समेट लिया.

निर्देश दिए जाने के दौरान वह घबराई हुई थीं. नया सामान, नए संकेत और पानी के भीतर जाने का डर मन में था. लेकिन प्रशिक्षकों ने उनका हाथ थामे रखा और हर क़दम पर उन्हें भरोसा दिलाते रहे.

उन्होंने बताया, “पानी के अन्दर लगा जैसे मैं समुद्री दुनिया का हिस्सा हूँ. चारों ओर से पानी की लहरें मुझे छू रही थीं. मैं सुरक्षित थी, और सच में लगा कि मैं भी सबका हिस्सा हूँ.”

एक 37 वर्षीय व्यक्ति ने कहा कि उन्होंने विकलांग व्यक्तियों के लिए कई तरह के रोमांचक खेलों में हिस्सा लिया है, लेकिन पानी के अन्दर पहली बार गए. वह कहते हैं, “मुझे लगा था कि साँस लेना सबसे मुश्किल होगा. लेकिन जैसे ही नीचे गया, सारा डर ख़त्म हो गया. मन हुआ कि फिर से करूँ.”

कई लोगों के लिए स्कूबा डाइविंग सच में ज़िन्दगी बदल देने वाला अनुभव बन गई.

एक विकलांग महिला ने बताया कि उन्हें पानी से बहुत डर लगता था, “लेकिन इस अनुभव के बाद मेरा डर निकल गया. अब मुझे भी पानी से प्यार हो गया है.”

गोवा में पर्पल फेस्ट 2025 के दौरान विकलांगजन को स्कूबा डाइविंग का प्रशिक्षण दिया गया.
© FlyingFish Scuba School, Goa

अपनी एक बाँह खो चुके दिल्ली के दीपेन्द्र कहते हैं, “ग़ोताख़ोरी से पहले तनाव और डर से मेरा सिर भारी हो गया था. लेकिन मैंने हर निर्देश ध्यान से माना. पहली बार लगा कि जो असम्भव लगता था, वह भी सम्भव हो सकता है.”

14 साल के दृष्टिबाधित प्रथमेश सिन्हा तो ग़ोताखोरी के बाद इतने उत्साहित थे कि तुरन्त पूछ बैठे कि क्या वे आगे चलकर इसका पूरा प्रशिक्षण ले सकते हैं. मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, “मैंने नीचे तली को छुआ तो बहुत मज़ा आया.”

बेंगलुरू से आई विजयलक्ष्मी ने बताया कि ग़ोताख़ोरी की विशेष पोशाक पहनते समय, शुरू में तो उन्हें घुटन सी महसूस हुई. लेकिन पानी में उतरने के बाद उनका डर दूर हो गया. “मुझे पानी के अन्दर इतना अच्छा लगा कि बाहर आने का मन ही नहीं कर रहा था. बड़ी मुश्किल से बाहर आई. अब मुझमें इतना साहस और भरोसा आ गया है कि मैं आगे भी बार-बार स्कूबा डाइविंग करना चाहूँगी.”

गोवा में अक्टूबर में आयोजित पर्पल फेस्ट 2025 के दौरान, मैराथन में भाग लेने के लिए उत्साहित विकलांगजन.
© UN India/Shachi Chaturvedi

ज़मीन पर भी टूटते बन्धन

बदलाव केवल पानी में ही नहीं, ज़मीन पर भी साफ़ दिख रहा है.

भारत के साइकिल मार्गों पर अब विकलांग व्यक्ति अपने साथी के साथ दोहरी साइकिलों पर तेज़ हवा और रफ़्तार का आनन्द ले रहे हैं.

चलने-फिरने, देखने या सुनने में कठिनाई महसूस करने वाले यात्री, अलग-अलग क्षमताओं वाले समूहों के साथ जंगलों के रास्तों पर जाते हैं. रास्ते भर वे बातें करते हैं, अपनी कहानियाँ साझा करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं.

ये यात्राएँ वर्षों से बनी, बैठे रहने की आदत और निष्क्रिय जीवन को चुनौती देती हैं, आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और विकलांग व्यक्तियों और दफ़्तरों में काम करने वाले समूहों के बीच नए रिश्ते बनाती हैं.

दौड़ प्रतियोगिताओं में भी व्हीलचेयर, कृत्रिम पैर या मार्गदर्शक साथी के साथ धावक भाग लेते हैं.

एक आवश्यक मुहिम

इन अनुभवों के पीछे समावेशी रोमांचक गतिविधियाँ कराने वाले संगठनों, प्रशिक्षकों और स्वयंसेवकों का एक मज़बूत होता नैटवर्क है, जो वर्षों पुरानी सामाजिक बाधाओं को तोड़ने में लगा है.

दृष्टिबाधित दिव्यांशु गणात्रा, Adventures Beyond Barriers Foundation (ABBF) के संस्थापक हैं. उन्होंने जीवन के दोनों पहलू देखे हैं, विकलांगता के साथ भी और बिना भी.

वे कहते हैं, “सबसे बड़ी चुनौती है अदृश्यता. लोगों के रवैये की बाधाएँ, शारीरिक बाधाओं से बहुत पहले, विकलांग व्यक्तियों को रोक देती हैं. खेल में वह शक्ति है जो लोगों को जोड़ सकती है, प्रेरित कर सकती है और भेदभाव ख़त्म कर सकती है.”

उनकी संस्था, पिछले 11 वर्षों से पैदल यात्राएँ, दो व्यक्तियों वाली साइकिल चलाने के कार्यक्रम, स्कूबा डाइविंग, हवा में उड़ान भरने वाली गतिविधियाँ और पर्वतारोहण जैसी यात्राएँ सभी क्षमताओं वाले समूहों के लिए सुलभ बना रही है.

दिव्यांशु बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने सोचा था कि यह बस एक दिन का छोटा सा कार्यक्रम होगा. लेकिन देखते ही देखते यह प्रयास पूरे देश में सोच बदलने वाली लहर बन गया, और अब तो इस सबको एक दशक हो चुका है.

समावेशी मैराथनों में अब व्हीलचेयर पर बैठे धावक, कृत्रिम पैरों के सहारे दौड़ने वाले प्रतिभागी और मार्गदर्शकों के साथ दौड़ने वाले दृष्टिबाधित धावक - सभी उत्साह से भाग लेते हैं.
© UN India/Shachi Chaturvedi

असल बदलाव

भारत के गोवा प्रदेश में संयुक्त राष्ट्र की भागेदारी में आयोजित पर्पल फ़ेस्ट 2025 में समावेशी स्कूबा डाइविंग दल का नेतृत्व करते हुए, गोवा के ‘फ़्लाइंगफ़िश स्कूबा स्कूल’ के प्रशिक्षक, विकलांग व्यक्तियों को पहली बार पानी में उतार रहे थे, और यहीं सबसे प्रभावशाली कहानियाँ आकार ले रही थीं.

‘फ़्लाइंगफ़िश स्कूबा स्कूल’ के संस्थापक अमिताभ गौतम इस अनुभव को यूँ बयान करते हैं, “यह अनुभव बेहद भावुक कर देने वाला था. हमने हर छोटी बात पर दिल से ध्यान दिया. उपकरण, सुरक्षा, प्रशिक्षकों का पूरा सहयोग. ताकि ग़ोताख़ोरी केवल आसान ही नहीं हो, बल्कि सचमुच आरामदायक और ख़ुश करने वाली हो.”

लेकिन, उन्होंने कहा, “असली जादू तो प्रतिभागियों ने किया. उनकी हिम्मत और उत्साह ने पूरा दिन रौशन कर दिया. कई लोग ऊपर आते ही आँसू नहीं रोक पाए. कहते रहे कि यह उनके जीवन का सबसे मुक्त और आनन्द से भर देने वाला पल था. इसने हमें फिर से याद दिलाया कि रोमांच सीमाओं के बारे में नहीं, भीतर के जोश व हौसले से जुड़ा होता है.”

मैराथन में मार्गदर्शक के साथ भाग लेता एक दृष्टिबाधित प्रतिभागी.
© UN India/Shachi Chaturvedi

समानता व पहुँच

इस वर्ष विकलांग व्यक्तियों के अन्तरराष्ट्रीय दिवस की थीम है - सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए विकलांगजन-समावेशी समाजों का निर्माण (Fostering disability-inclusive societies for advancing social progress). 

रोमांचक खेल इस थीम से पूरा तालमेल रखते हैं, और विकलांग व्यक्तियों के लिए समावेशन का आसान साधन बन सकते हैं.

भारत स्थित WHO कार्यालय में विकलांगजन समावेशन, पुनर्वास एवं सहायक प्रौद्योगिकी के लिए राष्ट्रीय अधिकारी डॉक्टर बी मोहम्मद अशील कहते हैं, “जब विकलांग व्यक्ति पहाड़ चढ़ते हैं, पानी में ग़ोता लगाते हैं, या किसी पगडंडी पर आगे बढ़ते हैं, तो वह केवल एक शारीरिक उपलब्धि नहीं होती, एक स्पष्ट सन्देश होता है कि समाज की सीमाएँ उपेक्षा करने से नहीं, समावेशन से बदलती हैं.”

डॉक्टर बी मोहम्मद अशील कहते हैं, “रोमांचक खेल विकलांगता को नहीं देखते - वे साहस को देखते हैं. खेल को सभी के लिए सुलभ बनाकर हम समावेशन को कृपा नहीं, अधिकार बनाते हैं - और यही वास्तव में समावेशी समाजों की नींव है.”

समावेशी रोमांचक गतिविधियाँ कराने वाले समूह, प्रशिक्षक और स्वयंसेवक मिलकर पुरानी सामाजिक बाधाओं को बदलने की मुहिम में जुटे हैं.
© UN India/Shachi Chaturvedi