आधुनिक दासता की बेड़ियाँ तोड़ने, न्याय व गरिमा पर आधारित विश्व के निर्माण का आहवान
दासता, इतिहास की पुस्तकों का एक भयावह अध्याय है और समकालीन दौर में भी करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मंगलवार को ‘अन्तरराष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस’ के अवसर पर अपने सन्देश में आधुनिक दासता के पीड़ितों को इस गर्त से बाहर निकालने और स्वतंत्रता, गरिमा व न्याय पर आधारित विश्व के निर्माण आकार देने का आहवान किया है.
हर साल, 2 दिसम्बर को मनाए जाने वाले इस अन्तरराष्ट्रीय दिवस का उद्देश्य दासता के आधुनिक रूपों का उन्मूलन करने के प्रयासों में तेज़ी लाना है: मानव तस्करी, यौन शोषण, बाल श्रम के बदतरीन रूप, जबरन विवाह और सशस्त्र टकरावों में बच्चों की सैनिक के रूप में भर्ती.
यूएन प्रमुख ने अपने सन्देश में अतीत में दासता का शिकार हुए भुक्तभोगियों का स्मरण किया, विशेष रूप से उन 1.5 करोड़ से अधिक अफ़्रीकी पुरुषों, महिलाओं व बच्चों को, जिन्हें पहले पकड़ा गया, ज़ंजीरों में बांधकर महासागर पार ले जाया गया और फिर बंधुआ मज़दूरी के लिए बेच दिया गया.
बहुत से लोगों ने कठिन समुद्री मार्ग में ही अपनी जान गँवा दी.
“हम उन दर्दनाक निशानों का स्मरण करते हैं जोकि उनकी दासता ने हमारे समाजों पर छोड़े हैं. इनमें ढाँचागत असमानताएँ और व्यवस्थागत अन्याय हैं जोकि कई पीढ़ियों तक क़ायम रहे हैं.”
महासचिव गुटेरेश ने विश्व भर में, दासता के समकालीन रूपों में फँसे 5 करोड़ लोगों की मदद के लिए लामबन्द प्रयासों का आहवान किया, जिनमें अधिकाँश महिलाएँ व बच्चे हैं.
साथ ही, उन्होंने जबरन मज़दूरी और जबरन विवाह जैसे मानवाधिकार उल्लंघन मामलों की रोकथाम के लिए अपनी अपील दोहराई है.
अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में जबरन श्रम व जबरन विवाह के मामलों में तेज़ उछाल दर्ज किया गया है. 2021 में आधुनिक दासता का शिकार लोगों की संख्या, 2016 की तुलना में 1 करोड़ अधिक है.
दासता के आधुनिक रूप
दासता के समकालीन रूपों के दंश से पीड़ित 5 करोड़ लोगों में से 2.8 करोड़ जबरन मज़दूरी और 2.2 करोड़ जबरन विवाह का शिकार हैं. जबरन श्रम के हर 8 में से 1 पीड़ित बच्चा है, जिनमें एक बड़ी संख्या यौन शोषण को झेलती है.
वैसे आधुनिक दासता की क़ानूनी रूप से कोई व्याख्या नहीं की गई है, लेकिन इससे तात्पर्य जबरन श्रम, कर्ज़ के लिए बंधुआ मज़दूरी, जबरन विवाह और मानव तस्करी जैसे अन्य तौर-तरीक़ों से है.
मोटे तौर पर, इसका अर्थ शोषण की उन परिस्थितियों से है जिनमें कोई व्यक्ति, धमकियों, हिंसा, दबाव, धोखेधड़ी या ताक़त के दुरुपयोग की वजह से न किसी काम से मना कर सकता है और न ही छोड़ कर जा सकता है.
महिलाओं व बच्चों पर विशेष रूप से इस समस्या की चपेट में आने का जोखिम होता है.
आधुनिक दासता के मामले लगभग दुनिया के हर देश में दर्ज किए जाते हैं, और ये जातीय, सांस्कृतिक या धार्मिक सीमाओं से परे हैं. एक अनुमान के अनुसार, जबरन श्रम के 52 फ़ीसदी और जबरन विवाह के लगभग 25 प्रतिशत मामले उच्चतर-मध्य आय और उच्च-आय वाले देशों में दर्ज किए जाते हैं.
एकजुट प्रयास ज़रूरी
महासचिव गुटेरेश ने क्षोभ जताया कि दासता के समकालीन रूपों को आपराधिक तत्वों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, जो अत्यधिक निर्धनता, भेदभाव और पर्यावरण क्षरण से पीड़ित लोगों को अपना शिकार बनाते हैं.
वहीं, हिंसक टकराव से बचने के लिए सुरक्षा और बेहतर जीवन व आजीविका के लिए प्रवासी कामगारों को भी अक्सर मानव तस्कर निशाना बनाते हैं. यूएन प्रमुख ने कहा कि लोगों से उनके अधिकार और उनकी मानवता छीन ली जाती है.
इसके मद्देनज़र, उन्होंने सरकारों, व्यवसायों, नागरिक समाज और व्यापार संगठनों से एकजुट आवाज़ में इस संकट का सदैव के लिए अन्त करने का आग्रह किया है.
महासचिव गुटेरेश ने कष्ट निवारण उपायों, न्याय तक पहुँच, मुआवज़े, पुनर्वास के साथ-साथ यह गारंटी दिए जाने पर भी बल दिया कि भुक्तभोगियों और उनके परिवारों को फिर कभी यह पीड़ा नहीं झेलनी होगी.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि 2026 में दासता सन्धि की 100वीं वर्षगाँठ है और इस अवसर पर दासता के समकालीन रूपों को जड़ से उखाड़ कर फेंकना होगा.
“आज़ादी, गरिमा व न्याय पर टिकी दुनिया न केवल सम्भव है, यह हमारा साझा दायित्व भी है.”